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सेक्स स्कैंडल से डोलती बीजेपी की नैय्या

  • फसता दिख रहा देहरादून के मेयर का चुनाव
  • मुख्यमंत्री की पूरी ताकत के बावजूद संगठन के चलते संकट में गामा
  • संग और बीजेपी के भी खाती खुल के नहीं आरही सामने
  • भट्ट और त्रिवेंद्र के लिए अहम साबित होंगे निकाय चुनाव
  • रजनी राउत उड़ा रही गामा – दिनेश का चैन

चेतन गुरुंग @WeekandTimes

देहरादून। बीजेपी और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के लिए निजी प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुके देहरादून के मेयर के चुनाव में पार्टी के प्रत्याशी सुनील उनियाल गामा जबरदस्त संकट में दिख रहे हैं। बीजेपी के बर्खास्त महामंत्री (संगठन) संजय कुमार के सेक्स स्कैंडल में फंस जाने और इस मुद्दे को जिस तरह लोगों ने गंभीरता से लिया है, उसने पार्टी की नैय्या बुरी तरह डोल रही है। हालात ये हैं कि पार्टी के कई खांटी कार्यकर्ता चुनाव में खुल कर नहीं आ रहे और सेक्स स्कैंडल को हैंडल न कर पाने के लिए बीजेपी के नेतृत्व को निशाने पर लेने वाले राष्टï्रीय स्वयं सेवक संघ के लोग भी अब चुनाव में सिर्फ खाना-पूर्ति करते दिख रहे हैं। गामा की टक्कर कांग्रेस के खुर्राट प्रत्याशी पूर्व मंत्री दिनेश अग्रवाल से मानी जा रही थी। समझा जा रहा था कि दोनों में से कोई भी बाजी मार लेगा। हालांकि, जिस तरह गामा को संघ और खुद मुख्यमंत्री रावत का खुला समर्थन है, उससे ये समझा जा रहा था कि गामा एक तरफा न सही लेकिन जंग में दिनेश से आगे है। सियासी समीक्षक भी ऐसा ही मानकर चल रहे थे, इस बीच दो ट्विस्ट इस कहानी में आ चुके हैं। जिस रजनी रावत को कोई नहीं भाव दे रहा था, वह बहुत तेजी से ऊपर आ चुकी है। आम आदमी पार्टी के टिकट पर वह पूरी दमदारी से लड़ रही है। इसमें शक नहीं कि ऐसे लोगों की तादाद कम नहीं है, जिनको कांग्रेस से तो आज भी नाराजगी है लेकिन अब उनका मोह बीजेपी से भंग होता दिख रहा है।

