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नतीजे बेहतर न होने के बावजूद मोदी-शाह के लाडले त्रिवेंद्र

  • सरकार-संगठन में शीत युद्ध!
  • डोईवाला और अल्मोड़ा सीट की शिकस्तों से खलबली का आलम

चेतन गुरुंग

देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और सत्तारूढ़ बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट के बीच गैरसैण में सर्दियों के दौरान विधानसभा सत्र आयोजित करने को लेकर मतभेद सामने आने को संगठन और सरकार के बीच शीत युद्ध के तौर पर देखा जा रहा है। दोनों की बयानबाजी तब सामने आई जब पार्टी देहरादून के डोईवाला, अल्मोड़ा, कोटद्वार और हरिद्वार में मेयर और पालिका अध्यक्षों की अहम सीटों को गंवा कर गाल सहला रही है। इन सीटों पर हार से पार्टी में खलबली का आलम है लेकिन सरकार और संगठन के मुखिया के बीच विरोधाभासी बयानबाजी ने साफ़ कर दिया है कि दोनों के बीच कुछ तो गड़बड़ है।
त्रिवेंद्र को साफ़ और कठोर अंदाज में बात कहने के लिए जाना जाता है। वह इसकी परवाह नहीं करते हैं कि जो वह कह रहे हैं, उसका क्या असर होगा। वह दबाव की सियासत को भी बर्दाश्त नहीं करते हैं। यही वजह है कि डेढ़ साल गुजर जाने और तमाम दबावों के बावजूद उन्होंने मंत्रिपरिषद में खाली दो सीटों को भरा नहीं है। उनसे जब भी इस बारे में पूछा जाता है वह यही कहते हैं कि इस पर विचार चल रहा है। त्रिवेंद्र का अंदाज काम करने के मामले में बिल्कुल जुदा होने से संगठन के लोग भी परेशान हैं। संघ को तो तकरीबन पूरी तरह सरकार के कामकाज के तरीके से असहमत समझा जाता है। ये बात अलग है कि न संगठन और न संघ के अफसरों में कोई ताकत है, जो त्रिवेंद्र का बाल भी बांका कर सके।
अजय भट्ट को सुलझे हुए अनुभवी राजनेताओं में शुमार किया जाता है लेकिन गैरसैण में विधानसभा सत्र आयोजित करने के बारे में उन्होंने ये कह कर एक किस्म से सरकार के कामकाज में दखल दे दिया कि जब तक गैरसैण में आधारभूत सुविधायें पर्याप्त रूप से उपलब्ध न हो, वहां सत्र आयोजित करने का औचित्य नहीं है। उनकी इस बात में तर्क जरूर है लेकिन पहाड़ के हिमायती और देहरादून में अंतरिम राजधानी के विरोधियों को उनकी बात अखर गई। उन्होंने तुरंत ही बीजेपी के साथ ही सरकार पर भी हमला बोल दिया कि भट्ट के बयान से गैरसैण विरोधी सोच उभर आई है.सूत्रों के मुताबिक़ त्रिवेंद्र को भी भट्ट का बयान पसंद नहीं आया। उन्होंने भी मीडिया के पूछे जाने पर ये बोल के संगठन पर ही एक किस्म से हमला कर दिया कि सरकार से जुड़े फैसले सरकार ही करेगी और उसको ही इस पर बोलने का हक़ भी है। इस पर भट्ट एक बार फिर बोल पड़े और नसीहत के अंदाज में बोल दिया कि संगठन से ही सरकार है और सरकार से हटने के बाद सभी को संगठन में ही आना होता है। अभी तक दोनों के बीच हमेशा बढिय़ा तालमेल दिखता रहा है लेकिन अचानक ऐन स्थानीय निकाय चुनाव नतीजों के बाद दोनों के आक्रामक बयानों ने बीजेपी-सरकार में अन्दर का तापमान बढ़ा दिया है। दोनों के बीच खटास भी झलक रही है। इसकी वजह निकाय चुनावों के नतीजों को भी माना जा रहा है। कहीं न कहीं ये सन्देश निकल कर सामने आ रहा है कि डोईवाला में संगठन के लोगों ने और अल्मोड़ा में त्रिवेंद्र के करीबियों ने वैसा काम नहीं किया, जैसी जरूरत थी, इसके चलते दोनों को नीचा देखना पड़ा।
चुनाव में जो मत प्रतिशत बीजेपी को मिला है, उससे भी दोनों ही एक-दूसरे से संतुष्ट नहीं बताए जाते हैं। इसके लिए संगठन के लोग सरकार के कामकाज को जिम्मेदार बता रहे हैं। त्रिवेंद्र के करीबी संगठन की सुस्ती को। त्रिवेंद्र के लिए ये हालात ठीक नहीं हैं। संघ के लोग उनसे पहले ही मुंह फुलाए हुए हैं। पार्टी के प्रदेश महामंत्री (संगठन) पद से बर्खास्त संजय कुमार सेक्स स्कैंडल पर भी उनको लगता है कि सरकार का साथ मिला होता तो ये मामला इतना न उछलता। ब्राह्मण लॉबी शुरू से ही त्रिवेंद्र के खिलाफ है और ठाकुर लॉबी में भी दो फाड़ है। दूसरी लॉबी के लोग भगत सिंह कोश्यारी से जुड़े हैं, जो त्रिवेंद्र से खुश नहीं बताए जाते हैं। ये बात अलग है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्टï्रीय अध्यक्ष अमित शाह का विश्वास और आशीर्वाद त्रिवेंद्र के प्रति कम नहीं हुआ हुआ.इसके चलते उनको कोई बड़ी दिक्तत आएगी, इसकी सम्भावना कम ही है।

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