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खलंगा में याद की गई पूर्वजों की बहादुरी

  • नालापानी युद्ध में गोरखाओं ने फिरंगियों को नाको चने चबवा दिए थे
  • मेले और सांस्कृतिक आयोजन ने बांधा समा
  • नहीं पहुंचे मुख्यमंत्री और विधायक

WeekandTimes News Network

देहरादून। 1814 में नवम्बर के अंतिम हफ्ते में जब गोरखा सेनापति बलभद्र कुंवर ने देखा कि खलंगा किला अब बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है और महिलाएं तथा बच्चे फिरंगी फ़ौज के गोला-बारूद और हमलों में या तो रोजाना मारे जा रहे हैं या फिर बुरी तरह घायल हैं और खाने-पीने के लिए भी रसद नहीं बचा तो वह हाथ में खुखरी थामे बचे-खुचे जांबाज गोरखा फौजियों तथा महिलाओं-बच्चों के साथ किले से ये कहते हुए निकल गए कि किला अब उनके रहने लायक नहीं रह गया है, इसलिए वे छोडक़र जा रहे हैं। वे हारे नहीं हैं। उस वक्त के हिसाब से आधुनिक और प्रशिक्षित ईस्ट इंडिया कम्पनी की फ़ौज, जिसके पास बंदूकें और तोपें भी थीं तथा तादाद में 30 गुना ज्यादा थी, की हिम्मत नहीं हुई कि वे मुट्ठी भर रह गए बुरी तरह घायल गोरखा जांबाजों पर हमला कर सके।
उन्होंने खामोशी संग न सिर्फ उनको जाने दिया बल्कि उनकी बहादुरी और हिम्मत से इस कदर प्रभावित हुए कि नालापानी, जहां खलंगा किला था से तीन साढ़े तीन किलोमीटर दूर जब अपने शहीदों की याद में युद्ध स्मारक का निर्माण किया तो गोरखा जांबाजों के सम्मान में भी साथ ही एक स्मारक बनाया। दुनिया में शायद ये इकलौती मिसाल होगी कि दुश्मन ने दुश्मन की वीरता के सम्मान में कोई स्मारक का निर्माण किया। इस युद्ध के जांबाज गोरखा सैनिकों और उनकी वीरता की याद में हर साल की तरह इस बार भी खलंगा में भव्य मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस आयोजन में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, स्थानीय विधायक उमेश शर्मा काऊ, जो बीजेपी के ही हैं को भी निमंत्रित किया गया था, लेकिन दोनों हामी भरने के बावजूद नहीं पहुंचे.नालापानी-खलंगा युद्द में गोरखा जांबाजों की वीरता से अंग्रेज इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने गोरखाओं से तत्काल दोस्ती कर ली और उनको अपनी सेना में शामिल कर लिया। सुबाथू, अल्मोड़ा और नाहन में तीन गोरखा पलटनों की स्थापना भी कर ली। नेपाल में इस जंग और गोरखा सैनिकों की जांबाजी पर फिल्में तक बन रही हैं। खलंगा युद्ध में ईस्ट इंडिया कम्पनी की फ़ौज के ब्रिगेडियर जनरल जिलेस्पी पहले दिन ही मारे गए थे।
फिरंगी फ़ौज के बेहतर और खतरनाक हथियारों के सामने बलभद्र कुंवर की फ़ौज और महिलाओं के पास सिर्फ चंद भरवा बंदूकें, तलवार, भाले, खुखरियां और पत्थर थे.फिरंगी फ़ौज को कई दिनों तक युद्ध करना पड़ा और सैकड़ों लोग उसकी तरफ से मारे गए। दुबारा फ़ौज भी मंगानी पड़ी.साथ ही जिस सागरताल से गोरखा सैनिक और उनकी महिलाएं पीने का पानी भरती थीं, उस पर भी सख्त पहरा बिठा दिया गया था। गोरखा फ़ौज की बहादुरी का ही आतंक था कि हजारों की तादाद में होने के बावजूद फिरंगी फ़ौज ने मु_ी भर गोरखा फ़ौज और महिलाओं को रोकने या हमला करने का जोखिम नहीं उठाया। खलंगा मेले में 4/4 गोरखा रेजिमेंट ने आयोजकों को पूरी मदद दी। रेजिमेंट के बैंड के प्रदर्शन ने भी सबका मन मोहा। कर्नल (रि) एसएम शाही ने युद्ध के बारे में जानकारी दी। गोरखाली कलाकारों ने नेपाली के साथ ही हिंदी, गढ़वाली, कुमायूंनी लोक गीत और नृत्यों की मोहक प्रस्तुति दी। नेपाली व्यंजन के तमाम स्टाल लगाए गए थे। लोगों ने उनका जम कर स्वाद लिया। सुबह खलंगा युद्ध के शहीदों और वीरों की याद में वीरता वॉक का आयोजन किया गया जो खलंगा द्वार से खलंगा स्मारक तक हुआ। इसमें भारी तादाद में लोगों ने शिरकत की। मेले में आयोजन समिति के अध्यक्ष कर्नल डीएस खडक़ा, गोरखाली सुधार सभा के अध्यक्ष पदम् सिंह थापा, ब्रिगेडियर पीएस गुरुंग, प्रभा शाह, पूजा सुब्बा कर्नल सीबी थापा, बीनू गुरुंग, एलबी गुरुंग और समिति के पूर्व अध्यक्ष राम सिंह थापा भी मौजूद थे। राम सिंह ने समिति की उपलब्धियों के बारे में बताया।

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