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मौत का दूसरा नाम है मोसाद

बबिता चतुर्वेदी

मध्यपूर्व में चारों तरफ से इस्लामिक देशों से घिरे छोटे से राष्ट्र इजराइल के लिए अपना अस्तित्व बनाए रखने की चुनौती हर समय बनी रहती है। इस देश की आबादी काफी कम करीब अस्सी लाख के आसपास है और इसलिए उनके लिए अपने हर नागरिक के जीवन की कीमत भी काफी अधिक है। इजराइल अपने नागरिकों पर आने वाले किसी भी संकट का मुंहतोड़ जवाब देता है और ऑपरेशन एंटेबे या ऑपरेशन थंडरबॉल्ट ऐसे ही करारे जवाब थे। ऑपरेशन एंटेबे के दौरान इजराइली कमांडो और सेना ने एक दूसरे देश, युगांडा के एयरबेस में बिना अनुमति के घुसकर अपहृत किए गए अपने 54 नागरिकों को छुड़वा लिया था। आज भी दुनिया के सबसे बड़े नागरिक सुरक्षा अभियानों में ऑपरेशन एंटेबे का नाम सबसे ऊपर आता है।
उल्लेखनीय है कि इजराइल की जिस खुफिया एजेंसी ने ऐसे कई कारनामों को अंजाम दिया है, उसे दुनिया भर में मोसाद के नाम से जाना जाता है। मोसाद को इस कारण से भी सारी दुनिया में जाना जाता है कि यह अपने दुश्मनों का क्रूरता से सफाया करती है। राजनेताओं की हत्या करना हो, दूसरे देश में अराजकता फैलानी हो या सत्ता परिवर्तन कराना हो, यह सभी मोसाद के ऑपरेशनों में शामिल होते हैं। इस एजेंसी के बारे में यह खास बात और है कि इसके एजेंटों की घुसपैठ दुनिया के दूसरे देशों की एजेंसियों में भी है। मोसाद एजेंट सीआईए, एमआई 5, एमआई 6 के साथ मिलकर काम करते हैं वरन यह कहना गलत न होगा कि मोसाद के ज्यादातर एजेंट इजराइली सैन्य बलों से आते हैं। इस एजेंसी में काम करने के लिए बड़े-बड़े अधिकारी होड़ करते नजर आते हैं और हरेक अधिकारी का सपना होता है कि वह मोसाद का सर्वेसर्वा बने।
इसराइली सेना के एक बहुत तेजतर्रार अधिकारी रूवेन शिलोह को इसे स्थापित करने का श्रेय जाता है। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि दुनिया में जो सीक्रेट डिप्लोमेसी होती है, मोसाद उसका जनक है। आप किसी एजेंसी से उम्मीद नहीं कर सकते हैं कि यह रहस्यों को उजागर करे, लेकिन मोसाद ऐसी एजेंसी है जो एक देश के रहस्य दूसरे देशों तक पहुंचाने का काम भी करती है। इतना ही नहीं, इसके एजेंटों ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की मोनिका लेविंस्की के साथ बातचीत को रिकॉर्ड कर लिया था और इनके सहारे बिल क्लिंटन तक को ब्लैकमेल किया था। यह सब तब हुआ था जबकि किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक अमेरिकी राष्ट्रपति के उसकी व्हाइट हाउस इंटर्न से सेक्स संबंध भी हो सकते हैं।
मोसाद एक ऐसी खुफिया एजेंसी है जिसमें मनोवैज्ञानिक युद्ध (साइकोलॉजिकल वारफेयर) का पूरा एक विभाग है जो यह तय करता है कि ऑपरेशन के कौन से खुफिया हिस्से को मीडिया में लीक करना है ताकि दुश्मनों के दिलो-दिमाग में भय और बदहवासी पैदा की जा सके।
मोसाद का पूरा एक विभाग जैविक और रासायनिक जहरों की खोज में लगा रहता है और इनके वैज्ञानिक हथियार भी बनाते हैं। ऐसा माना जाता है कि फिलीस्तीन नेता यासर अराफात को मोसाद ने ऐसा जहर देकर मारा था कि उसकी पहचान तक नहीं की जा सकी। मोसाद के पास दुनिया के प्रत्येक नेताओं, प्रमुख व्यक्तियों और ऐसे लोगों की गोपनीय फाइलें बना रखी हैं जिनके पास किसी तरह की कोई सामरिक महत्व की जानकारी होती है।
