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सीबीआई में संजीवनी तलाश रही कांग्रेस

  • भाजपा की भ्रस्टाचार छवि को तोड़ने में जुटे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी
  • राफेल विमान डील और सीबीआई विवाद को गरमाने की कोशिशें तेज
  • पाँच राज्यों के विधानसभा और लोकसभा चुनाव के लिए तैयार कर रहे जमीन
  • ताकत का प्रदर्शन छेत्रिये डालो पर दवाब बनाने की कोशिश

Sanjay Sharma

सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजे जाने के मोदी सरकार के फैसले को कांग्रेस ने सियासी रंग देना शुरू कर दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस मुद्दे को राफेल डील से जोडक़र इसे गरमाने की कोशिश करते दिख रहे हैं। इसके मद्देनजर कांग्रेस ने देशभर में विरोध प्रदर्शन भी किए और पीएम मोदी के खिलाफ नारेबाजी की। दरअसल, सीबीआई विवाद को कांग्रेस एक सियासी मौके के रूप में देख रही है और उसे उम्मीद है कि इससे मोदी सरकार की भ्रष्टïाचार विरोधी छवि को तोड़ा जा सकता है। राफेल डील के मुद्दे पर कांग्रेस का भाजपा सरकार पर लगातार हमले इसी का नतीजा हैं। कांग्रेस को अच्छी तरह मालूम है कि मोदी सरकार की भ्रष्टïाचार विरोधी छवि ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है इसलिए वह राफेल और सीबीआई जैसे मुद्दे उठाकर भाजपा को चोट पहुंचाना चाहती है। इसके अलावा वह प्रदर्शन के जरिए क्षेत्रीय दलों पर प्रकारांतर से गठबंधन का दबाव भी बनाना चाहती है। हालांकि सीबीआई विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में आलोक वर्मा के खिलाफ सीवीसी को दो सप्ताह के अंदर जांच रिपोर्ट पेश करने के आदेश दिए हैं और यदि जांच में सीबीआई प्रमुख फंस गए तो कांग्रेस का दांव उल्टा भी पड़ सकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस सीबीआई विवाद से अपने लिए संजीवनी तलाश पाती है या नहीं।

… लोकसभा चुनाव की आहट के साथ ही कांग्रेस ने अपनी सियासी जोर-आजमाइश तेज कर दी है। राफेल डील को लेकर मोदी सरकार को घेर रही कांग्रेस को एक और मौका मिला गया है। कांग्रेस को यह मौका तब मिला जब सीवीसी की संस्तुति पर केंद्र सरकार ने सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया । दरअसल, सीबीआई ने विशेष निदेशक राकेश अस्थाना और कई अन्य के खिलाफ मीट कारोबारी मोइन कुरैशी की जांच से जुड़े सतीश साना नाम के व्यक्ति के मामले को रफा-दफा करने के लिए कई करोड़ की घूस लेने के आरोप में एफआईआर दर्ज की थी। इसके एक दिन बाद डीएसपी देवेंद्र कुमार को गिरफ्तार किया गया। इस गिरफ्तारी के बाद सीबीआई ने अस्थाना पर उगाही और फर्जीवाड़े का मामला भी दर्ज किया। वहीं अस्थाना ने भी सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा पर घूस लेने के आरोप लगाए थे। इसके बाद सरकार ने दोनों अफसरों को हटाने का फैसला लिया था। कांग्रेस ने इस मुद्दे को लपक लिया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पीएम मोदी को घेरते हुए कहा कि वर्मा राफेल डील की जांच करने वाले थे, इसलिए उनको हटाया गया। प्रधानमंत्री भाग सकते हैं, लेकिन अंत में वह इससे छिप नहीं सकते, सच्चाई सामने आएगी। इसी के साथ कांग्रेस इस मुद्दे को सियासी रंग देने में जुट गई। देशभर में प्रदर्शन किए गए। इस सबके पीछे एक वजह यह भी है कि कांग्रेस को यह समझ आने लगा है कि राफेल डील पर उनका दांव असरदायक नहीं दिख रहा है। पार्टी इस डील को बोफोर्स तोप घोटाले की तरह बनाने में असफल रही। इसका जनता पर भी कोई खास असर नहीं दिख रहा है। इसके अलावा खुद राहुल गांधी ने इस विमान की कीमत कई बार अलग-अलग बताई है। इससे भी जनता कांग्रेस के दावे को हल्के में ले रही है। दूसरी ओर भाजपा ने इस मामले में कांग्रेस को घेरना शुरू कर दिया था। रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ तौर पर कहा था कि राहुल गांधी विमान के दाम इसलिए सार्वजनिक कराना चाहते हैं ताकि वे पाकिस्तान की मदद कर सकें। दाम का खुलासा करने से सभी को पता चल जाएगा कि उस लड़ाकू विमान की मारक क्षमता क्या है और वह कितना विध्वंसक हो सकता है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस को नए मुद्दे की तलाश थी और सीबीआई विवाद के रूप में पार्टी को यह मौका मिल गया। लिहाजा कांग्रेस ने आनन-फानन में बिना यह सोचे-विचारे की जिस सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा के पक्ष में वे प्रदर्शन और सरकार के फैसले का विरोध कर रहे हैं, उसके खिलाफ भ्रष्टïाचार के आरोप लगे हैं और उसकी जांच सीवीसी कर रही है, पूरे मामले को राफेल से जोड़ दिया। अब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है और कोर्ट ने दो सप्ताह में सीवीसी से रिपोर्ट तलब की है। केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि सरकार की नियत है कि सच सामने आए और जल्द सामने आए। वह एजेंसी जो भ्रष्टाचार की जांच करती हैं जब उसके दो बड़े अधिकारी ऐसे मामले में फंस जाए तो इसके लिए ज्यादा सटीक और निष्पक्ष जांच की जरूरत है। दूसरी ओर राजनीतिक पंडि़तों का मानना है कि राफेल की तरह यह दांव भी कांग्रेस को उल्टा पड़ सकता है। कांग्रेस आज जिस संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता की बात कर रही है, वही कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लगाने के लिए लालायित थी। खुद यूपीए सरकार पर सीबीआई के दुरुपयोग के आरोप लगे थे। यह भी सच है कि कांग्रेस महागठबंधन को अमलीजामा पहनाने में असफल रही है। उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा ने कांग्रेस से किनारा कर लिया है। बसपा प्रमुख मायावती ने तो किसी भी स्तर पर कांग्रेस से गठबंधन नहीं करने का ऐलान तक कर दिया है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस बेहद कमजोर है। यहां उसकी सियासी जमीन खत्म हो चुकी है। यदि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सफलता नहीं मिलती है तो वह दिल्ली के तख्त तक कभी नहीं पहुंच सकेगी। लिहाजा वह राफेल और सीबीआई के मुद्दे को देशव्यापी बनाकर अपनी जड़ों को मजबूत करना चाहती है। साथ ही इस मुद्दे को गरमाकर वह क्षेत्रीय पार्टियों पर गठबंधन के लिए प्रकारांतर से दबाव भी बनाना चाहती है। हालांकि उसका यह दांव कितना सफल होगा, यह तो भविष्य ही बताएगा।

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