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निजी टीम, मुख्यमंत्री और लोग

चेतन गुरुंग

आम तौर पर ये बात चर्चाओं में आ जाती है कि फलां मुख्यमंत्री या मंत्री क्यों लम्बे समय तक बना नहीं रह सका। तब भी जब उसके विरोधी कमजोर थे या हाई कमान के पास ज्यादा बेहतर विकल्प नहीं थे। ऐसा ख्याल इसलिए आया कि इन दिनों मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भी ऐसे ही मामले में गाहे-बगाहे निशाना बनते रहते हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वह खुद अच्छे इंसान हैं। कोई खास दाग उनके सियासी जीवन में कभी लगा नहीं। साधारण जीवन जीते रहे हैं। जब मंत्री थे, तब भी और आज जब मुख्यमंत्री हैं तब भी। बेशक उनकी आर्थिक पृष्ठ भूमि कमजोर थी,लेकिन इससे क्या होता है।
आज उत्तराखंड में जितने भी मंत्री और कुछ मुख्यमंत्री भी बने, उनकी घरेलू दशा रूपये-पैसे के लिहाज से बहुत ही मामूली थी। कुछ तो फटेहाल कहे जा सकते थे। फिर भी आज उनको देखिये,क्या आलीशान जिंदगी जी रहे, कुछ तो अभी विधायक ही हैं, कमाई का कोई घोषित साधन नहीं है,फिर भी बंगलों में रह रहे, महंगी एसयूवी की सवारी कर रहे, कई जगह महंगे प्लॉट्स हैं, बेनामी किस्म की। ऐसे में त्रिवेंद्र की सादगी और सादा जीवन अहमियत रखता है। ऐसे दौर में आज मुख्यमंत्री और उनके चेले-चपाटों, कुछ कथित मित्रों, जिनको आम तौर पर सलाहकार और जनसंपर्क अधिकारी भी कहा जाता है, पर लिखना चाहता हूं। ये उतना ही सत्य है जितना गंगा का उद्गम स्थल उत्तराखंड है। अगर मुख्यमंत्री को बदनाम होना हो, जल्दी कुर्सी से हटना हो, अपने साथ पार्टी की भी लुटिया डुबोनी हो तो निजी टीम को कबाड़ से छांट कर बनाओ, ये कहना गलत नहीं होगा कि सबसे बेहतर टीम आज तक अगर किसी मुख्यमंत्री ने बनाई तो वह एनडी तिवारी थे, उनके पास सलाहकार एक से एक सुलझे हुए थे। जो तिवारी को न सिर्फ साफ-साफ सही-गलत बताने का हौसला रखते थे, बल्कि उनको दिक्कतों से बचाने का दम-खम भी रखते थे। वे खुद भी बहुत पढ़े-लिखे हुआ करते थे। साथ ही शीर्ष स्तर पर सियासत को करीब से देखा था। तिवारी के अच्छे-बुरे दिनों में हमेशा साथ रहे थे। आर्येन्द्र शर्मा, संजय जोशी, पन्त (पूरा नाम भूल गया,अब दिवंगत) तिवारी के लिए रात-दिन जागकर, साल भर बिना छुट्टी लिए काम करने को हर वक्त तैयार दिखते थे। आर्येंद्र ने अपनी शादी में सिर्फ दो दिन की छुट्टी ली थी। ये सभी विशेष कार्याधिकारी थे लेकिन काम सलाहकार का भी करते थे। तिवारी उन पर आंख मूंद के यकीन करते थे। वह दौर था जब शर्मा को कोई नौकरशाह संपर्क करता था तो उसका तबादला मन माफिक जगह हो जाता था।
