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संघ-बीजेपी का सिरदर्द बने संजय

पहले भी विवादों में रह चुके हैं

  • महामंत्री (संगठन) पर यौन उत्पीडऩ के संगीन आरोप
  • बीजेपी आन्तरिक जांच कर मुद्दा दबाने में जुटी
  • चुनावी मौसम में कांग्रेस को मिला गरमागरम मुद्दा
  • महानगर अध्यक्ष विनय की भी घेराबंदी की कोशिश

चेतन गुरुंग
देहरादून। लोकसभा चुनाव सिर पर हैं और स्थानीय निकाय चुनाव उत्तराखंड में उफान पर हैं। बीजेपी के लिए निकाय चुनाव कई तरह से बहुत अहम हैं। एक तो इस चुनाव से ये अंदाज हो सकता है कि लोकसभा चुनाव में फतह की हवा किस ओर बहने वाली है। दूसरा निकाय चुनाव में फतह पार्टी और उसके कार्यकर्ताओं में जोश भरने के साथ ही उनको मजबूत खुराक भी देगी। जो लोकसभा चुनाव में उनको पूरी ताकत के साथ काम करने के लिए प्रेरित करेगी। निकाय चुनाव के लिए ये भी माना जा रहा है कि ये मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के अब तक के कामकाज और शैली पर जनमत सर्वेक्षण भी होगा। ये सिर्फ बीजेपी की बातें कर रहा हूँ, कांग्रेस के लिए भी ये चुनाव बेहद अहम हैं, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह चाहेंगे कि इस चुनाव को जीत कर वह लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी के हक में हवा ही न बनाएं बल्कि खुद को एक मजबूत और सक्षम नेतृत्व के तौर पर स्थापित करें और सरकार आगे तो मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए सबसे मजबूत दावा पेश किया जाए। ऐसे माहौल में अचानक जब बीजेपी के प्रदेश महामंत्री (संगठन) संजय कुमार पर पार्टी से ही जुड़ी एक युवती ने यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाया तो न सिर्फ सनसनी फैल गई बल्कि राष्टï्रीय स्वयं सेवक संघ और बीजेपी के बड़े लोगों के पास तुरंत-फुरंत कुछ बोलने का हौसला ही नहीं आया। वे इतना तक बोलने की हिम्मत कई दिनों बाद जुटा पाए कि इस आरोप की जांच पार्टी स्तर पर चल रही है।

