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सियासत पर सिसकती अयोध्या

  • वोटों की फसल काटने की तैयारी में भाजपा सिवसेना
  • वाया अयोध्या दिल्ली के राजपथ का सफर तय करने की मंशा
  • महा गठबंधन की काठ के लिए हिंदुत्व का मास्टर स्टोक तैयार

Sanjay Sharma @WeekandTimes

भगवान राम की नगरी अयोध्या एक बार फिर सियासत पर सिसक रही है। उसे फिर छले जाने का बोध अभी से होने लगा है। रामलला अपने टेंट से बाहर आएंगे या नहीं, इसकी चिंता उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही है। मंदिर निर्माण के तमाम हिमायतियों को वह पहले भी देख चुकी है, अब भी देख रही है। वह यथार्थ समझ चुकी है। कुछ-कुछ सियासत भी समझने लगी है। अयोध्या की इन चिंताओं से बेखबर भाजपा और शिवसेना अपने-अपने सियासी दांव-पेंच चलने में मशगूल हैं। पिछले दिनों संघ, विहिप और साधु-संतों की जमात ने जिस फसल को अयोध्या की धरती पर लहलहा दिया है, भाजपा अब उसको काटने की तैयारी में है। भाजपा ने मंदिर के बहाने एक बार फिर ध्रुवीकरण की राजनीति तेज कर दी है। वह वाया अयोध्या दिल्ली के राजपथ तक का सफर तय करना चाहती है। वहीं शिवसेना मंदिर के रास्ते उत्तर प्रदेश में अपनी सियासी जड़ें जमाने की तैयारी कर रही है। भाजपा की इस चाल से विपक्ष चिंतित और हमलावर है। कुल मिलाकर यह देखना दिलचस्प होगा है कि मंदिर के मुद्दे पर इस बार भाजपा की दाल गलती है या नहीं।

….राम मंदिर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अगले साल जनवरी तक सुनवाई टालने के बाद यह मुद्दा गरम हो गया। हालांकि इसके पहले भी साधु-संत अयोध्या में राम मंदिर निर्माण में देरी पर केंद्र की मोदी और यूपी की योगी सरकार से अपनी नाराजगी जता चुके थे। साधु-संतों को उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट में जल्द सुनवाई और फैसले से स्थितियां साफ हो जाएंगी। इस मामले में कई बार सुप्रीम कोर्ट से जल्द से जल्द सुनवाई की अपील भी की गई लेकिन इसका कोई असर नहीं पड़ा। आखिरकार इस मुद्दे को हवा दी जाने लगी। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। भागवत ने सरकार से अध्यादेश लाकर मंदिर निर्माण का आग्रह किया। उत्तर प्रदेश के कई भाजपा नेता भी मंदिर निर्माण पर खुलकर बयान देने लगे। यहां तक कहा गया कि मोदी और योगी राज में मंदिर नहीं बनेगा तो कब बनेगा। इसी बीच विहिप ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी और अयोध्या में धर्मसभा का ऐलान कर दिया। यही से पूरा मामला सियासी होने लगा। केंद्र में भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने भी मंदिर मुद्दे पर मोदी सरकार को घेर लिया। स्वयं उद्धव ठाकरे दो दिवसीय दौरे पर अयोध्या पहुंचे और पहले मंदिर, फिर सरकार का नारा दिया। विहिप की साधु-संतों की धर्मसभा में करीब तीन लाख रामभक्त पहुंचे। यह सभा इस अर्थ में सफल मानी जा सकती है कि इसने एक बार फिर मंदिर मुद्दे को देशव्यापी बना दिया और हिंदुओं के ध्रुवीकरण का रास्ता बहुत कुछ साफ कर दिया। सभा में यह संकल्प लिया गया कि जब तक मंदिर नहीं बन जाता है, आंदोलन शांत नहीं होगा। धर्मसभा को सफल बनाने में संघ ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। पीएम मोदी और सीएम योगी भी मंदिर पर खुलकर बोलने लगे। पीएम मोदी ने मंदिर के बहाने कांग्रेस पर सीधा हमला बोला और कहा कि कांग्रेस ही मंदिर निर्माण में सबसे बड़ी रोड़ा बनी है। मंदिर आंदोलन के पीछे की सियासत आईने की तरह साफ है। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं। भाजपा यहां सरकार विरोधी माहौल को मंदिर आंदोलन के जरिए मोडऩा चाहती है। लिहाजा पीएम मोदी और सीएम योगी मंदिर मुद्दे पर विपक्ष विशेषकर कांग्रेस को निशाने पर ले रहे हैं। कांग्रेस पर निशाना साधने के पीछे कारण यह है कि इन तीनों ही राज्यों में कांग्रेस ही प्रमुख विपक्षी पार्टी है और यहां उसका मजबूत जनाधार है। दूसरे, भाजपा को लोकसभा चुनाव में महागठबंधन से सामना होने की भी आशंका है। यूपी में सपा-बसपा गठबंधन से भाजपा को कई सीटें गंवानी पड़ सकती हैं। लिहाजा, मंदिर मुद्दे के जरिए वह हिंदुत्व का कार्ड खेलना चाहती है। भाजपा के दिग्गजों को उम्मीद है कि इस कार्ड से भाजपा को काफी फायदा होगा और वह यहां पिछले लोकसभा चुनाव के परिणामों को दोहराने के करीब होगी। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश की 80 में 71 सीटें मिली थीं। दो पर उसके सहयोगी अपना दल ने विजय प्राप्त की थी। विपक्ष भी मंदिर निर्माण को लेकर भाजपा को घेरता रहा है। विपक्ष हमेशा भाजपा से मंदिर निर्माण की तारीख पूछता रहा है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू नहीं होने और सहयोगी दलों और संगठनों के दबाव के कारण सरकार के सामने आगे कुंआ और पीछे खाई वाली स्थिति बन गई है। सरकार अध्यादेश लाने के पक्ष में नहीं दिख रही है। वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करेगी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी अध्यादेश से इंकार किया है। हालांकि शाह ने मंदिर निर्माण को भाजपा का एजेंडा बताया है और कहा है कि अयोध्या में राम मंदिर जरूर बनेगा। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने मंदिर निर्माण की जगह विकास को चुनाव का मुद्दा बनाया था और इसका उसे काफी फायदा भी मिला था। लेकिन इस बार स्थितियां कुछ अलग दिख रही है। हालांकि पीएम मोदी और शाह दोनों ही चुनाव में विकास को अपना मुद्दा बना रहे हैं लेकिन वे मंदिर मुद्दे को भी भुनाने से नहीं चूकेंगे। फिलहाल भाजपा के दिग्गज अयोध्या में उपजी ताजा स्थितियों पर नजर रखे हुए हैं। मंदिर निर्माण पर जिस तरह साधु-संतों, विहिप और संघ ने झंडा बुलंद किया है, उससे सरकार कैसे निपटेगी यह तो वक्त बताएगा लेकिन इतना तय है कि आने वाले दिनों में अयोध्या में सियासत तेज होगी और यह हलचल कम से कम लोकसभा चुनावों तक जारी रहेगी।

 

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