उनको रजनी में बढिय़ा विकल्प मेयर चुनाव के लिए दिख रहा है। ऐसा मानने वाले भी बहुत थे, जो ये कह रहे कि अभी तक की तस्वीर ये है कि जीते जो भी दूसरे नंबर पर रजनी तय है। अब वे ये कहने से भी नहीं हिचक रहे कि दिनेश के बहुत सुस्त और उत्साहहीन ढंग से लडऩे और कांग्रेस की तरफ से भी बहुत जोश न दिखाए के कारण संजय सेक्स स्कैंडल से कमजोर पड़ गई बीजेपी को अब रजनी जम कर चुनौती दे रही है। वह चमत्कार भी कर दे तो आश्चर्य नहीं होगा। रजनी प्रचार के मामले में भी कम नहीं दिख रही, उनको किन्नर समाज से ही नहीं, बल्कि कांग्रेस-बीजेपी से खार खाए बैठे लोग भी हर तरह से सहयोग कर रहे हैं।
गामा को झटका कई तरह से लगा है। पहले तो अनिल गोयल और उमेश अग्रवाल को टिकट न मिलने के कारण दोनों ही तकरीबन शांत बैठे हुए हैं। वे सिर्फ खानापूरी कर रहे हैं। काम करने के नाम पर,वैश्य समाज भी खुद को बार-बार ठगा सा महसूस कर रहा हैं। गोयल और अग्रवाल अभूत पुराने भाजपाई भर नहीं हैं। उन्होंने पार्टी की मदद उसके गुरबत के दिनों में की है। अब जब पार्टी सत्ता और ताकत में है तो दोनों को बार-बार बे आबरू किये जाने से वैश्य समाज का रुख बीजेपी से नाखुशी वाला साफ दिख रहा है।हंगामा और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट की तमाम कोशिशों और मुख्यमंत्री की तरफ से भी हर मुमकिन कोशिशों के बावजूद बीजेपी उठती दिख नहीं रही है। बची-खुची कसर संजय कुमार के सेक्स स्कैंडल में फंस जाने और उसकी विदाई ही नहीं बल्कि बीजेपी के महानगर अध्यक्ष विनय गोयल के भी विवादित बयान ने पूरी कर दी.गोयल ने न सिर्फ बीजेपी को जबरदस्त झटका दिया बल्कि संघ की प्रतिष्ठा को पूरी तरह धूल-धूसरित कर दिया.उन्होंने ये कह के एक किस्म से संघ को बेनकाब कर दिया कि संघ के प्रचारक कोई खुदा के बन्दे नहीं है, वे भी महिलाओं के शरीर के भूखे हैं.उनका प्रचारकों की भी शारीरिक नीड होने का मतलब यही है.आम लोगों ने ही नहीं बल्कि संघ और बीजेपी से रिश्ता रखने वाले तक इस सेक्स स्कैंडल के बाद बीजेपी में दिलचस्पी दिखा नहीं रहे।.इतना ही नहीं बची-खुची कसर खराब प्रचार रणनीति और नेतृत्व पूरी कर रहा है।
बीजेपी के लिए स्थानीय निकाय चुनाव अहम तो है ही, मुख्यमंत्री और भट्ट के लिए भी ये जीने-मरने का सवाल है.भट्ट को विधानसभा चुनाव में मोदी लहर में भी हार जाने के बावजूद अध्यक्ष बना के रखा हुआ है.निकाय चुनाव में नतीजे अच्छे नहीं आए तो उनकी जिम्मेदारी तय हो जाएगी.दूसरी ओर त्रिवेंद्र के लिए ये चुनाव सिर्फ उनकी सरकार के लिए जनमत सर्वेक्षण नहीं है.ये उनकी कार्य शैली का ही इम्तिहान है.इन चुनावों के नतीजे ये भी तय करेंगे कि लोग उनके नेतृत्व से खुश हैं या नाराज.ये भी तय हो सकता है कि क्या आने वाले लोकसभा चुनाव में, जो सिर पर हैं, में त्रिवेंद्र और भट्ट पर भरोसा किया जा सकता है या नहीं।
दोनों को और बीजेपी-संघ को ये समझना होगा कि भले उत्तराखंड के बाकी मेयर की सीट या अध्यक्षों की कुर्सियों पर जीत हासिल हो जाए या फिर पार्षदों और सदस्यों की ज्यादा सीटें पार्टी जीत ले, लेकिन देहरादून के मेयर की सीट अगर हाथ से चली गई तो फिर इज्जत बचेगी नहीं.फिलहाल तो संजय सेक्स स्कैंडल ने अगर बीजेपी को हिला के रखा है तो कांग्रेस में जान फूंक डाली है.अब वे इस मुद्दे को भी सरकार के कामकाज और प्रदर्शन से जोड़ के चल रहे हैं। बीजेपी को एक दिक्कत इस चुनाव में ये भी है कि मोदी नाम की माला के जाप से न तो फायदा दिख रहा, न ही पार्टी और प्रत्याशी इसका इस्तेमाल ही कर रहे। उनको ये भी उम्मीद नन्ही दिख रही कि इस नाम से निकाय चुनाव में कोई फायदा भी होगा। ऐसे में गामा उस्ताद के बजाए शागिर्द ही बन के रह जाते हैं तो अचम्भा नहीं होगा।

 

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