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50 हजार करोड़ के निवेश से बदलेगी सूरत!

  • कमाई बढ़ेगी, रोजगार बढ़ेगा, पलायन रुकेगा
  • गोल्डन फॉरेस्ट की जमीन पर भी नजर
  • खुर्पिया फार्म और पराग फार्म में भी उद्योग लगेंगे
  • सिडकुल के पास भी 25 सौ एकड़ जमीन
  • निवेशकों को बेहतर माहौल देने की कोशिश
  • कामयाबी पर टिका बीजेपी-त्रिवेंद्र का भी भविष्य

चेतन गुरुंग @ WeekandTimes
देहरादून। उत्तराखंड ने अब तक जितने मुख्यमंत्री दिए हैं उनमें एनडी तिवारी को आज भी सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस बात पर कोई बहस नहीं करता कि राज्य में जो भी छोटे-बड़े और मंझोले उद्योग आज हैं, वह सब तिवारी की कोशिशों और योजनाओं का नतीजा है। भले उनके राज में दारोगा, पटवारी और होम्योपैथिक चिकित्सा भरती घोटाले हुए। सिडकुल घोटाला हुआ। इसके बावजूद ये भी उतना ही सच है कि घोटालों से जुड़े लोगों पर कार्रवाई करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सिडकुल घोटाले में भले उन्होंने कोई बहुत बड़ी कार्रवाई नौकरशाहों पर नहीं की लेकिन आरोपी नौकरशाहों को उन्होंने किस तरह चलता किया, ये वही बता सकते हैं। पटवारी भर्ती घोटाले में उन्होंने जिम्मेदार नौकरशाहों को अपने रडार पर रखा। दारोगा भर्ती घोटाले में भी उन्होंने कडक़ कदम उठाते हुए डीजीपी को हटाया था। आईजीपी को मुअत्तल किया था। आज अगर सिडकुल और उत्तराखंड में औद्योगिक निवेश आया है और आने का माहौल बना है तो इसमें बहुत बड़ी भूमिका एनडी की है, इस पर कोई इनकार नहीं करेगा। उनके बाद फिर कोई मुख्यमंत्री उनकी राह पर चलता दिखा नहीं। त्रिवेंद्र सिंह रावत ही ऐसे मुख्यमंत्री आए हैं, जो एनडी की कोशिशों को आगे बढ़ा कर उत्तराखंड के लिए एक साथ कई तोहफों का बंदोबस्त करने में जुटे दिख रहे हैं। इन्वेस्टर्स समिट के जरिये वह 50 हजार करोड़ रूपये का निवेश जुटाने का लक्ष्य रखे हुआ हैं। इसका आधा भी वास्तव में आ जाता है, तो राज्य के लिए ये बहुत बड़ा वरदान होगा।

पहाड़ और राज्य से पलायन रोकने के जो दो-तीन अहम कारण है, उनमें रोजगार बहुत बढ़ा है। शिक्षा और चिकित्सा-स्वास्थ्य इसके बाद आता है। यानि, इतना बड़ा निवेश प्रदेश में आ गया तो राज्य की तो एक किस्म से बल्ले-बल्ले हो जाएगी। ऐसे में त्रिवेंद्र ने समिट के उदघाटन के लिए प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को निमंत्रित किया है तो इसमें उनकी समझदारी ही दिखती है। मोदी बहुत बड़े ब्रांड हैं। उनके हाथों इतनी बड़ी योजना की शुरुआत वाजिब है। त्रिवेंद्र पर ये आरोप लगते रहे हैं कि वह काम के मामले में सुस्त हैं। उनके राज में विकास कार्य धीमे पड़ चुके हैं। निवेश है नहीं और पलायन बढ़ता जा रहा है। उनकी तुलना शुरू से ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तेजतर्रार शैली और रफ्तार से की जाती रही। जो संयोग से पौढ़ी के ही हैं। त्रिवेंद्र के हम जिला हैं। साथ ही ठाकुर हैं,आज योगी भले कानून-व्यवस्था के मामले में घिर चुके हैं, लेकिन मुख्यमंत्री बनते वक्त उनका कोई सानी नहीं दिख रहा था। यहां तक कि उत्साही मीडिया ने उनको मोदी का विकल्प तक बोलना शुरू कर दिया था। ऐसे में त्रिवेंद्र के लिए उनकी रफ्तार के साथ सामंजस्य बिठा पाना, टेढ़ी खीर साबित हो रहा था। उन्होंने बोल भी दिया था कि मैदान और पहाड़ में गाड़ी की रफ्तार में फर्क होता है। इसके चलते आलोचकों और विरोधियों ने उनको तुरंत निशाने पर ले भी लिया था। कुछ हफ्ते पहले उनको ले कर एक वीडियो गीत झान्पू भी आ गया तो हंगामा खड़ा हो गया था। इन सब ठप्पों से लगता है कि त्रिवेंद्र आजिज आ चुके हैं। आरोपों का जवाब देने और रोजगार तथा पलायन को थामने के लिए ही उन्होंने आखिर निवेशकों को उत्तराखंड में हजारों करोड़ निवेश करने के लिए प्रेरित करने का फैसला किया है। इसके लिए वह खुद सिंगापुर और बैंकॉक हो आए। वहां के उद्यमियों से मुलाकात की और निवेश के लिए निमंत्रित कर के आए। इन्वेस्टर्स समिट में उम्मीद जताई जा रही है कि देश और विदेश से जुड़ी दिग्गज कम्पनियों के साथ ही देसी-मंझोले और छोटे उद्योग भी उत्तराखंड में निवेश के लिए उत्साह और मूड दिखाएंगे। कईयों ने तो सरकार के साथ करार भी कर लिया है। उनको जमीन उपलब्ध कराना

