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तेजी से जहरीली हो रही राजधानी की हवा, ठंडे बस्ते में सरकारी योजनाएं

  • राजधानी में धड़ाधड़ काटे जा रहे पेड़, तेजी से उग रहे कंक्रीट के जंगल
  • बढ़ते वाहन, अतिक्रमण और जाम ने बढ़ाई मुसीबत

वीक एंड टाइम्स न्यूज नेटवर्क

लखनऊ। राजधानी की हवा में प्रदूषण का जहर घुलता जा रहा है। प्रदूषण का लेवल खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। सरकार हर साल इसके समाधान की योजनाएं बनाती है लेकिन उस पर अमल नहीं किया जा रहा है। कोर्ट के आदेश के बावजूद स्थितियों में सुधार होता नहीं दिख रहा है। सारी योजनाएं कागजों में दफन होकर रह गई है। लिहाजा स्थितियों में सुधार होने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिख रही है।
कम होती हरियाली, लगातार बढ़ रही जनसंख्या, बढ़ते वाहन और कंक्रीट के जंगलों के कारण राजधानी में प्रदूषण का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। लोग जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। हालात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि डब्ल्यूएचओ ने लखनऊ को विश्व का सातवां सबसे अधिक प्रदूषित शहर घोषित किया था। तब खूब हाय तौबा मची थी, तमाम योजनाएं तैयार की गई, लेकिन उसमें किसी भी योजना को जमीन पर नहीं उतारा गया। शहर की बढ़ती आबादी के ग्राफ का सीधा असर हरियाली पर दिखाई दे रहा है। जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार के बीच हरियाली दम तोड़ रही है। वायु से लेकर मिट्टी और पानी तक सभी प्रदूषित होते जा रहे हैं। आए दिन पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट आती है कि शहर की आबोहवा सांस लेने लायक नहीं बची है। कई इलाकों में प्रदूषण का लेवल काफी खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। वहीं आईआईटीआर हर साल प्रदूषण लेवल को माप कर इससे बचाव के लिए सुझाव देता है, लेकिन सरकार और जिम्मेदार अधिकारी नहीं चेत रहे हैं। यही नहीं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नोटिस और हाईकोर्ट के आदेश भी बेअसर दिख रहे हैं। नगर निगम खुले में कूड़ा निस्तारण से बाज नहीं आ रहा है। वहीं सफाई कर्मी भी कूड़ा जला रहे हैं। इससे प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। यह स्थिति बेहद खराब है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषित हवा में सांस लेने से हृदय-श्वांस रोगियों, गर्भवती महिलाओं, वृद्ध और बच्चों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचता है। पीएम 10 के बढ़े हुए स्तर में सांस लेने से हृदय की बीमारी, सांस की समस्याएं जैसे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस होने का खतरा है।

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