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जीरो टॉलरेंस पर आगे बड़ा अश्वमेघ रथ

  • चर्चित मृतुन्जय मिश्रा भी सीखचों के पीछे
  • रुतवा रखता था बीजेपी और संघ का करीबी पूर्व स्थानिक आयुक्त
  • लगातार हमलाबार रुख अपना रहे तरवेंद्र
  • अब सवाल यही है की बाकी सतिरो को कब दबोचेगी सरकार
  • लोकसभा चुनाव में सरकार का मुख्या हथियार हो सकता है भरस्टाचार विरोधी अभियान

Chetan Gurung @Weekandtimes

देहरादून। करीब10 साल पुरानी बात है। मृत्युंजय मिश्र उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय का रजिस्ट्रार और परीक्षा नियंत्रक हुआ करता था। प्रदेश के सभी तकनीकी, व्यावसायिक कॉलेज और पोलिटेक्निक उसके इशारे पर चला करते थे। कुलपति कोई भी हो सिक्का मिश्र का ही चलता था। ऐसा इसलिए कि वह न सिर्फ कांग्रेस के दिग्गजों बल्कि बाद में बीजेपी राज आने पर मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी के बहुत खासमखास और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के भी विश्वासपात्रों में हुआ करता था। कुलपति शायद प्रोफ़ेसर वीके तिवारी हुआ करते थे और वह महज नाम के थे। वह सरकार की हर बड़ी चौखट पर माथा टेक चुके थे, लेकिन मिश्र की तानाशाही बढ़ती गई। जब तकनीकी शिक्षा सचिव का जिम्मा राकेश शर्मा (बाद में मुख्य सचिव बने) ने संभाला तब उन्होंने मिश्र को विश्वविद्यालय से बाहर का रास्ता सफाई से दिखा दिया। इससे पहले उन्होंने उसकी सप्लाई लाइन काट दी थी यानि मुख्यमंत्री सचिवालय को पहले ही मिश्र से दूर रहने को कह दिया गया था। समझा दिया कि मिश्र के ऊपर हाथ रखना सरकार के लिए सिर दर्द हो सकता है। 