इन फाइलों ने दुनिया भर के नेताओं, प्रसिद्ध लोगों की सारी जन्म कुंडली होती है जिससे उन्हें पता लगता है कि फलां राष्ट्रपति से जानकारी हासिल करने के लिए पैसे की जरूरत होगी या फिर उसके लिए हनीट्रैप ही ठीक रहेगा। इजराइल के नेता नेतन्याहू ने पोलैंड को पेशकश की थी कि अगर वह चाहे तो उन्हें लेविंस्की टेप्स उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
उदाहरण के लिए, एक बार मोसाद एजेंटों ने आतंकवादी की पत्नी को फूल भेजे थे और इसके मिनटों बाद ही उस उग्रवादी की हत्या कर दी गई थी। मोसाद एजेंटों ने अरब मूल के परमाणु वैज्ञानिकों की हत्याएं करने का भी काम किया है ताकि अरब देशों की परमाणु बम बनाने की महत्वाकांक्षाओं को रोका जा सके।
उल्लेखनीय है कि मोसाद में महिलाएं भी काम करती हैं लेकिन महिला एजेंटों के लिए तय होता है कि उन्हें क्या काम करना है और क्या नहीं करना है। उनसे अपने टारगेटों के साथ सोने के लिए कभी नहीं कहा जाता है। वर्ष 1960 के दशक में मोसाद ने ईरान के शाह के शासन काल में खुफिया एजेंसी सावाक के साथ करीबी रिश्ते बना लिए थे। इन एजेंटों ने इराक में कुर्द विद्रोहियों की मदद की थी। नरेंद्र मोदी के केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद से नई दिल्ली में मोसाद का ठिकाना बन गया है। रॉ और मोसाद मिलकर कोवर्ट ऑपरेशन्स चलाते हैं और इनमें से ज्यादातर का शिकार पाकिस्तान होता है।
हालांकि भारत के फिलीस्तीनी नेताओं से अच्छे संबंध रहे हैं, लेकिन वर्षों तक मुस्लिम संगठन आरोप लगाते रहे हैं कि रॉ, मोसाद के हाथों की कठपुतली बन गई है। खुफिया एजेंसियों के ऐसे बहुत से ऑपरेशनों की मीडिया तक को जानकारी नहीं होती है लेकिन 1980 के दशक के आखिरी वर्षों में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने एक खुफिया ऑपरेशन चलाया था जिसे दिल्ली हाईकोर्ट में उजागर किया गया था। मोसाद प्रमुख तामीर पार्दो ने एक इजराइल प्रकाशन से कहा था कि एजेंसी में महिला और पुरुषों, दोनों को समानता से काम करने की स्वतंत्रता है लेकिन सीक्रेट वारफेयर में महिलाएं ज्यादा असरदार साबित होती हैं क्योंकि उनमें बहुत से काम एक साथ करने की क्षमता (मल्टीटास्किंग) होती है। अरब देशों के संदेह को दूर रखने के लिए इजराइल झूठे झंडों (फ्लैग्स) का भी इस्तेमाल करता है। मोसाद के इजराइली सैन्य खुफिया एजेंसी, शिन बेथ, विदेश मंत्रालय के रिसर्च एंड पॉलिटिकल प्लानिंग सेंटर और पुलिस के स्पेशल टास्क डिवीजनों से अच्छे संबंध होते हैं। एंटेबे ऑपरेशन की सफलता से समझा जा सकता है कि इन एजेंसियों की प्लानिंग और एक्जीक्यूशन किस हद तक तालमेल से भरा होता है। मोसाद का निदेशक सिविल सेवा का क्लास 1 ऑफिसर होता है।
मोसाद का प्रमुख रूप से काम विदेशी खुफिया जानकारियां जुटाना और इजराइल के बाहर कोवर्ट ऑपरेशनों को अंजाम देना है। मोसाद में 1500 से लेकर 2000 तक कर्मचारी हैं जिनमें से करीब 500 अधिकारी स्तर के हैं। एजेंसी ने नए कर्मचारी और पुराने स्टाफ मेंबर के बीच बेसिक सैलरी में बहुत कम अंतर होता है। लेकिन मोसाद और सिन बेथ (सेना की खुफिया शाखा) में कर्मचारियों का चयन बहुत ही लंबे परीक्षणों के बाद होता है और उनकी सुरक्षा संबंधी कड़ी जांच होती है। मोसाद और सिन बेथ में करीब एक हजार अधिकारी हैं जिनकी ईमानदारी, सच्चाई, पृष्ठभूमि को कड़ाई से परखने