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पटरी से उतरी रेलवे की व्यवस्था

बेडरोल देना और वापस लेना कोच अटेंडेंट की जिम्मेदारी है और अगर वह यह नहीं कर रहा, तो उसकी खबर ली जानी चाहिए। सच तो यह है कि रेलवे ने वादे बहुत किए, लेकिन यात्री सुविधाओं और सुरक्षा के नाम पर ऐसा कुछ नहीं किया कि ‘वाह’ निकलती।

अर्चना दयाल

सुनने में अजीब लगता है कि भारतीय रेल की ट्रेनों के एसी कोचों से तकरीबन एक साल में करोड़ों की कीमत के बेडरोल आइटम चोरी हो गए। रेलवे का कहना है कि यह सारा सामान इन कोच में जाने वाले यात्री अपने साथ उठा ले गए। यह सब तब है, जब रेलवे लगातार अपनी सुविधाओं का आधुनिकीकरण करने का दावा कर रहा है और स्वाभाविक ही है कि महंगी होती रेल-यात्रा के इस दौर में यात्री भी नई-नई सुविधाओं की अपेक्षा कर रहे हैं। वैसे भारतीय रेलों में कोच से तौलिए गायब होने की शिकायत तब से चली आ रही है, जब से ट्रेनों में बेडरोल संस्कृति की शुरुआत हुई। किसी हद तक बेडशीट की बात मान भी ली जाए लेकिन थोड़ा अजीब लगता है कि यात्री कंबल भी उठा ले जा रहे हैं।
इसी तरह तकिए गायब होने की बात भी गले नहीं उतरती। सब जानते हैं कि चंद ट्रेनों और प्रथम एसी को छोड़ दें तो रेलवे के तकिए और उसके कवर का जो हाल रहता है, उसे कोई ट्रेन में भी नहीं इस्तेमाल करना चाहता। ऐसे में पकड़े जाने के जोखिम के बाद भी कोई यात्री तकिया या कंबल साथ ले जाएगा? अजीब यह भी है कि अगर इस पैमाने पर चोरी हो रही है तो यात्रियों को दोष देने की बजाय उस तंत्र का परीक्षण होना चाहिए, जिसके होने के बावजूद यह सब जारी है। बेडरोल देना और वापस लेना कोच अटेंडेंट की जिम्मेदारी है और अगर वह यह नहीं कर रहा तो उसकी खबर ली जानी चाहिए। सच तो यह है कि रेलवे ने वादे बहुत किए, लेकिन यात्री सुविधाओं और सुरक्षा के नाम पर ऐसा कुछ नहीं किया कि ‘वाह’ निकलती। तय हुआ था कि हर कोच में सीसी कैमरे लगाए जाएंगे, लेकिन कितनी ट्रेनों में यह हुआ, रेलवे ही बेहतर जानता होगा। मानने में हर्ज नहीं कि सामान गायब होने की रफ्तार पहले की अपेक्षा काफी बढ़ी है और अब जबकि कंबल जैसी चीज भी इसमें शामिल हो चुकी है, तो यह रेलवे के लिए सतर्क होने का वक्त है कि कहीं अंदर भी तो गड़बड़ नहीं है। बेहतर होता कि रेलवे एक रिपोर्ट यह भी जारी करता कि बीते साल यात्रियों ने खराब और गंदे बेडरोल की कितनी शिकायतें कीं और उन पर क्या कार्रवाई हुई? यह भी बताना चाहिए कि रात के अंधेरे में अगर कोई यात्री कोच अटेंडेंट को तलाशना चाहे तो क्या करे क्योंकि कई बार तो कोच कंडक्टर को भी उसका अता-पता नहीं होता। यह भी बताना चाहिए था कि अब रेलवे के बेडरोल आइटम्स पर काली स्याही वाली पारंपरिक मुहर अनिवार्य रूप से क्यों नहीं लगती जो किसी भी यात्री को कम से कम एक बार तो वह सामान ले जाने से हतोत्साहित करती। यह भी जरूर बताना चाहिए था कि उसने इन सामानों की एवज में नियम के अनुसार इस काम को अंजाम देने वाले ठेकेदारों से कितनी रकम वसूली? यह सब होता तो शायद तस्वीर का दूसरा पहलू भी सामने आ पाता।

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