………….सवाल ये भी उठता है कि आखिर ये मामला क्या इतना सामान्य है कि सिर्फ घरेलू जांच कर ही निबटा दिया जाए। इसकी पुलिस जांच क्यों न की जाए। क्या ये मामला संगीन अपराध की श्रेणी में नहीं आता है? ये नहीं भूलना चाहिए कि बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा बीजेपी की ही मोदी सरकार ने दिया है। अगर कठोर कार्रवाई नहीं होती है तो ये नारा बेमानी साबित हो जाएगा। उधर कांग्रेस को इस सनसनीखेज मामले के सामने आने के बाद बैठे-बिठाए बड़ा और सियासी नजरिये से अहम मुद्दा हाथ लग गया है।
ऐसा नहीं है कि संजय का नाम विवादों में पहली बार आया। कुछ साल पहले भी उनका नाम तब विवादों में आया था, जब ऐसा कहा गया कि पार्टी के बलबीर रोड स्थित प्रदेश मुख्यालय के सीवर ठप हो जाने के कारण उसकी सफाई की गई तो ढेरों प्रयोग में लाए जा चुके कंडोम नाली में ठुंसे हुए थे। हालांकि इसकी पुष्टि किसी ने नहीं की। संजय संघ के प्रचारक रहे हैं और अविवाहित रहना तथा ब्रह्मचारी रहना इसकी शर्त होती है। उनको इसलिए भी जाना जाता है कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ उनका आंकड़ा छत्तीस का न भी हो तो 63 का भी नहीं है। पिछले मुख्यमंत्रियों की तरह त्रिवेंद्र ने कभी भी संघ के भेजे गए इस दूत को कभी वह तवज्जो नहीं दी जो आम तौर पर दी जाती है। पार्टी में ऐसे लोग भी हैं जो ये मानते हैं कि मुख्यमंत्री चाहते तो संजय के खिलाफ यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाने वाली लडक़ी को समझाया जा सकता था। ये मामला मीडिया में आने से बहुत पहले ही मुख्यमंत्री और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट के पास पहुंचाया जा चुका था। उनके जरिये संघ के आला अधिकारियों तक इस मामले को पहुँचा भी दिया गया था। जिस युवती ने संजय पर आरोप लगाया वह पार्टी के महानगर कार्यालय में मूल रूप से तैनात थी। जब पार्टी ने आजीवन सहयोग निधि एकत्र की तो उसकी डाटा एंट्री के काम के लिए इस महिला को, जो अविवाहित और उत्तराखंड से बाहर के राज्य की है, प्रदेश मुख्यालय भेजा गया था। सूत्रों के मुताबिक उस युवती को संजय ने जल्द ही प्रभाव में ले लिया लेकिन वह संजय की हरकतों से असहज भी थीं। इसकी शिकायत उन्होंने महानगर अध्यक्ष विनय गोयल से अक्टूबर के शुरुआत में की। ये मामला इतना बड़ा और सनसनीखेज था कि विनय ने भी इसकी जानकारी तत्काल ऊपर के लोगों को दे दी। मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष को भी सबसे पहले उन्होंने ही बताया। युवती के आरोप हैं कि संजय उनके साथ अश्लील बातें करते थे और शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए दबाव डालते थे.दोनों के बीच की बताई जाने वाली ऑडियो रिकॉर्डिंग में ऐसा सुनाई भी देता है.इस बीच गोयल पर ही ये आरोप चस्पा हो गए कि उन्होंने ये कह कर संजय को बचाने की कोशिश की कि प्रचारक खुदा का बन्दा नहीं होता है.उसकी भी शारीरिक जरूरतें होती हैं। गोयल ने हालांकि इस आरोप को ये कहते हुए खारिज किया कि उन्होंने समझाने या मामले को दबाने के लिए ऐसा नहीं कहा। न ही ऐसे सुर का इस्तेमाल किया.उन्होंने तो ये कहा कि प्रचारक होने का मतलब ये नहीं कि वह एकदम धुला हुआ हो गया और उससे किसी भी प्रकार की गलत हरकत की आशंका खत्म हो जाती है.गोयल को मुख्यमंत्री का विश्वासपात्र समझा जाता है। त्रिवेंद्र के विरोधी इसी बहाने विनय को भी निबटाने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसा माना जा रहा है। बीजेपी की जिक्र ये है कि ये बेहद संवेदनशील मामला तब सामने आया जब स्थानीय निकाय चुनाव चरम पर हैं। ऐसे वक्त पर इस तरह के मामले पार्टी को कहीं सियासी तौर पर नुक्सान न पहुंचा दे, उसको ये आशंका सता रही है,जब से ये मामला सामने आया है तब से आरोप लगाने वाली लडक़ी न तो सामने आ रही है न ही उसका मोबाइल नंबर ही ऑन है। दूसरी ओर संजय भी अंतध्र्यान हो गए हैं। इतना तो तय है कि उनकी छुट्टी हो चुकी है और कम से कम अब उत्तराखंड में उनको संघ कोई जिम्मेदारी नहीं देने वाला है। वैसे उनको संघ के बड़े नेताओं का संरक्षण हासिल है। ऐसे में ये भी सम्भावना भी जताई जा रही है कि उनको किसी और राज्य में भेजा जा सकता है, बजाए एकदम पैदल करने के.कांग्रेस इस मामले के उछलने के बाद बहुत उत्साहित और आक्रामक रुख अपना रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह के मुताबिक इस घटना ने बीजेपी की महिलाओं के प्रति सोच और हकीकत को सामने ला दिया है। उनके मुताबिक इस मामले की पुलिस रिपोर्ट होनी चाहिए और पीडि़ता को पूरी सुरक्षा दी जानी चाहिए। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष भट्ट ने तकरीबन हफ्ते भर बाद स्वीकार किया कि ऐसी शिकायत सामने आई है और उसकी आन्तरिक जांच चल रही है, ये बात अलग है कि ये माना जा रहा है कि आंतरिक जांच के जरिये बीजेपी की कोशिश संजय को बेदाग साबित कर खुद का भी दामन साख रखने की रहेगी।

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