के बाद ही भर्ती किया जाता है। इजराइल की स्थापना के तुरंत बाद वहां के तत्कालीन प्रथम प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन के समय में मोसाद की नींव रखी गई थी जिसे इजराइल की आजादी के लिए ब्रिटिश फिलिस्तीन में संघर्ष कर रहे चार प्रमुख यहूदी उग्रवादी संगठनों को एक कर बनाया गया था। जिन चार संगठनों को मिलाकर मोसाद का गठन किया गया वे थे: हगानाह, इरगुन, लेही, पालमच। इन्हीं संगठनों में से जो समर्थ सैनिक थे उन्हीं को लेकर मोसाद की स्थापना की गई थी। मोसाद का गठन कर इसका पहला निदेशक एक खूंखार यहूदी सैनिक रूवेन शिलोह को बनाया गया, जिसने अपने कार्यों से पहले भी यहूदियों में काफी नाम कमाया था। मोसाद का जिस काम के लिए गठन हुआ था, मोसाद ने उसे अपने काम से साबित भी कर दिखाया। यह मोसाद एजेंट्स की लगातार कठिन परिश्रम का ही परिणाम है जो आज मोसाद को खुफिया एजेंसियों की दुनिया का एक्सपर्ट माना जाता है।
मोसाद की ताकत और उसके नेटवर्क का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज दुनिया के बड़े-बड़े देश खुफिया सेवाओं के लिए मोसाद की सहायता लेते हैं। यहां तक कि कई देशों के खुफिया एजेंट्स को भी मोसाद से ट्रेनिंग लेने के लिए इजराइल भेजा जाता है। मोसाद को जिस सबसे बड़ी खूबी के कारण जाना जाता है वो हैं ‘फाल्स फ्लैग ऑपरेशन’(कोवर्ट ऑपरेशन्स)। इस कार्य में मोसाद को महारत हासिल है। वैसे तो इजराइल का हर व्यक्ति सैनिक है जिसे सैन्य ट्रेनिंग अनिवार्य होती है लेकिन मोसाद में शामिल होने वाले जवानों को अलग से स्पेशल बेहद कड़ी ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है। दुश्मन को चकमा देने की कला हो या मारकर गायब हो जाने वाली किल एंड फ्ली तकनीक हो, मोसाद एजेंट्स सबमें एक्सपर्ट होते हैं। एक मोसाद एजेंट्स कई सैनिकों के बराबर होता है जो ना ही मात्र अकेले खुफिया ऑपरेशन अंजाम दे सकता है बल्कि अपने दुश्मन के बड़े से बड़े ठिकाने को तबाह करने में भी सक्षम होता है। मोसाद को लेकर बहुत सारी किताबें लिखी गई हैं और इनमें से कई-कई किताबें इसके एक-एक ऑपरेशन पर हैं।
साठ के दशक में देश के परमाणु कार्यक्रम को चलाने के लिए मोसाद एजेंटों ने अमेरिका की परमाणु कंपनी न्यमेक, अपोलो पेंसिलवानिया से 90 किलोग्राम यूरेनियम गायब कर दिया था। इसके बाद ही, अमेरिकियों को पता लगा कि यह यूरेनियम इजराइल में काम में लाया जा रहा है। ईरान की क्रांति के बाद ईरान, इजराइल का सबसे बड़ा शत्रु बन गया लेकिन इससे पहले शाह रजा पहलवी के शासन काल में इजराइल, ईरान को हथियार बेचा करता था। तकनीकी रूप से दोनों देश दुश्मन हैं लेकिन दोनों के बीच हथियारों और तेल की बिक्री होती रही थी। मोसाद के एजेंटों ने पीएलओ (फिलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन) के हथियारों को निकारागुआ में कोंट्रा विद्रोहियों को बेच दिया था और बिक्री से मिले पैसों से अमेरिका की मदद भी कर दी थी। मोसाद के क्रियाकलापों और कारनामों की लिस्ट इतनी लम्बी, अविश्वसनीय और अकल्पनीय है कि इसके कारनामों पर दुनिया भर में दर्जनों किताबें लिखी जा चुकी हैं। लेकिन फिर भी हमें लगता है कि हम इसके बारे में जितना पढ़ते हैं, लगता है कि वह भी बहुत कम है। ऐसा लगता है कि मोसाद एक सर्वशक्तिमान खुफिया एजेंसी है और यह कुछ भी करने में समर्थ है।

