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पिक एंड चूज जीरो टालरेंस

इसमें अचम्भा नहीं कि उत्तराखंड बनने के बाद लगातार एक के बाद एक कई बड़े और चर्चित घोटाले सामने आए। बड़े नौकरशाह और मंत्री तक पर उसकी आंच आई लेकिन घोटाले और भ्रष्टाचार पर लेश मात्र भी फर्क पड़ा हो, ऐसा लगता नहीं। त्रिवेंद्र भी जब मुख्यमंत्री बने तो शुरू में लगा नहीं कि वह जीरो टालरेंस पर कुछ सख्त कदम उठा रहे है। एनएच-74 घोटाले में आईएएस अफसरों डॉ. पंकज पाण्डेय और चंद्रेश यादव तथा कई पीसीएस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई कर जरूर उन्होंने ये जताने की कोशिश की कि वह जीरो टालरेंस के ऐलान पर आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद कई सवाल हैं जो उनके अभियान पर अंगुली उठाते हैं।

चेतन गुरुंग

मुख्यमंत्री बनने के बाद सबसे पहले किए गए त्रिवेंद्र सिंह रावत के अहम ऐलानों में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाना और उसको शून्य पर लाना भी शामिल था। उन्होंने ये ऐलान इसलिए किया कि राज्य बनने के बाद उत्तराखंड विकास से ज्यादा भ्रष्टाचार और घोटालों के लिए ज्यादा सुर्खियां मीडिया में बटोरता रहा। सरकार चाहे बीजेपी की रही हो या फिर कांग्रेस की, घोटालों ने अपनी जड़ें और मजबूत करने में सफलता पाई। आलम ये रहा कि सरकारों के रुख के कारण चतुर्थ तल और मुख्यमंत्री आवास पर दलालों और भ्रष्टाचार के आरोपियों का दबदबा रहा। वे ज्यादा दिखते थे। ये भ्रष्टाचार और दलाली ही थी कि उत्तराखंड बनने से पहले जो लोग खटारा स्कूटर पर धक्के खाते दिखते थे या फिर छोटे-मोटे अफसरों के दफ्तरों पर जी-हुजूरी करते हुए घंटों गुजारा करते थे, वे आज लग्जरी कारों में सवार दिखते हैं और शानदार बंगलों में रहते हैं। उनके बच्चे आज विदेशों में या फिर देश के महंगे स्कूल कॉलेजों में पढ़ रहे हैं। उनमें से कई मंत्री और विधायक तो बन ही गए। बड़े ब्रांड के कपड़े-जूते पहनते हैं। खनन और शराब की दुनिया में तो उनका सीधा दखल है ही, फाइलें करा के मोटी दलाली भी वे खा रहे हैं।
इसमें अचम्भा नहीं कि उत्तराखंड बनने के बाद लगातार एक के बाद एक कई बड़े और चर्चित घोटाले सामने आए। बड़े नौकरशाह और मंत्री तक पर उसकी आंच आई, लेकिन घोटाले और भ्रष्टाचार पर लेश मात्र भी फर्क पड़ा हो, ऐसा लगता नहीं। त्रिवेंद्र भी जब मुख्यमंत्री बने तो शुरू में लगा नहीं कि वह जीरो टालरेंस पर कुछ सख्त कदम उठा रहे है। एनएच-74 घोटाले में आईएएस अफसरों डॉ. पंकज पाण्डेय और चंद्रेश यादव तथा कई पीसीएस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई कर के जरूर उन्होंने ये जताने की कोशिश की कि वह जीरो टालरेंस के एलान पर आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद कई सवाल हैं जो उनके अभियान पर अंगुली उठाते हैं। ये सवाल बनता ही है कि क्या सभी नौकरशाह दूध के धुले हैं और उनके खिलाफ कोई आरोप या दाग नहीं हैं? क्या ऐसे नौकरशाहों को सरकार ने सन्देश दिया है कि वे सर्विलांस पर हैं और उनकी हर एक हरकत पर नजर रखी जा रही है। मैं कई ऐसे छोटे और बड़े नौकरशाहों को जानता हूँ जिनका इतिहास मैं तो क्या पूरी दुनिया जानती है, फिर भी वे अहम जिम्मेदारियों को संभाले हुए हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जिनकी संपत्ति की जांच की जाए तो बहुराष्टï्रीय कम्पनियों के मोटे पैकेज वाले अफसर भी पानी मांग ले। उनके पास सैकड़ों बीघे जमीन हैं और ऐसा कहा जाता है कि उनके पास बेनामी संपत्ति भी बहुत है। मैं रविवार की सुबह लम्बी वॉक पर जाता हूँ। जंगलों-पहाड़ों और नदियों को पार करते हुए। ऐसे ही एक वॉक पर मैंने खूबसूरत गाँव में एक विशाल फार्म हाउस देखा, जहाँ कई लोग काम कर रहे थे। अनेक खतरनाक कुत्ते टहल रहे थे, आसपास के लोगों से पूछा किसका है तो उन्होंने बताया कि कमिश्नर साहब का है। गेट पर सरनेम लिखा हुआ था, मैंने पता किया। वाकई वह एक आईएएस अफसर का था। मैं हैरान नहीं हुआ, इतना बड़ा बंगला और फार्म हाउस देखकर।
