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एक अनुकरणीय मिसाल

आलोक बी लाल

पुलिस स्टेशन के बारे में आम तौर पर जो छवि आमजन में है वह कठोरता,उदासीनता और भ्रष्टाचार की है। यही कारण है कि पुलिस शब्द के साथ बहुत कम ही ऐसा होता है कि उसे संवेदना, सहायता और सहानुभूति जैसे विशेषणों से अलंकृत किया जाए। यही कारण है कि हाल में देहरादून पुलिस का नाम जब अनाथ और अपने घरों से दुत्कारे गए बच्चों की मदद के साथ जोड़ा गया तो यह बात कुछ अखबारों की सुर्खी बनी।
आसरा नामक एक न्यास शहर के बेघर, अनाथ और माँ-बाप द्वारा घर से दुत्कारे गए ऐसे बच्चों की सेवा करता है जिनके पास भीख मांगने, कूड़ा बीनने अथवा छोटे-मोटे अपराध करने के अलावा और कोई चारा नहीं है। इनमें से किसी को विद्यालय के दआसरा ने इन बच्चों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली है जो पिछले 9 वर्षों से तन-मन-धन से इस काम में लगी हुई एक अत्यंत प्रशंसनीय संस्था है। बच्चों की पढ़ाई पर विशेष जोर दिया जा रहा है। काफी प्रयास किया गया है लेकिन कई बच्चों की क्लास अभी भी नीले आसमान के नीचे खुली जगह पर लगानी पड़ती हैं। ऐसा ही एक स्थान देहरादून से पंजाब की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित प्रेमनगर का स्कूल है जहां कमरे की व्यवस्था अभी तक नहीं हो पायी है और लगभग चार दर्जन बच्चे सडक़-किनारे बैठकर पड़ते हैं। एक भीड़-भाड़ वाले इलाके में जहां ट्रैफिक बहुत ज्यादा है बच्चों का बैठना बहुत खतरनाक हो सकता है। इस बात को समझते हुए स्थानीय पुलिस स्टेशन के प्रभारी इंस्पेक्टर मुकेश त्यागी ने अपने स्टेशन के परिसर में इन नन्हे-मुन्ने विद्यार्थियों को बैठने का स्थान दिया। इतना ही नहीं वहाँ नियुक्त कर्मचारियों ने अपनी तनख्वाह से पैसा जमा कर के इन बच्चों को भोजन भी उपलब्ध कराया, और वह बारी-बारी से इन बच्चों को पढ़ाते भी हैं।
एक तरह से पुलिस कर्मियों ने अभिभावक के रूप में इन बच्चों की जिम्मेदारी ले ली है। इंस्पेक्टर त्यागी ने बच्चों के आने-जाने की कठिनाई को समझा। उन्होंने कहा हमने देखा कि कुछ बच्चों को स्कूल तक पहुंचने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इसलिए हमने एक वैन की व्यवस्था स्थानीय नागरिकों की मदद से की। इसका असर यह हुआ कि और अधिक संख्या में बच्चे आने लगे। धीरे-धीरे और मोहल्लों और स्थानों से मदद आने लगी जिससे सुविधाओं को सुधारा जा सका है। एक व्यक्ति ने सभी बच्चों के लिए स्कूल-बैग भी दिए हैं। नीलू खन्ना और शैला बृजनाथ, जो आसरा की स्थापिका और सबसे बड़ी प्रेरणा हैं, ने इसी प्रकार के कार्यों में अपने आप को लगा दिया है। झुग्गी-झोंपड़ी में रहकर नर्क-तुल्य जीवन-यापन करने वाले बच्चों के लिए वह रिश्ता बनकर आयी हैं। नीलू खन्ना का कहना है पुलिस से जो सहयोग हमें मिला है उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसका असर यह हुआ है कि अन्य लोग भी बढ़-चढक़र हिस्सा लेने के लिए प्रेरित हुए हैं। बच्चों के माता-पिता पुलिस के होते हुए सुरक्षा को लेकर निश्चिन्त हैं और अधिक संख्या में बच्चों को भेजने को तैयार हो रहे हैं।
पुलिस के लिए यह सराहनीय कदम एक ओर तो उनकी छवि को सुधारने के लिहाज से बहुत अच्छा है, वहीं इन बच्चों के भविष्य के सुधरने के कारण अपराध की ओर अग्रसर होने की संभावना भी काम होने से उनको सुकून है। पुलिस को शायद जीवन भर के लिए बहुत भरोसे-मंद दोस्त मिले हैं। इनमे से कुछ तो पड़-लिख कर पुलिस कर्मी भी बनेंगे। इंस्पेक्टर मुकेश त्यागी और उनके साथी कर्मियों ने एक अनुकरणीय मिसाल प्रस्तुत की है।
(लेखक भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक हैं)

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