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शिकस्तों से फीका पड़ा फतह जॉन

  • प्रीतम के लिए देहरादून मेयर सीट हारना बड़ा झटका
  • अंदुरुनी कलह और ख़राब टिकट वितरण की कीमत दोनों डालो ने चुकाई
  • पंत और सुबोध का बड़ा ग्राफ
  • त्रिवेंद्र भटट हरक और कौशिक को गढ़ में मिली मात

Chetan Gurung @ WeekandTimes

देहरादून। स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के गंभीर होने की वजह थी और माना जा रहा था कि कई कारणों से ये चुनाव बहुत अहम साबित होंगे। चुनावों के नतीजे जहां मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल पर जनमत संग्रह साबित होंगे वहीं लोक सभा चुनाव से पहले क्या सियासी बयार अवाम के मन में बह रही, उसका भी अंदाज हो जाना था। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह को भी ये साबित करना था कि उनके हाथों में कमान आने के बाद पार्टी किस तरह आगे बढ़ रही है। बीजेपी के लिए देहरादून के मेयर की सीट बहुत संवेदनशील हो चुकी थी। कांग्रेस के लिए ये सीट प्रतिष्ठा का सवाल तथा तगड़ी चुनौती बनी हुई थी। नतीजे सामने आए तो देहरादून समेत राज्य की सात में से पांच मेयर सीट बीजेपी ने कब्जा ली, लेकिन हरिद्वार और कोटद्वार की मेयर सीट पर शिकस्त ने जहां पार्टी को झटका दिया, वहीं डोईवाला नगर पालिका सीट पर कांग्रेस ने बीजेपी को जबरदस्त सदमा दे डाला। ये सीट छोटी होने के बावजूद इसलिए बहुत अहम थी कि मुख्यमंत्री की ये गृह सीट थी। वह यहीं के रहने वाले हैं। यहां की शिकस्त ने बीजेपी को भारी जश्न मनाने से रोक दिया। इसके साथ ही बीजेपी के चुनाव अभियान को निर्दलियों ने भी काफी हद तक हिला डाला। बेशक कांग्रेस के लिए हालात और बुरे रहे। वह प्रदेश में तीसरे नंबर पर रही। देहरादून नगर निगम में भले उसने 100 में से 33 सीटें जीतीं। बीजेपी ने 59 पर कामयाबी पाई। लोकसभा चुनाव में पांचों सीटों को झोली में डालने की फिराक में बैठी कांग्रेस के लिए ये मंथन का वक्त है।

