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हुक्मरान की हैसियत में नौकरशाह

मैंने मंत्री बन चुके ऐसे ही एक सज्जन से पूछा कि क्या वाकई इतना पैसा उन्होंने अपने चुनाव में खर्च किये थे? मैं हैरान रह गया, जब उन्होंने कहा कि हां, पैसा पानी की तरह बहाना पड़ा। क्या करते, चुनाव तो जीतना ही था। मैंने पूछा कि फलाने के बारे में बहुत हल्ला था कि 40 करोड़ तक खर्च किये, ये कैसे मुमकिन हैं। उन्होंने कहा कि बिल्कुल हुए होंगे, आजकल कार्यकर्ता और नीचे जिम्मेदारी संभालने वाले छुटके नेता बहुत चालाक हो चुके हैं। वे पैसा कमाने का मौका कतई नहीं चूकना चाहते हैं। ज्यादातर मतदाताओं तक पैसा पहुंच जाए और वोट पक्के हों, इसके लिए जरूरत से ज्यादा बजट का बंदोबस्त रखना पड़ता है। इसमें बिचौलिए का हिस्सा बिना बोले शामिल करना होता है। मैं हैरान था अब ऐसे माहौल में जब मैं देखता हूं कि विधानसभा सत्र जब चल रहा होता है तो ज्यादातर वक्त सदन खाली रहता है…

