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मीटू बनाम सामाजिक चेतना

आलोक बी लाल

आजकल मीटू (प्तरूद्गञ्जशश) की चर्चा हर तरफ है। यह एक ऐसे अभियान का हैशटैग है जो अमेरिका से शुरू हुआ और आजकल हमारे देश में सुर्खियां बटोर रहा है चूंकि इस अभियान की लपटों में समाज, पत्रकारिता, फिल्म उद्योग आदि क्षेत्रों की बहुत सी प्रतिष्ठित हस्तियों के नाम इस सम्बन्ध में सामने आ रहे हैं। कुछ लोगों का काम यह कहना है कि पुराने मामलों को अब प्रकाश में लाना उचित नहीं है, पुराने मुर्दे उखाडऩे से क्या फायदा है, इनमे तो कोई गवाही भी नहीं मिल पायेगी और अदालत में मामले सिर्फ टाएं टाएं फिस्स होकर रह जायेंगे। यह भी कहा जा रहा है कि सस्ते प्रचार के लिए कुछ लोग यह सब कर रहे हैं। दूसरी तरफ यह भी एक मत है कि समाज में दबे कुचले वर्ग को एक मौका मिला है उन लोगों पर ऊंगली उठाने का जिन्होंने उनके साथ कभी यौन अत्याचार किया हो परन्तु सामाजिक तिरस्कार अथवा रसूख वालों की ताकत के कारण अब तक मुँह खोलने की हिम्मत न हुई हो।
सुप्रीम कोर्ट ने 13 अगस्त, 1997 में कार्यस्थसलों पर यौन उत्पीडऩ रोकने के संबंध में एक निर्णय दिया था। विशाखा निर्णय नाम से प्रसिद्ध इस केस में यौन उत्पीडऩ को परिभाषित करते हुए कई दिशा-निर्देशों और मानकों का निर्धारण किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यौन उत्पीडऩ क्या है? शारीरिक संपर्क, इस तरह की इच्छा या मांग प्रकट करना, अश्लील भावभंगिमा दर्शाना, पोर्नोग्राफी दिखाना, लैंगिक प्रकृति का शारीरिक, मौखिक या लिखित आचरण। इसके अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट ने रोकथाम के दिशा-निर्देश भी जारी किय। कार्यस्थचल पर यौन उत्पीडऩ को रोकने संबंधी सूचना को अधिसूचित, प्रकाशित और उपयुक्त तरीके से प्रसारित किया जाना चाहिए। सरकारी और पब्लिक सेक्टर निकायों में आचरण, अनुशासन संबंधी नियमों व नियंत्रण के प्रावधानों में यौन उत्पीडऩ की रोकथाम संबंधित नियमों को भी शामिल करना चाहिए। दोषियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। कार्यस्थनल पर काम, स्वास्थ्य, स्वच्छता का उचित प्रबंध किया जाना चाहिए। महिलाओं के खिलाफ प्रतिकूल माहौल नहीं होना चाहिए।
केंद्र और राज्य सरकारों से यह आग्रह किया गया कि वे ऐसे विधान बनाए ताकि इन दिशा-निर्देशों को निजी सेक्टर पर भी ठीक ढंग से लागू किया जा सके। कार्यस्थल पर महिलाओं के सम्मान की सुरक्षा के लिए वर्कप्लेस बिल, 2012 भी लाया गया जिसमें लिंग समानता, जीवन और स्वतंत्रता के अधिकारों को लेकर कड़े कानून बनाए गए हैं। यह कानून कामकाजी महिलाओं को सुरक्षा दिलाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इन कानूनों के तहत यह रेखांकित किया गया है कि कार्यस्थल पर महिलाओं, युवतियों के सम्मान को बनाए रखने के लिए क्या-क्या कदम उठाए जा सकते हैं। अगर किसी महिला के साथ कुछ भी अप्रिय होता है तो उसे कहां और कैसे अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए?
अगर किसी भी कार्यस्थल पर इस तरह की व्यवस्था नहीं है तो वह अपने वरिष्ठों के सामने इस स्थिति को विचार के लिए रख सकती है या फिर उपयुक्त कानूनी कार्रवाई कर सकती है। परन्तु जैसा कि आम तौर पर सामाजिक सुधार के लिए बनाये गए कानून के साथ आम तौर पर होता है ऐसा ही इस कानून के लागू करने में भी हुआ। सदियों से चले आ रहे सामाजिक व्यवहार में वांछित परिवर्तन नहीं आया। महिलाओं का घर से बाहर निकल कर नौकरी और रोजगार के दूसरे स्थलों में जाना जब और सामान्य होता गया, तो ऐसे लोगों को अनुचित हरकतें करने का मौका और अधिक मिलने लगा। कानून की लम्बी प्रक्रिया और समाज के हठीले रवैये के चलते मामले दबा लिए जाते थे, दूसरी ओर प्रताडि़त महिला को ही अपमानित होना पड़ता था। ऐसी स्थिति में अब कुछ महिलाओं ने आगे आकर समाज में प्रतिष्ठा-प्राप्त लोगों की कलई खोलना शुरू किया है तो उसका स्वागत होना चाहिए।
ऐसा लगता है कि हमारे सामाजिक इतिहास में एक नया अवसर आया है जिसमें एक नयी चेतना, नए विचार और नए आचरण का शुभारम्भ हो सकता है। हमारी बहू, बेटियां, बहने और माताएं अब अधिक सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण में जीवन यापन कर सकेंगी और पुरुष-प्रधान सामाजिक व्यवस्था में अपनी आशाओं और आकांक्षाओं को मजबूरी के तले दबाना नहीं पड़ेगा। महिलाओं को वह सभी अधिकार मिलेंगे जो संविधान ने देश के सभी नागरिकों को सामान रूप से प्रदान किये हैं क्या ऐसी आशा करना असंभव दवाब देखने
जैसा है?
(लेखक भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक हैं)

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