कुछ साल पहले एक आला नौकरशाह बार-बार मुझसे पूछते थे कि यार, फलां जगह जो सरकार का बड़ा प्रोजेक्ट आना है, उसका क्या हो रहा है? मैंने एक दिन उनसे पूछा कि आपकी दिलचस्पी इसमें इतनी ज्यादा क्यों है, तो उन्होंने बताया कि उनके पास वहां सैकड़ों बीघा जमीन है। प्रोजेक्ट से उनको भी फर्क पड़ सकता था। ऐसे ही एक नौकरशाह दंपत्ति के पास देहरादून में ही अब विकसित हो चुके गाँव में काफी बड़ी संपत्ति है, जो मुझे स्थानीय लोगों ने बताई। कई ऐसे नौकरशाहों का भी पता धीरे-धीरे चला, जिनके पास अकूत अचल संपत्ति है, लेकिन उनकी प्रतिष्ठा बहुत अच्छी रही। ऐसा इसलिए कि वे लोगों के बीच खुद की छद्म छवि बनाए रखने में कायम रहे। आज भी कई नौकरशाह ऐसे हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि उनके पास बेहिसाब संपत्ति हो चुकी है। जो किसी न किसी के नाम है। एक चर्चित ठेकेदार, जिस पर आयकर महकमे का छापा भी पड़ा और कई घोटालों में नाम उछला है, के पास कई आईएएस अफसरों का पैसा फंसा हुआ है, ऐसा कहा जाता है। कई पीसीएस अफसर हैं, जो संपत्ति के नजरिये से देखा जाए तो कई आईएएस अफसरों को मात देते हैं, मंत्री, पूर्व मंत्री और विधायक ही नहीं मामूली राजनेता भी हैं, जिन्होंने उत्तराखंड बनने के बाद अपनी जिंदगी सिर्फ संवारी नहीं है बल्कि आने वाली पुश्तों का इंतजाम कर दिया। उनकी संपत्ति का हिसाब लगा लिया जाए तो ताज्जुब होता है कैसे इतनी जल्दी ये सब कर लिया। मौजूदा
तन्ख्व्वाह में तो कई जन्मों में भी वे इतनी जायदाद जोड़ नहीं पाएँगे।
भ्रष्टाचार सिर्फ पैसा और रिश्वत ही नहीं होता है। वह तो सिर्फ एक अवतार मात्र है, भ्रष्टाचार का.अगर फर्जी सर्टिफिकेट से बड़ी या छोटी नौकरी भी हासिल की हो, ऐसे लोगों को संरक्षण दिया गया हो, या फिर भ्रष्ट लोगों या नौकरशाहों को प्रोत्साहन दिया जाए तो वह भी भ्रष्टाचार ही है। बल्कि ये वाला भ्रष्टाचार सबसे बड़ा है। त्रिवेंद्र चाहे जितना एलान कर ले कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाए हुए हैं लेकिन क्या उनका मंत्रिमंडल या मुख्यमंत्री सचिवालय वाकई साफ-सुथरा है? इस पर भी उनको जवाब देना होगा। सफाई की शुरुआत तो खुद से हो, तब जा के सन्देश जाता है, सिर्फ नौकरशाहों पर कार्रवाई करना या फिर पटवारियों को 10 हजार रूपये की रिश्वत में गिरफ्तार करने से कोई बड़ा सन्देश भ्रष्टाचारियों को नहीं जाने वाला है। एक बड़े हाउसिंग प्रोजेक्ट, जिसकी गड़बडिय़ों की तरफ से बड़े-बड़े कथित अखबारों ने आँख मूँद रखी है, क्योंकि वह करोड़ों का विज्ञापन उनको दे चुका है और दे रहा है, के बारे में जब मैंने लिखना शुरू किया और मुख्यमंत्री ने उस पर नजर रखनी, तो उनके ही एक गैर सरकार खासमखास शासन के एक बड़े नौकरशाह के पास प्रोजेक्ट की पैरवी करने पहुँच गए। मुझे खुद ये बात उस नौकरशाह ने बताई कि आपके इस प्रोजेक्ट पर लिखने के बाद वह मेरे से मिला और इस मामले में मदद तथा सहयोग की गुजारिश कर रहा था.अब बताइये, ऐसे में जीरो टालरेंस का नारा कैसे परवान चढ़ेगा।
मेरा मानना है कि सिर्फ चंदेक लोगों पर कार्रवाई जीरो टालरेंस नहीं हो सकता। मुझे समझ नहीं आता कि आखिर क्यों कर मुख्यमंत्री को वह आईएफएस अफसर नहीं दिख रहा, जिसकी गाड़ी में बैठ के एक घोटालेबाज ठेकेदार ने ऋ षिकेश में सरे आम गोलियां बरसाई। जो उस आईएफएस का यार है। जिसकी तस्वीरें तक गवाह हैं कि वे कितने करीबी हैं आपस में,क्यों पुलिस इस मामले को पहले तो दबाए बैठे रही, फिर मुकदमा होने के बावजूद कुछ न कर के बैठ गई। क्यों शराब महकमे के तीन अफसर चार्जशीट के बावजूद डीईओ की मलाईदार कुर्सी पर बैठे हुआ हैं और हैरानी इस बात की कि वे अभी भी पूरी धमक के साथ गड़बडिय़ों को अंजाम दिए हुए हैं। मेरे हिसाब से तो जीरो टालरेंस अभी पिक एंड चूज है। जब तक कि सभी पर कार्रवाई नहीं होती है। जब तक अच्छे नौकरशाहों को अच्छी जगह और दागी नौकरशाहों को उनकी सही जगह नहीं दिखाई
जाती है।

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