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चुनौतियों के चक्रव्यूह में राहुल

  • भाजपा समिट छत्तीशगढ़ , राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने छोंकी ताकत
  • पांच राज्यों के बिधानसभा चुनाव नतीजे तय करेंगे
  • लोकसभा चुनाव से पहले इन चुनावों को माना जा रहा है सेमीफइनल मुकावला
  • यूपी में भी कांग्रेस की सियासी भूमिका तय कर देगी चुनाव परिड|यम

Sanjay Sharma @ WeekandTimes

लखनऊ। पांच राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, मिजोरम, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में होने जा रहे विधानसभा चुनावों को लोकसभा चुनाव के पहले का सेमीफाइनल माना जा रहा है। बावजूद इसके देशभर की नजरें भाजपा शासित तीन राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश पर टिकी हैं। एक ओर कांग्रेस इन चुनावों में बेहतर प्रदर्शन कर लोकसभा चुनाव से पहले अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है, वहीं भाजपा सत्ता बरकरार रखकर मतदाताओं को सकारात्मक संदेश देना चाहती है। कांग्रेस इस जंग को मोदी बनाम राहुल बनाने में जुटी है। यही वजह है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राज्यों के चुनावों में भी मोदी पर लगातार हमलावर बने हुए हैं। वे नोटबंदी से लेकर राफेल तक का मुद्दा उठा रहे हैं। भाजपा ने भी इन राज्यों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। पीएम मोदी से लेकर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक इन राज्यों में ताबड़तोड़ चुनावी रैलियां कर रहे हैं। कुल मिलाकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए ये चुनाव किसी चुनौती से कम नहीं हैं। यदि कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन नहीं किया तो इसका भाजपा के खिलाफ विपक्ष के संभावित महागठबंधन पर असर पड़ेगा। वहीं यूपी में कांग्रेस की सियासी स्थिति बेहद कमजोर हो जाएगी और यहां उसे अपने लिए साथी तलाशना मुश्किल हो जाएगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस अध्यक्ष इन चुनौतियों के चक्रव्यूह को तोड़ पाने में सफल होते हैं या नहीं?

…लोकसभा चुनाव के पहले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव कांग्रेस की अग्निपरीक्षा से कम नहीं हंै। इस परीक्षा में पास होना कांग्रेस के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि कांग्रेस के खाते में पंजाब को छोडक़र अभी तक कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है। कांग्रेस अपने सिर से नाकामी का दाग किसी भी कीमत पर हटाना चाहती है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी इन परिस्थितियों को पूरी तरह भांप चुके हैं। कांग्रेस का फोकस भाजपा शासित राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश पर है। कांग्रेस के वरिष्ठï नेता यहां वापसी के लिए काफी आश्वस्त दिख रहे हैं। यही वजह है कि उन्होंने यहां अकेले चुनाव लडऩे का ऐलान किया था। कांग्रेस इन राज्यों में बसपा से गठबंधन से टालमटोल करती दिखी थी। लिहाजा बसपा प्रमुख मायावती ने बाकायदा प्रेस कांफें्रस कर कांग्रेस से किसी भी स्तर पर गठबंधन से इंकार कर दिया था। इसके कुछ दिन बाद सपा मुखिया अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस का साथ छोडऩे की घोषणा कर दी थी। कांग्रेस के दिग्गजों का मानना है कि इन राज्यों में सरकार के खिलाफ बना माहौल उनकी सत्ता में आसानी से वापसी करा देगा, इसलिए सत्ता में किसी दूसरे दल को भागीदारी नहीं दी जानी चाहिए। राजस्थान में बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस की सरकार बनती रही है, इसलिए कांग्रेसी नेताओं की यह आशा उचित कही जा सकती है। लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में स्थितियां पूरी तरह भिन्न है। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता काफी है। यहां उनके टक्कर में कोई कांग्रेसी नेता दूर-दूर तक नहीं दिखाई पड़ रहा है। बतौर मुख्यमंत्री उम्मीदवार शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता जहां 63 फीसदी है वहीं कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया की लोकप्रियता 28 फीसदी है। इसके अलावा पिछले दिनों उम्मीदवारों के चयन को लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह के बीच हुई तीखी झड़प से भी जनता में गलत संदेश गया है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। जाहिर है इसका नुकसान पार्टी को हो सकता है। दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह के खिलाफ कोई बड़ा कांग्रेसी चेहरा नहीं दिखाई पड़ता है। इसके अलावा अपने जनहित के कार्यों और नक्सलियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के चलते रमन सिंह वहां काफी लोकप्रिय हैं। यहां अजीत जोगी की जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ और मायावती की बसपा के बीच गठबंधन हो चुका है। अजीत जोगी की आदिवासी क्षेत्र में काफी पकड़ मानी जाती है। यह गठबंधन कांग्रेस और भाजपा को नुकसान पहुंचाएगी। हालांकि भाजपा ने इसकी भरपाई के लिए यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मोर्चें पर लगाया है। यहां काफी संख्या में लोग गोरखनाथ पीठ से जुड़े हैं, ऐसे में योगी का वहां चुनाव प्रचार करना भाजपा को कुछ लाभ जरूर दिलाएगा। वहीं कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में कोई खास रणनीति नहीं बनाई है। इसके अलावा यहां भी संगठन में खींचतान चल रही है। यही नहीं खुद पीएम मोदी ने भी मोर्चा संभाल लिया है। उन्होंने ताबड़तोड़ रैलियां शुरू कर दी है। छत्तीसगढ़ में अर्बन नक्सल का मुद्दा उठाकर मोदी ने कांग्रेस को घेरने की पूरी कोशिश की है। दूसरी ओर ताजा सर्वे भी इस बात की पुष्टिï कर रहे हैं कि कांग्रेस जितना इन तीनों राज्यों में अपने को मजबूत समझ रही थी, वैसी स्थिति फिलहाल नहीं दिखाई दे रही है। हालांकि सियासत में एक दिन में समीकरण बदलते हैं और किसी भी सर्वे को अंतिम नहीं माना जा सकता है। चुनाव परिणाम ही असली तस्वीर पेश करेंगे। जाहिर है, कांग्रेस अध्यक्ष को न केवल भाजपा बल्कि पार्टी के अंदर चल रही अंदरूनी खींचतान से भी निपटना पड़ रहा है। इसके अलावा उन्हें आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए अपनी रणनीति भी बनानी होगी। इतना तय है कि इन राज्यों में कांग्रेस की सफलता और असफलता भाजपा के खिलाफ महागठबंधन की दशा और दिशा तय करेंगे। साथ ही राहुल की नेतृत्व क्षमता को भी स्पष्टï कर देंगे।

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