तिवारी अगर कांग्रेस की सरकार को दुबारा नहीं ला पाए तो उनकी इसमें कोई गलती नहीं थी। पहाड़ के लोगों को एक सरकार पर लम्बे समय तक न तो यकीन रहता है, न ही वे मौका दिए रखने में यकीन रखते हैं। फिर हरीश रावत जो तिवारी को हटा के मुख्यमंत्री बनने की मुहिम में लगे हुए थे, ने भी कांग्रेस को उस वक्त नुकसान पहुंचा दिया था। भले रावत को सुलझे हुए राजनेताओं में शुमार किया जाता है, लेकिन उनके सलाहकार सबसे बेकार किस्म के रहे। इस मामले में उनकी तुलना बीजेपी के डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के साथ की जा सकती हैं। रावत हो या निशंक दोनों को उनकी निजी टीम ने ही बर्बाद किया। शानदार बर्ताव वाले रावत मुख्यमंत्री बने लेकिन अपनी टीम में ज्यादातर ऐसे लोगों को रख लिया, जिन्होंने अपने कृत्यों और बर्ताव से सरकार और रावत को जबरदस्त नुक्सान पहुंचाने का काम ही किया। जसबीर सिंह के अलावा रावत के पास थोड़ा बहुत सुलझा हुआ कोई था तो वह सुरेन्द्र कुमार, लेकिन सत्ता में रहने के दौरान वह सुरेन्द्र भी आसमान में देख के चलने लग गए थे। उनकी तो तारीफ सिर्फ इसलिए हुआ करती थी कि वह जमीन से जुड़े हुए हैं। जसबीर ऐसा शख्स था, जो लोगों को पहचानता था, किससे मुख्यमंत्री को फायदा हो सकता है, किससे कुछ नहीं मिलने वाला.उसकी पारखी नजरें इसको पहचानती थी। राजीव जैन भी उन लोगों में शुमार हुए, जिन्होंने हरीश के लिए बाद में कुआं खोदने का काम किया और भी कई विधायक, जो रावत के खास थे, और गैर सरकारी लोग, जो रावत की निजी टोली में घुस गए थे, ने सिर्फ मोटा माल बनाने का काम ही किया। रावत का उन्होंने इस्तेमाल खूब किया। रावत उनका नहीं कर पाए। नतीजा रावत विधानसभा चुनाव में चारों खाने चित। उससे पहले विजय बहुगुणा की अगुवाई में नौ कांग्रेसी विधायक बीजेपी चले गए, सरकार गिराई अलग। निशंक सत्ता में रहने के दौरान और उससे पहले काफी सुलझे हुए लगते रहे। उन्होंने अपनी टीम में कई कमजोर लोगों को रखा। एसके द्विवेदी और जेपी ममगाईं को ही तब परिपक्व समझा जाता था। ममगाईं इन दिनों उत्तराखंड के सूचना आयुक्त हैं। वह भारतीय कस्टम सेवा से थे। इसमें कोई हैरानी नहीं हुई जब निशंक को विधानसभा चुनाव से सिर्फ छह महीने पहले अप्रत्याशित तौर पर हटा दिया गया तो सिर्फ इसलिए कि उनकी निजी टीम के ज्यादातर लोगों की कारगुजारियां हाई कमान तक पहुंच चुकी थीं। साथ ही ये भी अहम पहलू था कि निशंक के खिलाफ तब मीडिया भी खूब आग उगलने लगा था। इसको भी निजी टीम की नाकामी के तौर पर देखा जा सकता है।
दिलचस्प पहलू ये रहा कि जब रावत को कुर्सी से हटाया गया तो जैन और निशंक को हटाया गया तो मनवीर सिंह को ले कर काफी चुटकियां चलीं। ये तक हवा उड़ी कि लोगों ने दोनों की मिजाज पुरसी की। अपना माल वापिस माँगा। इसमें सत्यता कितनी है,कोई नहीं जानता, लेकिन ये भी उतना ही सच है कि रावत और निशंक के बाकी निजी टीम सदस्यों के बारे में ऐसी फालतू की हवा नहीं उड़ी। खंडूड़ी के करीबियों में उमेश अग्रवाल और अनिल गोयल थे। वे खंडूड़ी के फैसलों तक को प्रभावित कर सकते थे। दोनों बीजेपी के लम्बरदार थे, ये तक उड़ाई गई कि वे खंडूरी के