हसीनाओं से राज खुलवाता है मोसाद

जब आप इंटरनेशनल जासूसों के बारे में सोचते हैं तो एक ही चेहरा आंखों के सामने उभरता है – जेम्स बॉन्ड। लेकिन इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने जासूसों की एक नई नस्ल तैयार की है। ये खूबसूरत महिलाएं हैं, जो किसी को भी अपने जाल में फंसा सकती हैं। दुनिया ने इससे पहले मोसाद की महिला जासूसों के बारे में नहीं सुना था। मोसाद को मिली कुछ बड़ी कामयाबियों में इन्होंने अहम भूमिका निभाई है।
डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक, मोसाद की उच्च प्रशिक्षित पांच महिला एजेंटों ने पहली बार चुप्पी तोड़ी है। इन्होंने इजराइली मैगजीन लेडी ग्लोब्स को अपनी असामान्य जिंदगी के बारे में बताया। ऐसी जिंदगी, जिसमें उन्हें लगता है कि वे फिल्मी जिंदगी जी रही हैं। अखबार के मुताबिक, महिलाओं की जासूसी प्रतिभा का सबसे बड़ा कारनामा 1986 में सामने आया। उस दौरान एक महिला जासूस ने धोखेबाज पूर्व न्यूक्लियर इंजीनियर को अपने जाल में फंसाया ताकि उसे इजराइल वापस ले जाया जा सके। खुद को याएल बताने वाली एक मौजूदा जासूस ने मैगजीन से कहा कि महिलाओं को अक्सर पुरुषों से ज्यादा फायदा मिलता है क्योंकि अजनबियों के उन पर भरोसा करने की संभावना ज्यादा होती है। याएल ने कहा, प्रतिबंधित इलाके तक पहुंच चाहने वाले मर्द को उसकी इजाजत मिलने की संभावना कम होती है, जबकि चेहरे पर मुस्कान लिए एक महिला को इसमें कामयाबी मिलने की संभावना काफी ज्यादा होती है। एक अन्य जासूस इफरात ने कहा, हम महिला होने का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि सबकुछ जायज है। महिला जासूसों को सेक्स के मकसद से इस्तेमाल नहीं किया जाता। हम मर्दों को लुभाने की कोशिश करते हैं, लेकिन सेक्स के मामले में लाइन खिंची हुई है। मोसाद चीफ तामिर पार्डो ने मैगजीन को बताया कि खुफिया एजेंसी के जासूसों में करीब आधी महिलाएं हैं।

इजराइल की किलिंग मशीन मोसाद के तीन खूंखार कारनामे

दुनिया की सबसे खूंखार खुफिया एजेंसी। जिसके नाम पर कहानियां चलती हैं।
मोसाद को इजराइल की किलिंग मशीन कहा जाता है। ये लोग इजराइल के दुश्मनों को पूरी दुनिया में खोज के मारते हैं। मारने का मकसद सिर्फ मारना ही नहीं होता। बल्कि डर पैदा करना होता है कि इजराइल से पंगा न लो। चारों ओर से अपने दुश्मनों से घिरे इस नन्हें से देश को बड़ा क्रूर बनना पड़ता है जिंदा रहने के लिये। आइये पढ़ते हैं मोसाद के कारनामों के बारे में जिन्होंने कभी डर पैदा किया कभी बेइज्जती भी कराई….

