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चुनौतियों से सहमी भाजपा तलाश रही राह

  • पिछड़ों और दलितों को लुभाने की कोशिश में जुटी
  • मुस्लिम महिलों को भी पक्ष में करने को बदला पैतरा
  • किसानों को पार्टी के पक्ष में लामबंद करने को खोला खजाना
  • सवर्ण चुनौती से निपटने के लिए भाजपा बना रही रणनीति

Sanjay Sharma @WeekandTimes

विपक्ष के हमलों, किसान आंदोलनों, दलितों के आक्रोश और सवर्णों के तेवरों को देखकर भाजपा सहमी सी नजर आ रही है। लोकसभा चुनाव से पहले ये स्थितियां भाजपा के लिए अनुकूल नहीं कही जा सकती हैं। लिहाजा वह इन सबकी काट खोजने में जुट गई है। दलितों को लुभाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए मोदी सरकार ने एससी-एसटी एक्ट को फिर से बहाल कर दिया है। किसानों को लुभाने के लिए केंद्र और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने खजाने का मुंह खोल दिया है। मिशन 2019 का लक्ष्य हासिल करने के लिए भाजपा ने पिछड़ों पर भी डोरे डालने शुरू कर दिए हैं। वह पिछड़ी जातियों का महासम्मेलन कर रही है। मुस्लिम महिलाओं को अपने पक्ष में करने के लिए भाजपा सरकार ने तीन तलाक पर अध्यादेश जारी कर दिया है। इन सबके बावजूद उसको सबसे बड़ी चुनौती उसके वोट बैंक यानी सवर्ण दे रहे हैं। आरक्षण के मुद्दे पर पूरे देश में सवर्णों ने जोरदार आंदोलन शुरू कर दिया है। सवर्णों ने साफ कह दिया है कि यदि आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान और एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बहाल नहीं किया गया तो वे भाजपा को वोट करने की बजाय नोटा का बटन दबाएंगे। सवर्णों का यह आक्रोश भाजपा के गले की फांस बनता जा रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इन सारी चुनौतियों और विपक्ष के हमलों से कैसे बचकर निकलती है।

……जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आता जा रहा है, भाजपा की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। एक ओर गठबंधन ने उसकी नींद उड़ा दी है तो दूसरी ओर विभिन्न वर्गों में फैले असंतोष ने उसके माथे पर चिंता की लकीरें गाढ़ी कर दी हैं। अभी तक भाजपा के वोट बैंक माने जा रहे सवर्ण भी सरकार के खिलाफ सडक़ पर उतर आए हैं। सवर्णों की नाराजगी को देखते हुए भाजपा सभी वर्गों को अपने पक्ष में करने में जुटी है। यही वजह है कि वह पिछड़ों के साथ-साथ किसानों और दलितों को भी रिझाने में लगी है। दलितों को लुभाने के लिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के एससी-एसटी एक्ट के संशोधन वाले फैसले को खारिज कर दिया है। इसके अलावा साफ तौर पर कह दिया है कि दलितों को मिलने वाला आरक्षण खत्म नहीं किया जाएगा। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण पर दिए अपने फैसले की गेंद राज्य सरकारों के पाले में डाल दी है। एससी-एसटी को प्रमोशन मेें आरक्षण देने का अधिकार राज्यों को सौंप दिया गया है। जाहिर है लोकसभा चुनाव को देखते हुए कोई भी सरकार इस मामले से छेड़छाड़ शायद ही करे। कम से भाजपा शासित प्रदेशों में सरकारें प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था को जारी रखेगी। वहीं किसानों को भाजपा एक वोट बैंक में तब्दील करने में जुट गई है। मोदी सरकार ने बजट में अपना फोकस किसानों पर रखा ताकि किसानों को सकारात्मक संदेश दिया जा सके। इसके अलावा किसानों को फसल की लागत का कम से कम डेढ़ गुना दाम दिलाने के वायदे को पूरा करने की दिशा में कदम उठाते हुए सरकार ने धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 200 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ा दिया है। भाजपा ने 2014 में किसानों से साथ चुनावी वादा किया था कि वह किसानों को उनकी लागत का डेढ़ गुना मूल्य दिलाएगी। इसे पूरा करने के लिए सरकार ने पहली फरवरी को पेश किए गए अपने आखिरी पूर्ण बजट में इस वायदे को पूरा करने की घोषणा की। इसके तहत 14 खरीफ की फसलों को शामिल किया गया। यही नहीं हाल में मोदी सरकार ने किसानों को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने के लिए नई खरीद नीति को मंजूरी दे दी। इसके तहत अगर बाजार में सरकार द्वारा निर्धारित दाम से ज्यादा गिरावट आती है तो भी किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाएगा। यह नई नीति खेती करने वाले किसानों को कर्ज मुक्ति में भी मदद करेगी। इस नीति के तहत फसल सरकार द्वारा खरीदी जाएगी और न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों के खाते में जाएगी। इसमें सरकार को करीब 40 हजार करोड़ का अतिरिक्त भार आएगा। देश में करीब 12 करोड़ किसान है। यदि भाजपा ने इसको साध लिया तो लोकसभा चुनाव में उसको निश्चित तौर पर फायदा मिलेगा। वहीं उत्तर प्रदेश में योगी सरकार भी किसानों को रिझाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। पिछले दिनों सरकार ने गन्ना किसानों के भुगतान के लिए चीनी मिलों को लोन के रूप में भारी भरकम राशि देने की घोषणा की थी। गौरतलब है कि भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 सीटें जीती थीं और दो सीटें उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल ने जीतीं थीं। भाजपा आलाकमान इस बार भी उत्तर प्रदेश में अपना पुराना प्रदर्शन दोहरा चाहते हैं। इसके अलावा भाजपा पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों को भी साधने में जुटी है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को गैर-यादव पिछड़ी जातियों विशेषकर कुर्मी, मौर्य, लोधी जैसी जातियों का खुला समर्थन मिला था। वर्ष 2017 में पहला मौका था जब भाजपा के सौ से अधिक विधायक पिछड़े वर्ग से चुनकर आए थे। इसी समर्थन के एवज में भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य उपमुख्यमंत्री बनाए गए। पिछड़ों को साधने के लिए भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य को कमान सौंपी है। इसके अलावा वह अतिपिछड़ों पर भी फोकस कर रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में पहली बार अति पिछड़ी जातियां भाजपा के समर्थन में आ खड़ी हुईं। अति पिछड़ा वर्ग में आने वाली गडेरिया, पाल, बघेल, केवट, मोमिन, तेली, कुम्हार, कहार, कश्यप, नाई, राजभर जैसी जातियों की गोलबंदी ने इन्हें एक बड़े वोट बैंक के रूप में तैयार किया है। पिछड़े वर्ग की निषाद उपजाति के मतदाताओं पर भी भगवा दल का खास फोकस है। गोरखपुर लोकसभा के उपचुनाव में निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के बेटे प्रवीन निषाद ने सपा के टिकट पर भाजपा को पटखनी दी थी। पूर्वांचल की एक दर्जन से अधिक लोकसभा सीटों पर निषाद मतदाताओं की अच्छी संख्या है। इस वर्ग को लुभाने के लिए इलाहाबाद के शृंगवेरपुर में भगवान राम और महाराजा निषाद की गले मिलती हुई भव्य प्रतिमा लगाने की सरकार की योजना है। वहीं एटा में वीरांगना अवंतीबाई के नाम पर मेडिकल कॉलेज खोलकर भाजपा सरकार विधानसभा चुनाव में लोधी मतदाताओं के समर्थन को अगले लोकसभा चुनाव में भी बरकरार रखना चाहती है। वहीं मुस्लिम महिलाओं को भी भाजपा अपने पक्ष में लाना चाहती है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में काफी तादाद में मुस्लिम महिलाओं ने वोट किया था। यही वजह है कि संसद में तीन तलाक संशोधन बिल पास नहीं होने पर सरकार ने इसे अध्यादेश के जरिए देश में लागू कर दिया। इसका मुस्लिम वर्ग की महिलाओं ने स्वागत भी किया है। इन सबके बावजूद सवर्णों के क्रोध को शांत करने का कोई उपाय भाजपा को नहीं सूझ रहा है। देखना यह होगा कि क्या ये तमाम पैंतरे भाजपा को लोकसभा चुनाव में काम आते हैं या नहीं।

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