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मंत्री हो या नौकरशाह, घोटाला किया तो बख्शेंगे नहीं

  • मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की वीकएंड टाइम्स खास बातचीत
  • बिना सियासी संरक्षण के एनएच-74 घोटाला नामुमकिन
  • नाजायज दबाव में नहीं आएगी सरकार
  • सरकार और बीजेपी लॉबिंग से मुक्त
  • उत्तराखंड की तस्वीर बदल देगा निवेश
  • पहाड़ों में निवेश पर खास जोर देगी सरकार
  • पन्त समिति की रिपोर्ट मिलते ही भत्ते भी दे दिए जाएंगे
  • हाई कोर्ट में हार के बावजूद सरकारी वकीलों से नाखुश नहीं
  • कुलपतियों की खाली कुर्सियां जल्द भर दी जाएंगीं

चेतन गुरुंग
देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की सरकार आम तौर पर कामकाज में धीमी होने और नतीजा देने के मामले में पिछडऩे के आरोप सहती रही है। त्रिवेंद्र की तुलना उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से गाहे-बागाहे होती रहती है। इसकी एक वजह दोनों का साथ-साथ मुख्यमंत्री बनना और एक ही जिले पौढ़ी से होना है। लोकसभा चुनाव और उससे पहले स्थानीय निकाय चुनावों में बेहतर नतीजे देने का दबाव त्रिवेंद्र पर है। इसके बावजूद वह हड़बड़ी में नहीं दिखाई देते हैं। वह आरोपों और दबाव के बावजूद अपने ही अंदाज में काम कर रहे हैं। इन्वेस्टर्स समिट के बाद उनमें अब ज्यादा आत्म विश्वास झलकता है। खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह समिट के उदघाटन के दौरान उनकी पीठ ठोंकी, उससे जाहिर होता है कि उनको कम से कम हाई कमान की तरफ से कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है। मैं इंटरव्यू करने के लिए जब उनके सरकारी आवास पहुंचा तो उनके यहां पिछले मुख्यमंत्रियों के यहाँ हर पल दिखाई देने वाली भीड़ का दूर तक नामो-निशान नहीं था। दरअसल वह मिलते सभी से हैं, लेकिन इसके लिए उनके यहाँ सिस्टम बना हुआ है। ऐसा इसलिए कि किसी को भी गैर जरूरी तौर पर घंटों वक्त बर्बाद न करना पड़े। वक्त पर मुख्यमंत्री से मुलाकात हो जाए। इन्वेस्टर्स समिट उनका आज की तारीख में ड्रीम प्रोजेक्ट है। समिट में देश-विदेश के निवेशकों और उद्योगों ने जबरदस्त उत्साह दिखाया। सवा लाख करोड़ के प्रस्ताव अभी तक निवेश के आ चुके हैं। ये बात अलग है कि इतने उद्योगों के लिए सरकार के पास जमीन है भी या नहीं, ये सवाल उठ रहे हैं। इसका जवाब मुख्यमंत्री ने तैयार रखा हुआ है। उनके मुताबिक उद्योगों की स्थापना के लिए जमीन की कोई कमी नहीं है। जरूरत पड़ी तो निजी औद्योगिक क्षेत्र सिडकुल की तर्ज पर विकसित किए जाएंगे।

