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फिर राम की बयार

  • साधु संतों के बाद संघ ने उछाला राम मंदिर का मुद्दा
  • मोदी सरकार पर कानून बनाकर मंदिर बनाने का बनाया दबाव
  • विपक्ष को दाव देने के लिए भाजपा भी ध्रुवीकरण की ताक में
  • यूपी में पुराना रिकार्ड दोहराने के लिए हर पैतरा आजमाने की तैयारी

Sanjay Sharma

लोकसभा चुनाव से पहले सियासत में एक बार फिर राम की बयार बहने लगी है। पहले साधु-संतों, फिर संघ और अब भाजपा ने राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को गरमाना शुरू कर दिया है। मंदिर निर्माण के बहाने भाजपा और संघ एक बार फिर हिंदू वोटों का धु्रवीकरण करना चाहते हैं। वह विपक्ष द्वारा पिछड़ों, मुस्लिमों और दलितों को गोलबंद करने की तैयारियों से चिंतित हैं। लोकसभा उपचुनाव में भाजपा इस गोलबंदी का असर देख चुकी है। इन वर्गों के समर्थन से ही सपा-बसपा गठजोड़ ने भाजपा उम्मीदवारों को चित कर दिया था। ऐसे में भाजपा योजनाबद्ध तरीके से मंदिर निर्माण को लेकर अपनी चालें चल रही है। इस मुद्दे को हवा देने के पीछे उसकी मंशा उत्तर प्रदेश में अपना पिछला रिकॉर्ड दोहराने का दबाव भी है। भाजपा जानती है कि यदि उसने अयोध्या में मंदिर निर्माण के नाम पर हिंदू वोटों का धु्रवीकरण करने में सफलता हासिल कर ली तो दिल्ली का तख्त दूर नहीं होगा। संघ भी भाजपा के साथ है और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले सरकार से मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने की अपील कर चुका है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान मोदी सरकार क्या कानून बनाकर मंदिर निर्माण का जोखिम लेती है या फिर कोर्ट के फैसले का इंतजार करती है।

….आपसी बातचीत से राम मंदिर निर्माण का हल नहीं निकलने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर सुनवाई करने को राजी हो गया है। कोर्ट 29 अक्टूबर से इस पर सुनवाई शुरू करने जा रहा है। हालांकि कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह राम मंदिर पर नहीं बल्कि विवादित जमीन पर सुनवाई करेगा यानी फैसला विवादित जमीन को लेकर आएगा न कि राम मंदिर को लेकर। कोर्ट के इस तेवर को देखते हुए साधु-संतों, संघ और भाजपा की धुकधुकी बढ़ गई है। विहिप ने तो राम मंदिर को लेकर साधु-संतों को एकत्र कर ऐलान कर दिया कि सरकार मंदिर निर्माण की पहल करे। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) इसके मद्देनजर करीब 40 संतों की दिल्ली में बैठक आयोजित की थी। बैठक में बाकायदा मंदिर निर्माण की रणनीति बनायी गई। इस बैठक में अयोध्या से श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास की अगुवाई में कई संतों ने शिरकत की थी। यही नहीं मंदिर निर्माण के लिए तपस्वी छावनी मंदिर के महंत परमहंस दास ने आमरण अनशन तक किया। महंत नृत्य गोपाल दास ने मोदी सरकार को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि मोदी के सत्ता में आने से हिंदू समाज को राम मंदिर निर्माण की उम्मीद जागी थी, लेकिन इस दिशा में अभी तक कोई काम नहीं हुआ। केंद्र में मोदी और राज्य में योगी सरकार के रहते संतों को और इंतजार करना अखर रहा है। साधु-संतों ने राम मंदिर के लिए मोदी सरकार को चार महीने का अल्टीमेटम दिया है। साधु-संतों ने साफ कर दिया कि मंदिर निर्माण के लिए कोर्ट के फैसले की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती है। यही नहीं भाजपा सांसद साक्षी महाराज भी कह चुके हैं कि 2019 से पहले भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा। उन्होंने कोर्ट से भी अपील की है कि इस मामले का जल्द निपटारा किया जाए। साधु संतों के मंदिर निर्माण की मुहिम का साथ देते हुए राष्टï्रीय स्वयं संघ ने भी सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने विजय दशमी भाषण में राम मंदिर निर्माण के लिए संसद से कानून बनाए जाने की मांग की। मोहन भागवत ने कहा कि सरकार कानून बनाकर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करे। राम मंदिर का निर्माण स्वगौरव की दृष्टि से आवश्यक है और मंदिर बनने से देश में सद्भावना का वातावरण बनेगा। भागवत ने यह भी कहा कि यदि राजनीतिक दखल नहीं होता तो मंदिर बहुत पहले बन गया होता। मोहन भागवत के इस बयान के बाद अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच पर टिकी है, जो 29 अक्टूबर से राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद पर सुनवाई शुरू करेगी। इसके अलावा भागवत के इस बयान के बाद 16 दिसंबर से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र को भी अहम माना जा रहा है। माना जा रहा है कि सरकार शीतकालीन सत्र में मंदिर निर्माण से संबंधित कोई बड़ा फैसला ले सकती है। राम मंदिर निर्माण पर अभी तक कन्नी काटने वाली भाजपा भी खुलकर मैदान में आ गई है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण की तैयारी शुरू करें। राम के बिना जनकल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता। इसके अलावा शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी राम मंदिर का मुद्दा उठाकर भाजपा को घेरने की कोशिश करनी शुरू कर दी है और ऐलान किया है कि वे 25 नवंबर को अयोध्य्या का दौरा करेंगे। साफ है मंदिर का मुद्दा उछालने की तैयारी पूरी तरह कर ली गई है। दरअसल, किसान आंदोलन, एससी-एसटी एक्ट में हुए संशोधन के खिलाफ दलितों का असंतोष और आरक्षण के मुद्दे पर सवर्ण आंदोलन को लेकर भाजपा की बेचैनी बढ़ती जा रही है। उसे समझ नहीं आ रहा है कि वह अपने छिटकते जनाधार को कैसे समेटे। पिछड़ों को एकजुट करने के लिए भाजपा लगातार सम्मेलन कर रही है तो दलितों को रिझाने के लिए उसने एससी-एसटी एक्ट के सुप्रीम कोर्ट के संशोधन को खारिज कर पुराने कानून को बहाल कर दिया है। किसानों के लिए खजाना खोल दिया गया है। वह लगातार किसानों को केंद्र में रखकर चल रही है। इसके अलावा वह सवर्णों को साधने की कोशिश कर रही है। भाजपा दिग्गजों का मानना है कि यदि मंदिर मुद्दे को गरमा दिया जाए तो इसका फायदा उसे ही मिलेगा। हालांकि यूपी में कांग्रेस का सपा और बसपा से गठबंधन नहीं होने पर उसे थोड़ी राहत जरूर मिली है लेकिन वह जानती है कि यदि बसपा-सपा मिलकर लोकसभा चुनाव में उसे चुनौती देंगे तो उसे प्रदेश में अपना पुराना रिकॉर्ड दोहराना मुश्किल हो जाएगा। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले 80 सीटों में 71 पर विजय प्राप्त की थी और दो सीटें उसके सहयोगी दल अपना दल ने प्राप्त की थी। ऐसे में मंदिर निर्माण का मुद्दा फिलहाल भाजपा अपने लिए मास्टर स्ट्रोक मानकर चल रही है।

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