ऑपरेशन रैथ ऑफ गॉड (खुदा का कहर)
1972 में म्यूनिख ओलंपिक के लिये दुनिया भर से खिलाड़ी इकटï्ठा हुये थे। इसी दौरान एक खतरनाक घटना हुई। इजराइल ओलंपिक टीम के 11 खिलाडिय़ों को उनके होटल में मार दिया गया। इसका आरोप लगा दो आतंकवादी संगठनों पर ब्लैक सितम्बर और पलेेटाइन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन। इसके बाद इजराइली सरकार भडक़ गई। बदले के लिये प्लान किया जाने लगा। 11 लोग हिट लिस्ट में थे। फिर मोसाद ने जो काम किया वो सीधा फिल्मों की तरह था। फोन बम, नकली पासपोर्ट, उड़ती हुई कारें, जहर की सुई सब इस्तेमाल हुआ। जैसे जेम्स बांड किसी भी देश की परवाह नहीं करता मारते वक्त, उसी अंदाज में मोसाद एजेंटों ने कई देशों का प्रोटोकॉल तोड़ा। एजेंट मिडिल ईस्ट के कई देशों की सुरक्षा एजेंसियों में घुस गये थे। चुन-चुन के मारा गया अपराधियों को।
अपने टारगेट को निपटाने के पहले मोसाद टारगेट की फेमिली को बुके भेजता था। जिस पर लिखा होता था- ये याद दिलाने के लिये कि हम न तो भूलते हैं, न ही माफ करते हैं। मोसाद के एजेंटों ने हर टारगेट को 11 बार गोली मारी। मरे हुये 11 इजराइली खिलाडिय़ों में से हर एक की तरफ से। ये ऑपरेशन बीस साल तक चला। पूरे यूरोप में घूम-घूमकर मारा गया। इसी क्रम में नॉर्वे में एक वेटर गलती से मार दिया गया। इंटरनेशनल मीडिया में इसकी कड़ी निंदा हुई। मोसाद ने निंदा के बाद कई और मर्डर किये।

दुबई में छुपे महमूदअल मबूह की हत्या
दुबई…जहां दुनिया भर के रईसों का होता है जमावड़ा। कहते हैं कि यहीं से दुनिया भर के आतंकवादियों को भी पैसा जाता है। जनवरी में दुबई का मौसम सुहाना हो जाता है। रोज एक लाख लोग दुबई एयरपोर्ट पर आते हैं इस मौसम में। 19 जनवरी 2010 को इसी शहर के होटल अल बुस्तान रोताना में एक मर्डर हुआ जिसने इंटरनेशनल मीडिया में सनसनी फैला दिया क्योंकि दस दिन लग गये थे दुबई पुलिस को ये निश्चित करने में कि ये मर्डर ही है। तब तक यही लग रहा था कि ये नैचुरल डेथ है। मरने वाले आदमी का नाम था महमूद अल मबूह। जो हमास के लिये हथियार की खरीद-बिक्री करता था और ऐसे लोग ब्रेन हैमरेज से नहीं मरते जो कि पोस्टमार्टम में आया था। फिर पता चला कि अल मबूह के पैर में सक्सिनीकोलीन का इंजेक्शन दिया गया था। जिससे पैरालाइसिस हो जाता है। फिर उसके मुंह पर तकिया रखकर सफोकेट कर दिया गया था। हिट स्क्वॉड ने अल मबूह के कमरे के सामने ही अपना कमरा बुक किया था। जब वो अपने कमरे से बाहर गया तो स्क्वॉड ने इलेक्ट्रॉनिक डोर की सेटिंग चेंज कर दी। और जब वो वापस आया तो मार के निकल गये।
सबसे खतरनाक बात थी कि अल मबूह से 21 साल पुराना बदला लिया गया था। अल मबूह फिलिस्तीनी ग्रुप हमास के मिलिट्री विंग का फाउंडर था। 1989 में दो इजराइली सैनिकों को मारने का आरोप था उस पर। अल मबूह को अंदाजा जरूर था कि मरना तो है। पर ये अंदाजा नहीं था कि ऐसी जगह पर मारा जायेगा। इस काम में मोसाद के 33 एजेंट लगे थे। स्क्वॉड का कोड नाम था सीजेरिया। फिलिस्तीन के एक पुराने शहर के नाम पर। जहां पर कुछ यहूदी शहीद हुये थे। एजेंटों ने इंग्लैंड, फ्रांस, आयरलैंड से लेकर सीरिया, अरब का पासपोर्ट बनवा रखा था। ये एजेंट अलग-अलग जगहों से दुबई आये और मार के चलते बने। जब तक दुबई पुलिस ये तय कर पाई कि ये हत्या ही है, ये लोग इजराइल पहुंच चुके थे।