मिश्र बाद में मुख्यमंत्री बने डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के भी बहुत करीबी थे। निशंक जब मुख्यमंत्री बने तो पहला शोर मिश्र के मुख्यमंत्री का ओएसडी बनने का मचा, निशंक सतर्क हो गए और मिश्र नहीं घुस पाए। फिर हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने और फिर त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद सबसे ज्यादा ताकतवर फिर मिश्र ही नजर आने लगा था। त्रिवेंद्र सरकार में मिश्र को दिल्ली में अपर स्थानिक आयुक्त बना दिया गया, जिसमें आईएएस अफसर बैठा करते थे, ऐसे शख्स को जब विजिलेंस ने अचानक देहरादून के ईसी रोड पर कॉफ़ी पीते हुए घसीट के गिरफ्तार कर लिया तो हंगामा मचना लाजिमी था। कुछ लोग मिश्र को छोटी मछली कह रहे लेकिन हकीकत ये है कि वह सरकार के सिस्टम में मगरमच्छ था। उसको शिकंजे में कस के त्रिवेंद्र सरकार ने संकेत साफ़ कर दिया है कि जीरो टालरेंस की राह पर और भ्रष्टाचार की पीठ पर हंटर बरसाने के लिए शुरू किया गया उसका अश्वमेध यज्ञ का रथ अभी दौड़ता रहेगा। ये बात अलग है कि कई और मगरमच्छ अभी मौज कर रहे हैं। उम्मीद की जा सकती है कि त्रिवेंद्र का प्रहार जल्द ही उन पर भी होगा। मामूली कॉलेज प्रवक्ता से कैरियर शुरू करने वाले मिश्र ने कई विश्वविद्यालयों के रजिस्ट्रार और परीक्षा नियंत्रक के साथ ही पर स्थानिक आयुक्त तक की जिम्मेदार संभाली और इसके पीछे सिर्फ उसका वह हुनर कारगर साबित हुआ, जिसमें आईएएस अफसर तक उसके साथ बैठते ही नहीं थे, बल्कि पत्रकार तक सेट थे और आगे-पीछे घूमा करते थे। जब उसको गिरफ्तार किया गया तो तब भी एक अखबार का रिपोर्टर उसके संघ कॉफ़ी की चुस्कियां ले रहा था। मिश्र पर त्रिवेंद्र सरकार की नजरें पहले से थी। वह अनेक किस्म की खरीद और घोटालों के आरोपों में विजिलेंस के हत्थे चढ़ा। सबसे आखिरी विवाद उसका आयुर्वेद विवि में कुल सचिव बनने के दौरान का है। उसने विवि पहुंचते ही पहले से काम कर रहे प्रभारी कुल सचिव राजेश कुमार को चलता करने के आदेश जारी कर दिए थे। कुलपति की मंजूरी के बिना ही खुद चार्ज भी ले लिया था। विवाद इतना बढ़ा कि एक दिन बाद ही उसको शासन में सम्बद्ध कर दिया गया। उसके खिलाफ कई मामले थे। डोईवाला थाने में उसके खिलाफ धोखाधड़ी का मामला भी दर्ज था। इस मामले में पुलिस ने चार्जशीट तैयार कर ली है। उस पर आरोप है कि हर्रावाला में अस्पताल के लिए सामान खरीदा लेकिन भुगतान नहीं किया,जो करीब 60 लाख का था। जिस स्टिंग ऑपरेशन में समाचार प्लस चैनल के सीईओ उमेश शर्मा को गिरफ्तार किया गया, उसमें भी मिश्र का नाम उछला हुआ है।
मिश्र पर तकनीकी विवि में रहने के दौरान सरकारी नौकरियों के लिए आयोजित होने वाली परीक्षाओं के प्रश्नपात्र लीक कराने, खरीद में घोटाला करने के तमाम आरोप थे। कार में खुद को जिन्दा जलाने के प्रयास का फर्जी मुकदमा भी उसने चार साल पहले दर्ज कराया था। इस मामले में वह झूठा साबित हुआ था लेकिन सरकार में पकड़ के चलते बच निकला था। मिश्र अगर पुलिस की गिरफ्त में आया तो सिर्फ इसलिए कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर त्रिवेंद्र हैं और वह इन दिनों भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाए हुए हैं। बड़ी बात ये है कि उन्होंने अभियान के तहत न सिर्फ आईएएस और पीसीएस अफसरों पर कार्रवाई की बल्कि उमेश सरीखे उस चैनल संचालक पर भी हाथ डालने का हौसला दिखाया, जिसके करीबी संपर्क बीजेपी में भी शीर्ष स्तर पर हैं.ये बात अलग है कि त्रिवेंद्र की लाख कोशिशों के बावजूद उमेश जमानत पर जेल से बाहर आ चुका है। सियासी गलियारे में ये चर्चा आम है कि त्रिवेंद्र को उमेश मामले में हाई कमान और केंद्र सरकार से वाजिब मदद नहीं मिली। त्रिवेंद्र की मजबूरी यहाँ झलकती है कि वह उमेश को केंद्र सरकार से मिली सुरक्षा तक नहीं हटवा पाए। अब मृत्युंजय को भी त्रिवेंद्र ने जिस तरह झटका दिया है, वह एक किस्म से पार्टी और संघ को भी ईशारा है कि वह सरकार को चलाने और उसको साफ़ छवि देने के लिए कुछ भी कदम उठाने से नहीं हिचकेंगे। इससे पहले यौन उत्पीडऩ मामले में बीजेपी के प्रदेश महामंत्री संगठन संजय कुमार की विदाई के पीछे भी त्रिवेंद्र की भूमिका को ही देखा गया।
त्रिवेंद्र का ये अश्वमेध रथ कब तक और किस दिशा में चलेगा, इस पर अभी भी चर्चा खूब है। कुछ लोग इस पर अंगुली इस लिए भी उठा रहे हैं कि रसूख वाले कई लोग आज भी तमाम जालसाजियों, आरोपों और घोटालों के बावजूद सींखचों के बाहर ऐश कर रहे हैं, शराब महकमे में एक से एक घोटालेबाज अफसर बैठे हैं। उनके खिलाफ सरकार घुटने के बल बैठ के अपनी बेइज्जती करा रही। राजधानी के पांच प्रोफेशनल कॉलेजों ने राज्य सरकार की आंख में धूल झोंक के केन्द्रीय विवि (गढ़वाल विवि) से सम्बद्धता गलत ढंग से ले ली। अब इस मामले की जांच सीबीआई कर रही लेकिन राज्य सरकार है कि उन कॉलेजों को तमाम तरह की छूट दिए हुए हैं। बजाए उनके खिलाफ कार्रवाई करने के.सिडकुल में अरबों के घोटालों के मास्टर माइंड बचे हुए हैं।।ऋ षिकेश गोलीकांड में आईएफएस अफसर का नाम आया, लेकिन वह अफसर सरकार का लाडला बना हुआ है। त्रिवेंद्र सरकार जब तक इन मामलों में सख्त कार्रवाई नहीं करेगी, लोग उस पर अंगुली उठाते रहेंगे। जब-जब भी सरकार किसी अन्य के खिलाफ कठोर कार्रवाई करेगी।

 

 

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