………उन्होंने ये भी माना कि उत्तराखंड की नौकरशाही को हिला के रख देने वाले एनएच-74 जैसा बड़ा घोटाला बिना बड़े सियासी संरक्षण के अंजाम नहीं दिया जा सकता। अपने छोटे से भीतरी दफ्तर में, जिसमें वह सिर्फ पहले से तय कार्यक्रम के मुताबिक ही लोगों से मिलते हैं, में मुख्यमंत्री ने साफ किया कि जो लोग सरकार पर और उन पर दबाव डाल कर बात मनवाना चाहते हैं, वे पुनर्विचार कर लें तो बेहतर होगा। वह दवाब में कोई भी गलत काम करने वाले नहीं हैं। न ही किसी गलत काम को नजर अंदाज करेंगे। इन्वेस्टर्स समिट के बारे में कहा कि निवेश के करार सरकार और उद्योगों में हो चुके हैं। निवेशक आए जा रहे हैं। उनके उत्साह से साबित होता है कि उत्तराखंड को ले कर उनमें न सिर्फ बहुत यकीन है बल्कि सरकार की कोशिशें रंग ला रही हैं। मैंने खुद देश-विदेश के जो दौरे निवेश को ले कर किए। वे रंग ला रहे हैं। मुख्य सचिव और अन्य नौकरशाहों ने भी देश भर में निवेशकों संग मुलाकातें कर उनको उत्तराखंड में निवेश के लिए प्रेरित किया है। प्रधानमंत्री मोदी समिट का उदघाटन करने देहरादून आए। त्रिवेंद्र को हकीकत का भी अंदाज है। उनको पता है कि करार के मुताबिक पूरा निवेश कहीं भी और कभी भी नहीं हो पाता है। यही वजह है कि जब मैंने इससे मुताल्लिक सवाल पूछा तो उन्होंने माना-करार का 50 फीसदी भी क्रियान्वित हो जाता है तो यह उनके और उत्तराखंड के लिए बहुत बड़ी कामयाबी होगी। वह बहुत खुश होंगे। अगर ऐसा हो जाता है। उनकी कोशिश है पहाड़ों में निवेश लाने की। वहां प्रदूषणरहित उद्योगों को स्थापित करने की। इसके लिए वे जितने चाहे उतनी जमीन खरीद सकते हैं। हमने इसके लिए व्यवस्था की है। करारों को सरकारी तंत्र के कारण अमली जामा पहनाने में दिक्कत न हो, इसके लिए बंदोबस्त भी किए जा चुके हैं। मुख्यमंत्री सचिवालय में इन्वेस्टर्स सेल का गठन किया गया है। ये उद्यमियों की समस्याओं को सुल्टाएगा। प्रदेश में हर क्षेत्र के उद्योग करार कर रहे हैं। सरकार निवेश के नजरिये से न सिर्फ सरकारी औद्योगिक क्षेत्र विकसित करेगी बल्कि सिडकुल की तर्ज पर निजी औद्योगिक क्षेत्रों को भी बढ़ावा देगी। भगवानपुर में पहले से ऐसा आस्थान अस्तित्व में है। एनएच-74 घोटाले में त्रिवेंद्र सरकार न सिर्फ दो दर्जन लोगों को, जिनमें छह पीसीएस अफसर भी हैं, जेल भेज चुकी है,बल्कि दो आईएएस अफसरों डॉ.पंकज पाण्डेय और चंद्रेश यादव को मुअत्तल भी किया है। शोर ये भी है कि इस घोटाले में कई सियासतदां की भी अहम भूमिका रही है। जो कभी कांग्रेस थे, अब बीजेपी और सरकार में हैं। इससे जुड़े सवाल के जवाब में मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया कि इसमें बड़े स्तर पर सियासी संरक्षण घोटालेबाजों को हासिल था। इसके बगैर ये घोटाला मुमकिन ही नहीं था। जिस तरह आईएएस अफसरों के खिलाफ सरकार कठोर कार्रवाई इस घोटाले में कर रही, वैसी कार्रवाई जांच के घेरे में अगर कोई मंत्री या राजनेता आता है तो उसके खिलाफ भी होगी? ये पूछे जाने पर मुख्यमंत्री ने कहा कि घोटालेबाज कोई भी हो, बख्शा नहीं जाएगा। जो भ्रष्टाचार करता है वह भ्रष्टाचारी होता है, और कुछ नहीं। इसमें कोई शक ही नहीं है कि अफसरों ने लालच या फिर सियासी दबाव में घोटाले को अंजाम दिया। घोटाले की सीबीआई जांच न होने और अभी तक एनएचएआई के किसी भी अफसर के खिलाफ कोई कार्रवाई न होने पर भी मुख्यमंत्री ने जवाब दिया उनके मुताबिक-मुझे नहीं लगता कि इस घोटाले की सीबीआई जांच जरूरी है। एसआईटी बढिय़ा काम कर रही है। ये सही नहीं है कि एनएचएआई वालों को पूछताछ से मुक्त रखा गया है। उनसे भी पूछताछ होगी। कर्मचारियों की हड़तालों पर उन्होंने कहा कि सरकार सभी का ख्याल रखती है। चाहे वह कर्मचारी हो या फिर शिक्षक,उनकी वाजिब बातों को सुनती है। उस पर अमल भी करती है, जिनको दबाव डाल के मांगें मनवाने की गलतफहमी है, वे पुनर्विचार कर लें। सरकार की पूरी सहानुभूति कर्मचारियों के साथ है पर नाजायज तरीके से दबाव को वह कभी सहेगी नहीं। त्रिवेंद्र सरकार में नौकरशाहों को ताश के पत्ते की तरह जल्दी-जल्दी नहीं फेंटा जा रहा है। इस मामले में काफी स्थिरता सरकार ने दिखाई है। इस मामले में उन्होंने कहा कि अफसर सरकार के हाथ-पैर होते हैं। वे मजबूत रहेंगे तो सरकार भी मजबूत रहेगी। बहुत