जरूर आसान नहीं होगा। राज्य में खाली जमीन बहुत कम है। जो हैं उसका भी बड़ा हिस्सा अदालती विवादों में उलझा हुआ है। इसके बावजूद मुख्यमंत्री को उम्मीद है कि जमीन की कमी नहीं होगी। सरकार से करार करने के बाद कम्पनियां राज्य में उद्योग स्थापित करने में देर नहीं करेगी। सरकार की कोशिश है कि सौर ऊर्जा के क्षेत्र में कम्पनियां पहाड़ों में खास तौर पर निवेश करें। इससे पहाड़ में न सिर्फ पलायन रुकेगा, बल्कि लोगों को घर बैठे रोजगार मिलेगा। चीन की सरहद करीब होने के कारण आंतरिक सुरक्षा में भी मजबूती आएगी। पलायन के कारण खाली गाँव देश की सुरक्षा के नजरिये से घातक हैं। एक सवाल ये उठाया जा रहा है कि आखिर 50 हजार करोड़ रूपये के निवेश के लिए सरकार के पास जमीन कहां है। राजस्व सचिव विनोद रतूड़ी के मुताबिक जमीन की कमी नहीं होगी। जमीन तलाश कर के मुहैय्या कराने के काम कलेक्टरों का है। जितना निवेश आ रहा है, उसके मुताबिक जमीन मिल जाएगी। सिडकुल के पास जमीन की कमी नहीं है। सिडकुल के पास ही 2500 एकड़ जमीन का पूल है। पराग फार्म और खुर्पिया फार्म में भी जमीन उपलब्ध है। देहरादून में गोल्डन फॉरेस्ट की वह जमीन भी उपलब्ध है, जो सरकार में निहित हो चुकी है। ये भी 500 हेक्टेयर से ज्यादा बताई जा रही है। ये जमीन भी जरूरत पडऩे पर कब्जे हटा के उद्योगों को सौंपे जा सकते हैं। वैसे 10 करोड़ रूपये तक के निवेश से जुड़े उद्योगों को जमीन आवंटन सम्बन्धी मंजूरी कलेक्टर ही देंगे। सरकार के पास उससे बड़े मामले ही आएंगे। सरकार और प्रदेश के लिए खुशी की बात ये है कि देश का हर बड़ा उद्योग उत्तराखंड आ रहा है। निवेशकों के सम्मलेन में देहरादून आने वालों में अम्बानी बंधुओं और चर्चित अडानी के साथ ही टाटा और बिरला तथा विदेश के बड़े उद्योगों के अफसर और मालिक खुद आ रहे हैं। जाहिर सी बात है कि 50 हजार करोड़ के दावे के आधे भी निवेशक निवेश कर देते हैं तो उत्तराखंड के लिए विकास की होड़ में आगे बनना स्वाभाविक है। सरकार इसलिए इन्वेस्टर्स समिट के साथ किसी किस्म की ढिलाई नहीं कर रही है। वह पूरी कोशिश कर रही है कि जितने भी करार सरकार के साथ उद्यमियों के इस दौरान होंगे,वे फलीभूत हो जाएं.साथ ही निवेशकों को बेहतर माहौल प्रदान करने की कोशिश लगातार जारी है। इन्वेस्टर्स समिट की कामयाबी और नाकामयाबी सियासी नजरिये से भी बहुत अहम साबित होगा। बीजेपी की झोली में लोकसभा चुनाव से पहले बड़ी उपलब्धि पेश करने के लिए होगी। त्रिवेंद्र के लिए सियासी आकाओं से अपनी पीठ थपथपवाने के लिए ये बहुत बड़ा अवसर होगा। उनकी सियासी ताकत इससे बढ़ जाएगी। साथ ही उन पर हाईकमान का भरोसा इसके बाद बहुत बढ़ जाएगा। इन्वेस्टर्स समिट की कामयाबी बीजेपी और त्रिवेंद्र के भविष्य में भी अहम भूमिका निभाएगा। इसमें शक नहीं है।

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