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नौकरशाहों की मुअत्तली संग उठते सवाल

  • क्या सीबीआई जाँच से इंकार के पीछे बड़ी मछली फसने का डर
  • एन एच ए आई वालों को बचाने में किसकी दिलचस्पी
  • घोटालों के आरोप और जालसाजों पर कार्यवाही कब
  • ऑपरेशन क्लीन कही भारी न पड़ जाए त्रिवेंद्र सरकार को
  • पिक एंड चूज की नीति अपनाने का आरोप
  • कार्यवाही की जद से बचे है और भी दागी आईएएस आईएफएस और पीसीएस

चेतन गुरुंग !@ WeekandTimes

देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर ये टैग लगा हुआ था कि उनके राज में कामकाज की रफ्तार बहुत सुस्त पड़ गई है। फैसला लेने में ढीले हैं। नौकरशाह हावी हैं। विकास कार्य मंथर पड़ चुके हैं। फिर उत्तरा काण्ड हुआ। ये आरोप भी चिपक गया कि महिलाओं का सम्मान नहीं हो रहा है। इसी बीच झान्पू वीडियो सांग आ गया। इसको उनकी क्षमताओं पर सवाल माना गया। लगता है कि त्रिवेंद्र आरोपों से आजिज आ चुके हैं, सो जब उनके पास प्रस्ताव आया कि उधम सिंह नगर के बहुचर्चित एनएच-74 घोटाले में आरोपित दो आईएएस अफसरों डॉ. पंकज पाण्डेय और चंद्रेश यादव को क्यों न मुअत्तल कर दिया जाए तो उन्होंने फैसला करने में सेकेंड नहीं लगाया। तत्काल फाइल पर दस्तखत कर दिए। तब सचिव डॉ. पाण्डेय दिल्ली में एक समारोह में उत्तराखंड के लिए अवार्ड ग्रहण कर रहे थे। दोनों नौकरशाहों को अंदेशा तो था लेकिन फैसला इतनी जल्दी हो जाएगा, इसकी उम्मीद शायद नहीं थी। घोटाले को लेकर उन्होंने जो एसआईटी आईपीएस डॉ. सदानंद दाते की अगुवाई में बिठाई थी, उसकी रिपोर्ट इशारा कर रही थी कि दोनों नौकरशाहों की अहम भूमिका घोटाले में मुमकिन है। सो जांच प्रभावित होने से बचाने के लिए दोनों का सरकार में अहम कुर्सी पर रहना ठीक नहीं होगा।

