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सेना के इस अधिकारी ने इसलिए सुख छोडक़र मौत को चुन लिया

वह पुर्तगाल की सेना में एक छोटे से अफसर थे। उनकी जिंदगी सुख से बीत रही थी। धीरे-धीरे वह पुर्तगाल में सालाजार के बेहद भरोसेमंद जनरल बन गए। जाहिर है यह तरक्की उन्हें आसमान की ओर ले जाती क्योंकि जनरल बनने के बाद उनके पास असीम अधिकार आ गए थे। एक रोज उन्हें सालाजार की उन जेलों के बारे में पता चला जिनसे वह अब तक अनजान थे। उन्हें पता चला कि उनके देश में ऐसी जेलें हैं जिनमें उनके नागरिक वर्षों से कैद हैं और भयंकर यातनाएं पा रहे हैं।
उन्हें पता चला कि उन जेलों में तैनात विशेष सिपाही विश्व में यातना देने के लिए कुख्यात हैं तो उन्होंने सेना को त्यागकर जनता को इनसे बचाने का निश्चय किया। कल तक जो सेना उनके इशारों पर थी, अब वह उनकी दुश्मन हो गई। उन्हें पुर्तगाल छोडक़र भागना पड़ा, दूसरे देशों से उन्होंने देश में इस अत्याचार के विरुद्ध क्रांति शुरू की, मगर जल्द ही अल्जीरिया में उन्हें धोखे से पकड़ लिया गया। देश ने उनके सामने आत्मसमर्पण करके माफी मांगने का विकल्प रखा, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। उनको भी उसी यातना गृह में भेज दिया गया, जहां रोज बेंत से उन्हें पीटा जाता और चीखने भी नहीं दिया जाता।
यातना सहते हुए भी वह न तो टूटे और न ही झुके। यातना से उन्होंने जेल में ही दम तोड़ दिया। वह थे अमर हो चुके जनरल हंबरटो डेलगाडो जिनके ये शब्द हमेशा सबक देने वाला इतिहास हो गए, ‘एक योद्धा, राजनीतिक पैशाचिकता से लडक़र, अपने देशवासियों के लिए अपना सुख, वैभव और प्रतिष्ठा दांव पर लगाकर उनकी रक्षा करता है। एक योद्धा अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध लड़ते-लड़ते अपनी जान न्योछावर कर देता है, तब ही वह योद्धा कहलाता है।’

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