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विस अधिसूचना सियासी चेहरे फिक्रमंद

2014 आम चुनाव के बाद से लेकर अब तक हर चुनाव में बीजेपी स्थानीय नेतृत्व के बजाय पीएम मोदी के करिश्मे पर अधिक निर्भर रही है। अधिकतर मौकों पर पार्टी को उसका लाभ भी मिला है। पीएम मोदी पर बीजेपी की निर्भरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले चार साल में उन्होंने विधानसभा चुनावों में करीब 400 रैलियां की हैं। जाहिर है, इन चुनावों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रहेगी। ऐसे में अगर बीजेपी के लिए बेहतर परिणाम आए तो आम चुनाव से ठीक पहले यह मोदी लहर 2.0 माना जाएगा जिसका लाभ पार्टी को आम चुनाव में मिल सकता है।

नरेंद्र नाथ

मध्यप्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और मिजोरम विधानसभा चुनावों की अधिसूचना जारी हो गई। इन चुनावों को लेकर उत्सुकता इस वजह से है कि लोकसभा चुनावों से ठीक पहले पांच राज्यों के वोटरों के मिजाज का पता चलेगा और इससे काफी हद तक 2019 के चुनावों की लहर का अंदाजा मिल जाएगा। आम चुनाव मार्च-अप्रैल में होने की उम्मीद है। इसमें दिलचस्प बात यह आ रही है कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियां इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों को लोकसभा चुनावों से जोडक़र देखने की बात करने से बच रही हैं।

असर तो दिखेगा ही
भले ही कांग्रेस और बीजेपी दोनों राष्ट्रीय दल अपने-अपने कारणों से इन चुनावों को राज्य तक ही सीमित रखने की कोशिश कर रही हैं लेकिन इसके व्यापक असर दिखेंगे ही। जिन पांच राज्यों में चुनाव होंगे वहां लोकसभा की कुल 73 सीटें हैं। चुनाव विश्लेषक यशवंत देशमुख के अनुसार, अभी जो राजनीतिक हालात हैं उसमें इन राज्यों में जो पार्टी बढ़त बना लेगी, वह यहां से आगे ही जाएगी। अलग-अलग कारणों पर बात करें तो ये विधान सभा चुनाव इन दो मुख्य पहलुओं पर असर डाल सकते हैं।

विपक्षी महागठबंधन
अगर इन चुनावों में कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया तो राहुल गांधी विपक्षी गठबंधन की धुरी बन जाएंगे और आम चुनाव से पहले उनके एक होने की संभावना बढ़ जाएगी। कांग्रेस की पूछ बढ़ जाएगी और क्षेत्रीय दलों को उनकी शर्तें मानने की मजबूरी बढ़ जाएगी। इसके ठीक उलट, खराब प्रदर्शन से पूरा विपक्ष बिखर जाएगा। इनमें कांग्रेस की प्रासंगिकता कम हो जाएगी। मिसाल के तौर पर बीएसपी ने इन राज्यों में अब तक अकेले चुनाव लडऩे का फैसला लिया है। अगर कांग्रेस बिना बीएसपी के भी बेहतर प्रदर्शन करने में सफल रही तो उसका असर उत्तर प्रदेश चुनाव पर पड़ेगा लेकिन खराब नतीजे रहे तो मायावती कांग्रेस को पूरी तरह दरकिनार कर सकती हैं। दूसरे सहयोगी दल भी कांग्रेस को आंख दिखा सकते हैं। राहुल गांधी के लिए भी ये चुनाव बेहद महत्वपूर्ण होंगे।

मोदी लहर का मेक या ब्रेक मोमेंट पर
2014 आम चुनाव के बाद से लेकर अब तक हर चुनाव में बीजेपी स्थानीय नेतृत्व के बजाय पीएम मोदी के करिश्मे पर अधिक निर्भर रही है। अधिकतर मौकों पर पार्टी को उसका लाभ भी मिला है। पीएम मोदी पर बीजेपी की निर्भरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले चार साल में उन्होंने विधानसभा चुनावों में करीब 400 रैलियां की हैं।
जाहिर है, इन चुनावों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रहेगी। ऐसे में अगर बीजेपी के लिए बेहतर परिणाम आए तो आम चुनाव से ठीक पहले यह मोदी लहर 2.0 माना जाएगा जिसका लाभ पार्टी को आम चुनाव में मिल सकता है लेकिन नतीजे उलट आए तो उसका जोखिम भी हो सकता है। मोदी लहर ठीक ऐसे समय में सवालों में आएगी जब पार्टी को इसकी सबसे सख्त जरूरत होगी।

बीजेपी का मंथन
लोकसभा चुनाव से पहले ‘ओपिनियन पोल’ नहीं बनाने के पीछे बीजेपी का अपना मंथन है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में डेढ़ दशक से बीजेपी की सरकार है। राजस्थान में हर बार सरकार बदलने का ट्रेंड रहा है जबकि तेलंगाना में पार्टी सत्ता की मुख्य दौड़ में नहीं लग रही है। ऐसे में पार्टी को लगता है कि लोकसभा चुनाव से जोडक़र इन चुनावों में उतरी तो इसका नुकसान भी हो सकता है।
हालांकि 2013 में पार्टी ने तब पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इन्हीं राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ ही आम चुनाव का बिगुल फूंक दिया था जिसमें उसे सफलता भी मिली लेकिन इस बार हालात उतने आसान नहीं हैं। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि अगर इन राज्यों में अपेक्षित परिणाम नहीं भी आए तो मोदी के जादू के भरोसे पार्टी आम चुनाव में वापसी कर लेगी। इसके पीछे का तर्क है, तमाम ओपिनियन पोल में जो कॉमन बात सामने आई उसके अनुसार राज्यों में बीजेपी की सरकार मुश्किल में तो है पर पीएम मोदी के कारण केंद्र सरकार के खिलाफ नाराजगी नहीं है।

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