सत्तर गोलियां
फिलिस्तीन के नेता यासिर अराफात का दाहिना हाथ खलील अल वजीर ट्यूनीशिया में रह रहा था। उसे अबू जिहाद कहा जाता था। इसको मारना मोसाद की लिस्ट में था। इसके लिये 30 एजेंट काम में लगे। धीरे-धीरे कर टूरिस्ट बनकर पहुंचे ट्यूनीशिया। कुछ ने तो बाकायदा वहां की आर्मी की यूनिफॉर्म पहन रखी थी। फिर सारे एजेंट अबू जिहाद के घर की तरफ पहुंचे। उस वक्त इजराइल का जहाज बोइंग 707 शहर के ऊपर मंडरा रहा था। यूं ही नहीं। उसने वहां के कम्युनिकेशन सिस्टम को ब्लॉक कर दिया था। हिट स्क्वॉड उसके घर में घुस गया। पहले तो नौकरों को मारा। फिर अबू के परिवार के सामने उसे 70 गोलियां मारीं।

एक ऐसा ऑपरेशन जिसमें मोसाद की बड़ी बेइज्जती हुई
1997 में मोसाद का एक ऑपरेशन फेल हुआ था। जॉर्डन में। मोसाद के दो एजेंट कनाडियन टूरिस्ट बनकर आये हमास के लीडर खालिद मशाल को मारने। हथियार था एक जहर जो स्किन से होकर शरीर के अंदर चला जाता है। अटैक फेल हो गया और मशाल के बॉडीगार्डों ने एजेंटों को दौड़ा कर पकड़ लिया। फिर पता चला कि चार एजेंट अपने बारे में सब कुछ बताकर जॉर्डन में ही इजराइली दूतावास में छुपे हुये थे। इजराइल के पीएम बेंजामिन नेतान्याहू को ये बात माननी पड़ी। उनको तुरंत आना पड़ा ज़ॉर्डन। भडक़े जॉर्डन किंग ने मिलने से मना कर दिया। फिर बहुत मनुहार के बाद माने। इजराइल ने जहर का एंटिडोज भी दिया मशाल को। इसके अलावा अपनी कस्टडी से हमास के शेख अहमद यसीन और उसके साथियों को छोडऩा भी पड़ा।इस घटना के बाद मोसाद कुछ दिन तक शांत रहा था क्योंकि बड़ी बेइज्जती हुई थी।

मोहब्बत के जाल में फंसाने वाली मोसाद की महिला जासूसों की कहानी

ल 1986 में दुनिया भर के अखबारों में ये खबर आई कि इजराइल अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है और दुनिया के कई देशों की तुलना में उसका परमाणु जखीरा कहीं बड़ा है। इजराइल के गुप्त परमाणु कार्यक्रम के बारे में दुनिया को बताने वाले शख्स का नाम था मौर्डेख़ाई वनुनु। वनुनु को पकडऩे के लिए इजराइल ने एक गुप्त अभियान चलाया और एक महिला जासूस को उन्हें प्रेम जाल में फंसाने के लिए भेजा गया जो उन्हें लंदन से बाहर किसी और देश में ले जाएं। बाद में वनुनु को अगवा कर लिया गया और उन पर इजराइल में मुकदमा चलाया गया। आज भी वनुनु को इंतज़ार है कि वो एक आजाद व्यक्ति की तरह दुनिया घूम सकें।

टेक्नीशियन थे, बने व्हिसलब्लोअर
वनुनु 1976 से 1985 के बीच इजराइल के बीरशेबा के नजदीक नेगेव रेगिस्तान में मौजूद डिमोना परमाणु प्लांट में बतौर टेक्नीशियन काम करते थे, जहां वो परमाणु बम बनाने के लिए प्लूटोनियम बनाते थे। 30 साल के मौर्डेख़ाई वनुनु जल्द की सुरक्षा अधिकारियों के रडार पर आ गए और उन्हें आखिर 1985 में नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लेकिन नौकरी छोडऩे से पहले उन्होंने डिमोना परमाणु प्लांट, हाइड्रोजन और न्यूट्रन बमों की करीब 60 सीक्रेट तस्वीरें लीं। और अपनी रील के साथ उन्होंने देश छोड़ दिया। वो ऑस्ट्रेलिया पहुंचे और सिडनी में ईसाई धर्म अपना लिया। इसके बाद उन्होंने लंदन स्थित संडे टाइम्स के पत्रकार पीटर हूनम से संपर्क किया और ये सीक्रेट तस्वीरें साझा कीं।

