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सवर्णो की नाराजगी तो झेलनी ही पड़ेगी

  • एस सी -एस टी एक्ट का हो रहा विरोध
  • 2019 के चुनाव में होगा मुद्दा

Sanjay Sharma @ WeekandTimes

एससी-एसटी एक्ट के विरोध में सवर्णों की नाराजगी कहीं सत्तासीनों को सत्ताविहीन न कर दें। जिन उच्च जातियों के दम पर भाजपा देश व कई राज्यों में सत्ता के शिखर पर पहुंची थी उनको नजरअंदाज कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट कर फिर से पुराने एक्ट को बहाल कर सवर्णों से नाराजगी मोल ले ली है। 2014 में हिंदुत्व के नाम पर सत्तासुख पाने वाली भाजपा 2019 के लिए हिंदुओं में सवर्ण, पिछड़ा व दलित के नाम पर राजनीति करने लग गई है। भाजपा के वोटर अब बिदकने लगे हैं। ये कितना बिदकें हैं यह तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा पर इतना तय है कि सवर्णों की नाराजगी ने भाजपा के पेशानी पर बल तो ला ही दिया है। हालांकि कार्यसमिति की बैठक के बाद भाजपा अध्यक्ष व पीएम ने कार्यकर्ताओं से यह अपील जरूर की कि घबराने की जरू रत नहीं। हम फिर से 2019 में सत्ता में वापसी करेंगे। जैसा माहौल बन रहा उससे तो ऐसा लगता है कि आने वाले समय में चुनावी बिसात पर विकास से ज्यादा जाति, धर्म के मुद्दे चलेंगे। सारी पार्टियां एससी-एसटी एक्ट के बहाने सवर्णों को अपनी ओर रिझाने की कोशिश में जुट गई हैं।

…. हालांकि इस एक्ट का विरोध दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तर भारत में ज्यादा मुखर हो रहा है। गौरतलब हो कि भाजपा ने पिछले चुनाव में उत्तर भारत से अच्छी खासी लोस सीटें पाईं थीं। उन सीटों को जिताने में सवर्णों की भूमिका अहम थी। अकेले यूपी व बिहार में 100 से ज्यादा सीटें इनकी झोली में गिरे थे। उत्तर भारत में सवर्णों की तादात ज्यादा है ऐसे में इस एक्ट का विरोध भी मप्र, बिहार, यूपी, राजस्थान में ज्यादा हो रहा है। सवर्णों द्वारा इसका विरोध करना भी उनकी मजबूरी हैं क्योंकि यूपी व बिहार में इस एक्ट का दुरुपयोग बहुत हुआ है। इसकी वजह उच्चजातियों को झूठे मुकदमों में फंसा कर उन्हें मानसिक व आर्थिक रूप से परेशान किया जाता रहा है। सवर्ण समुदाय के लोग एससी-एसटी एक्ट के खिलाफ हैं। उनका मानना है कि इस कानून की वजह से उन्हें प्रताडि़त होना पड़ता है और इस कानून का गलत इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल, सवर्ण संगठनों और जातियों की मांग है कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये आदेश के मुताबिक ही कानून रहने दे (यानी केंद्र एसएसी-एसटी एक्ट के पुराने स्वरूप को बहाल न करे)। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों पर होने वाले अत्याचार और उनके साथ होनेवाले भेदभाव को रोकने के मकसद से अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1989 बनाया गया था। जम्मू कश्मीर को छोडक़र पूरे देश में इस एक्ट को लागू किया गया। इसके तहत इन लोगों को समाज में एक समान दर्जा दिलाने के लिए कई प्रावधान किए गए और इनकी हरसंभव मदद के लिए जरूरी उपाय किए गए। इन पर होनेवाले अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष व्यवस्था की गई ताकि ये अपनी बात खुलकर रख सकें। हाल ही में एससी-एसटी एक्ट को लेकर उबाल उस वक्त सामने आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के प्रावधान में बदलाव कर इसमें कथित तौर पर थोड़ा कमजोर बनाना चाहा।
सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के बदलाव करते हुए कहा था कि मामलों में तुरंत गिरफ्तारी नहीं की जाएगी। कोर्ट ने कहा था कि शिकायत मिलने पर तुरंत मुकदमा भी दर्ज नहीं किया जाएगा। शीर्ष न्यायालय ने कहा था कि शिकायत मिलने के बाद डीएसपी स्तर के पुलिस अफसर द्वारा शुरूआती जांच की जाएगी और जांच किसी भी सूरत में 7 दिन से ज्यादा समय तक नहीं होगी। डीएसपी शुरुआती जांच कर नतीजा निकालेंगे कि शिकायत के मुताबिक क्या कोई मामला बनता है या फिर किसी तरीके से झूठे आरोप लगाकर फंसाया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट के बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल की बात को मानते हुए कहा था कि इस मामले में सरकारी कर्मचारी अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं। एससी-एसटी संशोधन विधेयक 2018 के जरिए मूल कानून में धारा 18 जोड़ी जाएगी। इसके जरिए पुराने कानून को बहाल कर दिया जाएगा। इस तरीके से सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए गए प्रावधान रद्द हो जाएंगे। मामले में केस दर्ज होते ही गिरफ्तारी का प्रावधान है। इसके अलावा आरोपी को अग्रिम जमानत भी नहीं मिल सकेगी। आरोपी को हाईकोर्ट से ही नियमित जमानत मिल सकेगी। मामले की जांच इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अफसर करेंगे। जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल संबंधी शिकायत पर तुरंत मामला दर्ज होगा। एससी/एसटी मामलों की सुनवाई सिर्फ स्पेशल कोर्ट में होगी। सरकारी कर्मचारी के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दायर करने से पहले जांच एजेंसी को अथॉरिटी से इजाजत नहीं लेनी होगी। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक देश भर में 2016 में कुल 11060 ऐसे केस दर्ज हुए, जो एससी-एसटी एक्ट के तहत थे। इनमें से जांच के दौरान 935 शिकायतें पूरी तरह से गलत पाई गईं। चूंकि शिकायत दर्ज होने के तुरंत बाद गिरफ्तारी तय होती है, ऐसे में इस कानून को लेकर हमेशा से विवाद रहा है। कई बार राजनैतिक दबाव में भी इस कानून का दुरुपयोग होता रहा है। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद इस कानून को फिर से परिभाषित करते हुए 20 मार्च को कुछ निर्देश दिए। इसके तहत एससी-एसटी एक्ट के मामलों की जांच कम से कम डिप्टी एसपी रैंक के अधिकारी करेंगे। पहले ये जांच इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी करते थे। किसी भी सरकारी अधिकारी पर केस दर्ज होने पर ही उसकी गिरफ्तारी तुरंत नहीं होग। उस सरकारी अधिकारी के विभाग से गिरफ्तारी के लिए इजाजत लेनी होगी अगर किसी आम आदमी पर एससी-एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज होता है, तो उसकी भी गिरफ्तारी तुरंत नहीं होगी। उसकी गिरफ्तारी के लिए जिले के एसपी या एसएसपी से इजाजत लेनी होगी किसी पर केस दर्ज होने के बाद उसे अग्रिम जमानत भी दी जा सकती है। अग्रिम जमानत देने या न देने का अधिकार मैजिस्ट्रेट के पास होगा। अभी तक अग्रिम जमानत नहीं मिलती थी। जाहिर है सवर्णों की नाराजगी से भाजपा मुश्किल में पड़ सकती है।

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