चेतन गुरुंग

विधायकों के लिए आम तौर पर अपने क्षेत्र से निकल पाना आसान साबित नहीं होता। आए दिन उनके पास लोग शिकायत ले के पहुंचते हैं। इनमें हर तरह की शिकायतें होती हैं। कोई नौकरी या रोजगार के लिए खुद आता है तो कई अपने बच्चों को नौकरी दिलाने की फरियाद लेकर मिलते हैं। कुछ बीमारी का इलाज कराने की मांग करते हैं। कुछ मुफलिसी का वास्ता दे कर आर्थिक मदद की गुजारिश करते हैं। ऐसे लोग भी होते हैं जो बेटी की शादी के लिए मदद मांगते हैं। जमीन-जायदाद से जुड़ी दिक्कतें। आज कल तो रेत-बजरी के खनन का ठेका दिलाने या फिर सीधे स्टोन क्रशर का लायसेंस मांगने पहुंचते हैं। उत्तर प्रदेश के जमाने में फिर भी विधायकों का जोर रहता था। प्रशासन में, शासन में भी किसी नौकरशाह से मिल कर अपनी सियासत का वास्ता देते थे, तो काम हो जाता था। मंत्री लोग भी सुन लेते थे।
उत्तराखंड बनने के बाद जमाना इतनी रफ्तार से बढ़ा कि हैरानी होती है। मैं कईयों को जानता हूं, मंत्री, पूर्व मंत्री, विधायक और पूर्व विधायक। इनमें से कई ऐसे हैं, जिनका उन लोगों से सीधा वास्ता है, जिनको हम आम बोलचाल में माफिया कहते हैं। खनन, शराब और जमीनों से वास्ता रखते हैं। लिहाजा उनकी दिलचस्पी अवाम के कामों को कराने के साथ-साथ अपने उन निजी कामों को कराने में भी ज्यादा दिखती है, जिनसे वे माल कमाते हैं। वे भी क्या करें, विधानसभा चुनाव ही इतने महंगे हो चुके हैं कि अब मामूली अमीर के वश से बाहर का मामला हो चुका है चुनाव लडऩा।
वैसे तो कांग्रेस-बीजेपी का टिकट पाना ही सबसे बड़ा महाभारत होता है। मिल गया तो चुनाव लडऩे के लिए रुपल्ली का बंदोबस्त करना बहुत ही दिक्कत का काम। जिसको टिकट मिल जाता है, वह दो टास्क अपने सामने रख के चलते हैं। एक चुनाव में रुपल्ली की कमी न रहे। ऐसा न हो कि खर्च न कर पाने के कारण सीट हाथ से निकल गई। इसके साथ दूसरा लक्ष्य रहता है, अगले चुनाव का। खुदा न खास्ता अभी का चुनाव हार गए तो अगले चुनाव के लिए खजाना मौजूद रहे। हारे हुए को कोई जल्दी से फंड नहीं देता है। पिछले विधानसभा चुनाव नोटबंदी के दौर में हुए थे। इसके बावजूद मैंने कइयों के बारे में सुना कि उन्होंने 10 करोड़ रुपये तक चुनाव में खर्च किये। एक कद्दावर पूर्व कांग्रेसी और मौजूदा बीजेपी नेता के बारे में तो ये चर्चा खूब रही कि उन्होंने 40 करोड़ रुपये खर्च किये। ये वाकई बहुत बड़ी रकम थी। जल्दी से यकीन नहीं आया। मुझे ही क्या, किसी और को भी यकीन न आए। मैंने मंत्री बन चुके ऐसे ही एक सज्जन से पूछा कि क्या वाकई इतना पैसा उन्होंने अपने चुनाव में खर्च किये थे? मैं हैरान रह गया, जब उन्होंने कहा कि हां, पैसा पानी की तरह बहाना पड़ा। क्या करते, चुनाव तो जीतना ही था। मैंने पूछा कि फलाने के बारे में बहुत हल्ला था कि 40 करोड़ तक खर्च किये, ये कैसे मुमकिन हैं। उन्होंने कहा कि बिल्कुल हुए होंगे, आजकल कार्यकर्ता और नीचे जिम्मेदारी संभालने वाले छुटके नेता बहुत चालाक हो चुके हैं। वे पैसा कमाने का मौका कतई नहीं चूकना चाहते हैं।
ज्यादातर मतदाताओं तक पैसा पहुंच जाए और वोट पक्के हों, इसके लिए जरूरत से ज्यादा बजट का बंदोबस्त रखना पड़ता है। इसमें बिचौलिए का हिस्सा बिना बोले शामिल करना होता है। मैं हैरान था अब ऐसे माहौल में जब मैं देखता हूँ कि विधानसभा सत्र जब चल रहा होता है तो ज्यादातर वक्त सदन खाली रहता है, इस बार भी मैं देख रहा था, कि कई मौके ऐसे आए जब विपक्ष और पक्ष के विधायकों की तादाद सदन में तकरीबन बराबर थी। कांग्रेस के लोग तो सदन में रहते थे, लेकिन बीजेपी के विधायकों को आप सदन के दौरान भी मुख्यमंत्री, मंत्री या फिर नौकरशाहों के दफ्तरों में खूब देखा गया। सदन खत्म होते ही शाम को उनकी कोशिश जल्दी से जल्दी सचिवालय पहुँचने और अफसरों से मिल कर अपने काम कराने की रहती दिखी। सदन की गरिमा का अंदाज या ख्याल से उनका कोई मतलब अब नहीं दिखता है। सरकार में नौकरशाहों का जलवा हमेशा रहा है। मंत्रियों से जो काम नहीं होते हैं, वे काम नौकरशाह सीधे कर देते हैं। यही वजह है कि विधायकों की भी? मंत्रियों से ज्यादा नौकरशाहों के दफ्तरों में रहती है।
नौकरशाहों की ताकत का अहसास मैंने कई मर्तबा करीब से किया है। बीसी खंडूरी के वक्त प्रभात कुमार सारंगी का कहना, खंडूरी का कहना हुआ करता था। मंत्री लोग इसके चलते सारंगी के दफ्तर और घर में हाजिरी बजाया करते थे। उससे पहले एम रामचंद्रन का गजब का दबदबा रहा। ये बात अलग है कि वह मंत्रियों और विधायकों के सम्मान का पूरा ख्याल रखा करते थे। फिर भी ये कहने में कोई हर्ज नहीं कि रामचंद्रन का कहना उन दिनों पत्थर की लकीर हुआ करता था। कोई काम अगर मंत्री या मुख्यमंत्री न करा पा रहे हों तो रामचंद्रन को बोल देना नतीजा परक होता। फिर राकेश शर्मा के जमाने में मंत्रियों और विधायकों की कुव्वत ही खत्म हो गई थी। शर्मा में ये खूबी थी कि वह नेताओं के उन कामों को कर देने या कराने में यकीन रखते थे, जो हो सकते हों। उसके लिए चाहे नियमों को थोड़ा-बहुत आगे-पीछे करना पड़े। वह दरअसल नतीजा प्रेमी नौकरशाह थे, मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, हरीश रावत और दोनों से पहले खंडूरी और रमेश पोखरियाल निशान आँख मूँद के यकीन रखते थे। उनकी कार्यशैली तूफानी होती थी। इसके चलते कई बार मातहत परेशान हो जाते थे कि कहीं फंस न जाए।
अब जब अफसरों का सरकार में ऐसा जलवा रहेगा तो सदन में विधायकों की मौजूदगी भला कहाँ से दिखेगी। उनको अपने क्षेत्र के लोगों के काम कराने होते हैं और अगले चुनाव का बंदोबस्त भी। मुख्यमंत्री और मंत्री से गुजारिश करने में एक नुकसान ये रहता है कि उनके पत्ते खुल जाने की आशंका रहती है। नौकरशाह आम तौर पर जुबान बंद रखते हैं, ये मेरा अनुभव कहता है,
अगर विधायकों और जन प्रतिनिधियों का सरकारों में सम्मान रहता तो सदन की दशा ऐसी न होती। विधायक आराम से और पूरी तैयारी से सदन आते। सरकार से सवाल पूछते और काम होने का आश्वासन लेते। अब छोटे से उत्तराखंड में 71 विधायक हैं। ऐसे में ज्यादातर विधायकों के सवालों को उठने का मौका ही नहीं मिल पाटा है। सो आश्वासन लेने का जुगाड़ भी नहीं बना पाते हैं। अफसर उनकी इतनी सुनते नहीं हैं कि फोन पर ही काम हो जाने का विश्वास जगे। सो सदन छोड़-छोड़ वे अफसरों से मिलने भागते दिखते हैं। वहां उनके आगे रिरियाते तक मैंने कईयों को पहले भी देखा है और आज भी देख रहा हूं।
एक नौकरशाह से तो विधायकों को इतना भय रहता था कि भाई साहब या सर से नीचे उनको बुलाते ही नहीं थे। वह मुख्यमंत्री कार्यालय में थे, मुख्यमंत्री का विवेकाधीन कोष देखते थे, मुख्यमंत्री से विधायक और मंत्री विवेकाधीन कोष से पैसा स्वीकृत करा लाते थे, वह सचिव काट-वाट के मदद की रकम इतनी कम कर देते थे कि विधायकों के लिए मदद की इतनी छोटी रकम का चेक लेकर जरूरतमंद तक पहुंचना आसान नहीं रहता था। इसलिए जब ये हल्ला रहता है कि सरकार कोई भी हो, हावी नौकरशाह ही रहेंगे, तो पक्का यकीन हो जाता है कि इसमें वाकई सच्चाई है। ये हालात, ऐसा दौर ठीक नहीं,अगर लोकतंत्र में यकीन बनाए रखना है, नौकरशाहों को शासक न बनाओ, जरिया बनाओ काम करने और कराने का,तभी देश-प्रदेश आगे बढ़ेगा।

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