त्रिवेंद्र का तकरीबन डेढ़ साल की सरकार में बड़े नौकरशाहों पर ये पहला बड़ा कदम है। साथ ही उन्होंने ये भी सन्देश देने की कोशिश की कि भ्रष्टाचार के मामले में वह अपने जीरो टालरेंस के वादे से बिल्कुल पीछे नहीं हटेंगे। इस बड़े और कड़े फैसले ने उत्तराखंड की नौकरशाही को बुरी तरह हिला डाला है। आईएएस एसोसिएशन, जिसके अध्यक्ष अपर मुख्य सचिव डॉ.रणवीर सिंह हैं और सचिव प्रमुख सचिव (गृह) आनंदबर्धन हैं, ने कोशिश की कि मुख्यमंत्री से इस मामले में औपचारिक मुलाकात कर अपनी बात रखी जाए। इससे पहले संघ ने बैठक कर सरकार के फैसले पर ऐतराज जताया था। इसकी खबर मुख्यमंत्री तक पहुंच चुकी थी। संघ का एजेंडा मालूम होने के चलते ही उन्होंने मुलाकात के लिए वक्त ही नहीं दिया। सीधे मुअत्तली का आदेश जारी कर दिया। अहम पहलू इस मामले में ये है कि मुख्यमंत्री के बेहद भरोसेमंद समझे जाने वाले और उनके अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश भी संघ के साथ हैं। फिर भी संघ को मुख्यमंत्री का वक्त तक न मिल पाना चतुर्थ तल में बदल चुके शक्ति समीकरण का इशारा साफ-साफ दे रहे हैं। दबे-खुले तौर पर ये भी कहा जा रहा है कि पाण्डेय और यादव नौकरशाही में इन दिनों मजबूती से पैठ कर चुकी गुटबाजी के शिकार ज्यादा हुए। कोई और सामान्य वक्त तथा माहौल होता तो उनके खिलाफ इतना सख्त कदम न उठता। खास तौर पर तब, जबकि एसआईटी जांच भी सामानांतर रूप से चल रही। इसमें शक नहीं कि त्रिवेंद्र ने दो नौकरशाहों और इससे पहले छह पीसीएस अफसरों समेत कई लोगों को इसी घोटाले में जेल भेज कर अपनी जीरो टालरेंस वाले एलान को मजबूती देने की कोशिश की है, लेकिन कई और मामले ऐसे हैं, जिसमें वह सवालों के घेरे में हैं। एक सचिव स्तर के आईएएस अफसर पर काफी साल पहले जिले में तैनाती के दौरान भारी गड़बड़ी का संगीन आरोप लगा था। उनको सरकार ने अहम तैनाती दी हुई है। कार्रवाई या जांच कराना तो दूर की बात है। एक पीसीएस अफसर के पास आय से अधिक संपत्ति और फर्जी सर्टिफिकेट के सहारे नौकरी लेने का आरोप है। इस मामले में भी मुख्यमंत्री खामोश हैं। शराब महकमे में अरबों रूपये के फर्जी बैंक गारंटी घोटाले का मामला सामने आया था। इसके बावजूद इसके लिए जिम्मेदार आईएएस अफसर पर कोई आंच नहीं आई। हैरानी की बात ये है कि पाण्डेय और यादव को मुअत्तल करने से पहले चार्जशीट तक देने की जरुरत महसूस नहीं की गई। सहारा महकमे में देहरादून, हरिद्वार और चम्पावत के जिला आबकारी अधिकारियों को चार्जशीट मिली हुई है। फिर भी सरकार उनको हटाने से जाने क्यों डरी हुई है। तीनों को ले कर सरकार का रुख ऐसा है मानो उनके पास सरकार को गिराने की चाबी हो।
ऋ षिकेश में एक ठेकेदार ने रात के अंधेरे में गोलियां दागी और भाग खड़ा हुआ। पुलिस मामले को दबाने में जुटी रही। जब मामला उछला तो पुलिस को रिपोर्ट दर्ज करनी ही पड़ी। हैरानी इस बात पर है कि इस गोलीकाण्ड के आरोपी ने जिस गाड़ी का इस्तेमाल भागने में किया था, वह उस आईएफएस अफसर की है, जो सालों में बेहद अहम कुर्सी पर बैठा हुआ है। दोनों की आपसी जुगलबंदी कितनी बेहतरीन है, ये इससे पता चल जाता है कि इस आईएफएस का दफ्तर उसी ठेकेदार की इमारत में है, जो आईटी पार्क में है। सवाल ये है कि पुलिस क्यों इस आईएफएस से पूछताछ तक नहीं कर रही कि उसकी गाड़ी आरोपी के पास कैसे और क्यों थी? इन सवालों के कारण सरकार पर आरोप लग रहा है कि वह पिक एंड चूज की नीति अपना रही है। जिससे खुश नहीं उसको दण्डित करो। जिसके पीछे मजबूत हाथ या अपने पाले वाले, उनकी ओर से आँखें मूँद लो। दो नौकरशाहों की मुअत्तली से त्रिवेंद्र ने देखा जाए तो मोदी सरकार के लिए परेशानी पैदा कर दी है। इससे उन्होंने ये तो साबित कर दिया कि एनएच-74 घोटाला वाकई कितना बड़ा है और किस स्तर पर लोगों का गठजोड़ दिख रहा है। ऐसे में केंद्र सरकार का घोटाले की जांच सीबीआई से न कराने का फैसला शक पैदा कर रहा है। त्रिवेंद्र सरकार सीबीआई जांच चाहती है, पर एनएच महकमे के मंत्री नितिन गडकरी ने राज्य सरकार को ऐसा न करने की हिदायत दी है कि इससे उत्तराखंड को ही नुक्सान होगा। शक जताया जा रहा है कि एनएच में बैठे बड़े मगरमच्छों को बचाने के लिए केंद्र सरकार सीबीआई जांच से बच रही है। साथ ही लोकसभा चुनाव करीब होने के कारण वह कोई जोखिम उठाना नहीं चाहती। कहीं किसी का नाम सामने आ गया तो पूरी मोदी सरकार कटघरे में आ जाएगी। न खाऊंगा न खाने दूंगा का नारा खतरे में पड़ जाएगा। एक और पहलू त्रिवेंद्र की ऑपरेशन क्लीन से सामने आ रहा है। दो नौकरशाहों के मुअत्तल होने के बाद नौकरशाहों की बड़ी जमात अब बिना ऊपर वालों के लिखित आदेश के कुछ भी करने को राजी नहीं है। साथ ही अपने स्तर पर कोई भी फैसला नहीं कर रही है। सरकार में कई काम सिर्फ ऊपर वालों के साथ बेहतर आपसी तालमेल के चलते होते रहे हैं। इससे मंत्री और विधायक ही नहीं मुख्यमंत्री भी राहत महसूस करते हैं। संयुक्त सचिव स्तर के अफसरों ने बातचीत में बताया कि ऊपर के अफसर अब उनसे फाइल जल्दी भेजो नहीं कहते हैं। वे फाइल भेज देते हैं तो उस पर जो करना हो करते है। नौकरशाहों के इस बेदिली और असंतोष के रुख के कारण फाइलों का मूवमेंट अचानक ही थम सा गया है। लोकसभा चुनाव के माहौल में सरकार का ये रुख बीजेपी के लिए भारी पड़ सकता है.पार्टी को नुक्सान हुआ तो ये खुद त्रिवेंद्र के लिए भी परेशानी की वजह बन सकता है।

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