जरूरी होने पर ही वह अफसरों को हटाने में यकीन रखते हैं। अफसरों को अपनी काबिलियत दिखाने का मौका पूरा दिया जाना चाहिए। जल्दी-जल्दी तबादलों से उनका और बाकियों का आत्मविश्वास हिलता है। इससे विकास कार्य प्रभावित होते हैं। जिलाधिकारियों और पुलिस कप्तानों में कुछ स्थानों पर अहं की लड़ाई सामने आने के सवाल पर रावत ने कहा कि उनको ऐसा नहीं लगता है। उत्तराखंड पुलिस एक्ट के बाद जिलाधिकारियों और पुलिस कप्तानों में सामंजस्य न होने या फिर अहं के टकराव के कारण प्रशासन पर असर की बात सही नहीं है। कुछ अपवाद हो सकते हैं। फिर भी उनके वक्त में दोनों जिम्मेदार अफसर मिल-जुल के काम कर रहे हैं। कर्मचारियों में सातवें वेतन आयोग के मुताबिक भत्ते न मिल पाने पर असंतोष के बाबत उन्होंने कहा कि सरकार इस दिशा में गंभीर है। वित्त मंत्री प्रकाश पन्त की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट के बाद इनको लागू कर दिया जाएगा। त्रिवेंद्र मंत्रिपरिषद में दो खाली सीटें भरने के मामले में अभी भी जल्दबाजी नहीं करना चाहते। बेशक सरकार को डेढ़ साल होने वाले हैं। इससे जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि दोनों सीटों को भरने का मामला विचाराधीन है। ऐसा नहीं है कि उनकी मंशा इनको खाली ही रहने देने की है। उन्होंने इस बात से इनकार किया कि इस फैसले के पीछे मितव्ययता की सोच है। भले इससे मितव्ययता का सन्देश जाता है। त्रिवेंद्र उन मुख्यमंत्रियों में शुमार हैं, जिन पर राष्टï्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ ही प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का पूरा विश्वास और विधानसभा में भरपूर बहुमत है। इससे कई बार मुख्यमंत्री पर अतिरिक्त दबाव बन जाता है। त्रिवेंद्र इससे दूर दिखते हैं। उनके मुताबिक मंत्रिपरिषद और पार्टी का विश्वास उनके साथ है। दोनों से पूछ कर ही फैसले लिए जाते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि पार्टी और सरकार में एक लॉबी उनके खिलाफ बहुत खामोशी संग काम कर रही है। जो उनको हटाने की कोशिश में है, इस मामले में पूछे जाने पर उन्होंने साफ तौर पर ऐसी किसी भी साजिश या कोशिशों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि दोनों ही स्तर पर माहौल बहुत सकारात्मक और सहयोगात्मक है। इसके कारण वह सरकार चलाने में पूरा ध्यान लगा पा रहे हैं। उन्होंने इस बात से भी इनकार किया कि सरकार के पास कमाई के साधन कम हैं, या फिर राजस्व में कमी आई है। खास तौर पर जीएसटी और नोटबंदी के कारण। बकौल त्रिवेंद्र-शुरूआती दौर में नोटबंदी और जीएसटी लागू होने से राजस्व में कमी आई। ये सच है पर ये एक छोटा सा दौर था। अब सब कुछ सामान्य हो चुका है। राजस्व बढिय़ा आ रहा है। हम विकास कार्यों के लिए पैसा जुटाने में सफल हो रहे हैं। आने वाले सालों में औद्योगिक निवेश से प्रदेश की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा उछाल मिलेगा। इससे बेरोजगारी की भीषण समस्या से बहुत हद तक निजात मिलेगी। प्रदेश में सरकारी विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की कमी उच्च और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़ी समस्या लगातार बनी हुई है। मुख्यमंत्री ने इस पर भी कहा-इस दिशा में तेजी से कार्य चल रहा है। जल्दी ही सभी कुर्सियां भर दी जाएंगीं। उनके संज्ञान में सभी तथ्य हैं। कुलपतियों की नियुक्तियों की प्रक्रिया चल रही है। नैनीताल हाई कोर्ट में सरकार को लगातार हार मिलती रही है। कई बड़े मामलों में, इसके चलते सरकारी वकीलों और महाधिवक्ता तक पर अंगुली उठ रही है कि वे या तो मेहनत और जीवट से सरकार का पक्ष नहीं रख रहे या फिर कुछ गड़बड़ी है। मुख्यमंत्री ने इस पर कहा कि अदालत में सरकार की शिकस्त के लिए वह सरकारी वकीलों को जिम्मेदार नहीं मानते हैं। लिहाजा उनको नहीं लगता है कि उनके प्रदर्शन की समीक्षा या उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने की जरुरत है। उन्होंने ये भी कहा कि हाई कोर्ट जो आदेश देता है, सही लगने पर उसका अनुपालन सरकार कर रही है। जो उचित नहीं लगता है उसके खिलाफ सरकार उच्चतम न्यायालय जा रही है। ये रास्ता हमेशा खुला रहता है।

 

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