……बीजेपी ने देहरादून में पूरी ताकत झोंक रखी थी। ख़ास तौर पर मुख्यमंत्री खुद मोर्चे पर न सिर्फ जुटे हुए थे, बल्कि सबसे ज्यादा फिक़्र उनको इसी सीट की थी। शायद उनको ये अहसास नहीं था कि इस फेर में उनके घर की सीट डोईवाला में सेंध लग गई है। सुनील उनियाल गामा त्रिवेंद्र के बहुत करीबियों में शुमार किए जाते हैं। वह पिछले दो साल से बहुत सक्रिय थे। उनको अगर उमेश अग्रवाल, अनिल गोयल और पुनीत मित्तल पर तरजीह के साथ टिकट मिला तो उसके लिए सिर्फ त्रिवेंद्र की उनके हक़ में वोट दिया जाना था। बीजेपी से ज्यादा गामा की जीत त्रिवेंद्र के लिए निजी लड़ाई बन चुकी थी। गामा के लिए जीत आसान नहीं रह सकती थी। इसका अंदाज सभी को था। ख़ास तौर पर दो कारणों से,एक तो बीजेपी ने गामा को टिकट दे के शहर के पंजाबी और वैश्य मतदाताओं को काफी हद तक नाराज कर दिया था। दूसरे कांग्रेस ने दिनेश अग्रवाल को मैदान में उतार दिया था।अग्रवाल को कद और वजन के लिहाज से गामा से आगे तो माना ही जा रहा था, वैश्य और पंजाबियों की कमल के फूल से नाराजगी हाथ को मजबूत करने की वजह भी देखी जा रही थी। शुरू में जब नतीजे आने लगे तो लगा कि मामला बीजेपी के लिए फंस गया है, लेकिन फिर त्रिवेंद्र की अपनी मेहनत जीत के तौर पर रंग ले आई, लेकिन बीजेपी और त्रिवेंद्र इसका जश्न मनाने की सोचती तब तक डोईवाला, हरिद्वार, कोटद्वार और अल्मोड़ा से निराश करने वाली खबर आ गई। डोईवाला में पार्टी की हार से परेशान त्रिवेंद्र खुद मतगणना के दौरान पहुँच गए थे। कांग्रेस की सुमित्रा मनवाल ने यहाँ फतह का झंडा बुलंद कर दिया। कोटद्वार में पार्टी को गहरा झटका लगा। यहाँ के विधायक और मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत हैं। हरिद्वार में भी नगर निगम हाथ से निकल गया। यहाँ चुनाव की कमान न सरकार के प्रवक्ता और मंत्री मदन कौशिक ने संभाली हुई थी। नतीजों के लिए दोनों इसलिए जिम्मेदार हैं कि टिकट दिलाने वाले भी रावत और कौशिक ही थे। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष भट्ट के घर अल्मोड़ा और चिनियानाला में भी कमल मुरझा गया। सच तो ये है कि कांग्रेस की मेयरों की ज्यादा सीटों पर हार के गम को इन जीतों ने काफी हद तक दूर कर दिया। बीजेपी के साथ उल्टा हुआ,उसकी ज्यादातर सीटों पर फतह के स्वाद को इन सीटों पर करारी शिकस्तों ने कड़वा कर दिया। देहरादून नगर निगम में तो एक बार हालात ये भी दिखने लगे थे कि मेयर भले बीजेपी का बने लेकिन बोर्ड में ज्यादा पार्षद निर्दलीय और कांग्रेस के होंगे। वह तो आखिर में बीजेपी ने बहुमत बना लिया।
मंत्री प्रकाश पन्त, सुबोध उनियाल के लिए चुनाव नतीजे इसलिए भी अच्छे रहे कि वे अपने इलाकों में पार्टी को बढिय़ा विजय दिलाने में कामयाब रहे, लेकिन मसूरी विधानसभा सीट पर बीजेपी को न अध्यक्ष और न ही पार्षद की किसी सीट पर विजय हासिल होना, स्थानीय विधायक गणेश जोशी के गिरते और डूबते ग्राफ को इंगित कर गया। इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए टिहरी सीट अब खतरे में अभी से दिखने लगी है। मसूरी सीट टिहरी लोकसभा सीट का हिस्सा है। कांग्रेस इस चुनाव में ताकत बन के तो नहीं उभरी लेकिन ये पता चल गया कि उसको लोगों ने फिर से स्वीकार करना शुरू कर दिया है। लोकसभा चुनाव में अब बीजेपी के लिए कांग्रेस की चुनौती से पार पाना पिछले चुनाव सरीखा कतई नहीं रहेगा। यही वजह है कि प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम ज्यादातर सीटें गंवाने के बावजूद न सिर्फ आत्म विश्वास से भरे दिख रहे बल्कि वे मजबूत भी हुए हैं। कांग्रेस अगर उम्मीदों से कम सीटें ही ला पाई तो इसके लिए पार्टी के भीतर के द्वंद्व को जिम्मेदार माना जा सकता है। प्रीतम ईशारों में लेकिन साफ़-साफ़ कह रहे हैं कि हरीश रावत अगर गंभीरता के साथ अधिक मेहनत करते तो पार्टी की सीटें कहीं अधिक होतीं। पूर्व मुख्यमंत्री रावत भले अब राष्टï्रीय महामंत्री हैं लेकिन उत्तराखंड की सियासत में वह बहुत असर रखते हैं और ये भी कहा जा रहा है कि रावत ने वैसी सक्रियता नहीं दिखाई, जिसकी जरूरत थी।उन्होंने एक किस्म से खानापूरी की। वह नहीं चाहते थे कि पार्टी चुनाव में बढिय़ा करे और प्रीतम मजबूत हो जाए। इस वक्त उत्तराखंड कांग्रेस नेतृत्व के विकल्पों के अभाव की मारी है। खुदा न खास्ता अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सरकार में आती है तो मुख्यमंत्री की लड़ाई में प्रीतम को करीबी चुनौती देने वाला दूर-दूर तक नहीं दिखता है। प्रीतम से अगर चुनाव नतीजे उम्मीदों के मुताबिक न होने पर पूछा जाए तो उनके जवाब में रावत को ले कर कसक झलकती भी है.बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष भट्ट अल्मोड़ा और चिनियानाला में शिकस्त के लिए खुद को दोषी ठहराए जाने पर नाराज होते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने किसी को को टिकट ही नहीं दिया तो फिर उनको जिम्मेदार क्यों माना जाए.टिकट देने के लिए 20 सदस्यों की टीम थी, जिसमें मुख्यमंत्री और मंत्री लोग भी थे.पार्टी के महामंत्री (संगठन) थे। समिति के पास हर सीट से तीन नामों की सूची आइ। उसमें से ही स्थानीय नेता की पसंद के मुताबिक नामों का चयन किया गया।

 

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