वो लेख, जिसने दुनिया को चौंका दिया
5 अक्टूबर 1986, वनुनु से मिली जानकारी के आधार पर संडे टाइम्स में लेख छपा- रीवील्ड: द सीक्रेट्स ऑफ इजराइल्स न्यूक्लियर आर्सेनल। इस एक लेख ने दुनिया में जैसे भूचाल पैदा कर दिया। न्यूक्लियर वीपन्स एंड नॉनप्रोलिफिकेशन: अ रेफरेन्स हैंडबुक के अनुसार, अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए का अनुमान था कि इजराइल के पास बस 10-15 परमाणु हथियार हैं। लेकिन वनुनु के अनुसार, इजराइल के पास अंडरग्राउंड प्लूटोनियम सेपरेशन सुविधा थी और उसके पास लगभग 150-200 परमाणु हथियार थे। 2008 में द संडे टाइम्स ने अपनी वेबसाइट पर एक बार फिर 5 अक्टूबर 1986 को छापा गया लेख प्रकाशित किया था। 20वीं सदी चर्चित घटनाओं पर द न्यूयॉर्क टाइम्स की किताब पॉलिटिकल सेन्सरशिप ने लिखा कि बाद में वनुनु ने आरोप लगाया कि उनके खुलासे के कारण इजराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिमोन पेरेस अमरीकी राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन को झूठ नहीं कह सकते थे कि उनके पास कोई परमाणु हथियार नहीं हैं।
संडे टाइम्स को पूरी जानकारी देने के लिए वनुनु लंदन पहुंचे थे। लेकिन 1986 में लेख छप सके उससे पहले ही उन्हें किसी तरह ब्रिटेन से बाहर निकाल कर गिरफ्तार करने की साजिश रची गई। ये साजिश रची इसराइल की जासूसी एजेंसी मोसाद ने।

ब्रिटेन से गायब हुए वनुनु इजराइल पहुंचे
पीटर हूनम के अनुसार, वनुनु के ब्रिटेन से गायब होने की खबर के करीब तीन सप्ताह बाद न्यूज़वीक ने खबर छापी कि वनुनु इजराइल में हैं और वहां उन्हें 15 दिन की कस्टडी में लिया गया है। न्यूज़वीक के अनुसार वनुनु को उनकी एक महिला मित्र ने एक यॉट में बैठकर इटली में समंदर में जाने के लिए राजी किया था। इटली और किसी और देश की समुद्री सीमा से बाहर जाने के बाद उन्हें मोसाद के एजेंटों ने गिरफ्तार कर इजराइल को सौंप दिया था।

सिंडी की असली पहचान क्या थी?
पीटर हूनम के अनुसार सिंडी का असली नाम शेरिल हैनिन बेनटोव है। साल 2004 में सेंट पीटर्सबर्ग टाइम्स ने लिखा था कि शेरिल हैनन बेनटोव 1978 में इजराइली सेना में शामिल हुई थीं। बाद में वो मोसाद में शमिल हुईं और इजराइल के दूतावासों से जुड़ कर काम करने लगीं।

वनुनु को सजा और आजादी की मुहिम
मौर्डेख़ाई वनुनु को 1988 में इजराइल में 18 साल के जेल की सजा सुनाई गई, जिसमें से उन्होंने 13 साल जेल में गुजारे। साल 2004 में उन्हें जेल से तो छोड़ा गया लेकन उन पर कई तरह की बंदिशें लगा दी गईं। लेकिन परमाणु मुक्त दुनिया बनाने में उनके सहयोग की भी जमकर तारीफ हुई। उन्हें बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुहिम चालू की गई। वनुनु की आजादी के लिए चलाए एक अभियान के अनुसार 21 अप्रैल को जेल से छूटने के बाद वनुनु सेंट जॉर्ज कैथेड्रल में रह रहे थे। वहां येरूशलम के एपिस्कोपल बिशप ने उन्हें पनाह दी थी। 11 नवंबर 2004 को लगभग 30 इजराइली सुरक्षाबलों ने उन्हें हिरासत में ले लिया। बाद में उसी रात उन्हें छोड़ गिया गया। लेकिन इजराइल ने उन पर पबंदिया लगाईं, जो 32 साल बाद आज भी लागू हैं। बीते साल नॉर्वे ने वनुनु को ऑस्लो में रहने के लिए शरण देने की पेशकश की थी। वनुनु की पत्नी ऑस्लो में रहती हैं।

 

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