कारोबारी सहयोगी हैं। ये बात अलग है कि किसी के पास इसका कोई सुबूत नहीं था। खंडूरी के बुरे वक्त में दोनों हमेशा साथ खड़े रहे। खंडूरी को सबसे ज्यादा नुक्सान पहुंचा तो आईएएस अफसर प्रभात कुमार सारंगी के जबरदस्त दबदबे के कारण, सारंगी जो कहे वह पत्थर की लकीर होती थी। मुख्यमंत्री का आदेश होता था। खंडूरी पर कोई निजी आरोप भ्रष्टाचार के कभी नहीं लगे, लेकिन प्रभात पर अति निर्भरता उनको ले डूबी। विजय बहुगुणा भी उन मुख्यमंत्रियों में रहे, जो सिर्फ इसलिए बदनामी में डूबे कि उनके पास भी ढंग की निजी टीम नहीं थी। बड़े बेटे साकेत बहुगुणा के बारे कहा जाता था कि सरकार अन्दर से वही चलाते हैं। उनको कुछ माफिया किस्म के लोगों ने घेर लिया था। ये भी कह सकते हैं कि अत्यंत प्रभाव में ले लिया था। इससे बहुगुणा को सियासी तौर पर बहुत क्षति उठानी पड़ी। उनकी कुर्सी भी चली गई।
आज के विधायक पुष्कर सिंह धामी, कभी राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के विशेष कार्याधिकारी हुआ करते थे। इसमें शक नहीं कि धामी ने जितना भी वक्त कोश्यारी के साथ गुजारा, बहुत बढिय़ा काम किया। भले उनके पास कोई अनुभव सरकार का नहीं था और उम्र भी कम थी। कोश्यारी की अगुवाई में बीजेपी 2002 का चुनाव हारी तो सिर्फ इसलिए कि तब निशंक और केदार सिंह फोनिया जैसे नेताओं की मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा हिलोरे मार रही थीं। सभी को लगता था कि सरकार बीजेपी की ही आनी है.सो पार्टी में मौजूद मुख्यमंत्री पद के दावेदार विरोधियों को निबटाने में बहुत व्यस्त रहे। इससे बीजेपी ही जमींदोज हो गई। नित्यानन्द स्वामी उत्तराखंड की पहली अंतरिम सरकार के पहले मुख्यमंत्री थे, लेकिन उनके पास ज्यादातर लोग अनुभवहीन और कम चालाक किस्म के थे। उनके दामाद सुनील ही तब स्वामी के सबसे करीबी थे,लेकिन वह बदनाम बिल्कुल नहीं थे, इतना कहूँगा। सुनील और उनकी अगुवाई वाली टीम से स्वामी की सियासी देखभाल नहीं हो पाई.स्वामी पूर्व मुख्यमंत्री होते हुए भी, विधानसभा का पहला ही चुनाव हार बैठे। फिर उनका सियासी जीवन भी अस्त हो गया। त्रिवेंद्र के पास भी टीम के नाम पर ऐसे नाम नहीं हैं, जो उनको मुश्किल वक्त से निकालने की ताकत रखते हों, केएस पवार ही ऐसे हैं, जो परिपक्व हैं। मुख्यमंत्री से खुल के बात कर सकते हैं। बाकियों में ये काबिलियत और हिम्मत नहीं दिखाई देती है। यही वजह है कि त्रिवेंद्र दिक्कतों और विवादों में जब भी घिरते रहे हैं, उनकी निजी टीम उसमें बहुत बड़ा कारण साबित हो रही है। लोग और मीडिया त्रिवेंद्र की टीम के लोगों से खुन्नस निकालने या फिर उनकी नाकामी का ठीकरा सरकार पर फोड़ रहे हैं। त्रिवेंद्र के लिए ये दौर राज्य के पुराने मुख्यमंत्रियों के अनुभवों से सीख लेने और सुधार करने का है। जितना जल्दी हो उतना अच्छा।

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