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बज गई खतरे की घंटी

  • सपा बसपा भी हाथ के साथ , राहुल गाँधी का बड़ा कद 2019 की तैयारी शुरू
  • भाजपा ने हार पर किया मंथन , लोकसभा चुनाव की रडनीति बनाने में जुटी
  • हिन्दी पट्टी के तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत से महागठबंधन के आसार बड़े

Sanjay Sharma @ WeeknadTimes

लखनऊ। पांच राज्यों के चुनाव नतीजों ने पूरे देश के सियासी माहौल को अचानक बदल दिया। छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस को मिली सफलता ने न केवल राहुल गांधी के कद को रातोंरात बढ़ा दिया बल्कि उन दलों को भी साथ आने पर मजबूर कर दिया, जो अभी तक कांग्रेस से पर्याप्त दूरी बनाए हुए थे। मध्य प्रदेश में सपा और बसपा ने भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। वहीं अन्य क्षेत्रीय दल भी कांग्रेस के साथ आने को उतावले हो रहे हैं। बदले राजनीति माहौल से एक बार फिर महागठबंधन के आसार दिखने लगे हैं। वहीं, इन चुनावों में मिली हार ने भाजपा को निस्तेज कर दिया है। वह हार पर मंथन कर रही है। भाजपा के दिग्गज आगामी लोकसभा चुनाव में संभावित महागठबंधन से दो-दो हाथ करने के लिए रणनीति बनाने और उसे जमीन पर उतारने में जुट गए हैं। इन चुनाव नतीजों से एक बात साफ है कि लोकसभा चुनावों में मोदी और शाह की जोड़ी को एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी का सामना करना पड़ेगा। हालांकि पीएम उम्मीदवार को लेकर महागठबंधन का पेंच फंस सकता है क्योंकि अभी भी कांग्रेस के सहयोगी दल राहुल गांधी को अपना साझा उम्मीदवार स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में महागठबंधन साकार होता है या नहीं।

…विधानसभा चुनाव नतीजों ने बहुत कुछ बदल दिया है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बन गई है। तेलंगाना की सत्ता एक बार फिर टीआरएस के पास है। पूर्वी राज्य मिजोरम में एमएनएफ की सरकार बन चुकी है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ये आखिरी राज्य थे, जहां विधानसभा के चुनाव हुए। मिजोरम में एमएनएफ की सरकार बन चुकी है। यहां कांग्रेस की सरकार थी। मिजोरम से आउट होने के साथ ही कांग्रेस का पूर्वोत्तर से पूरी तरह सफाया हो गया है। भाजपा के लिए यहां खोने के लिये कुछ नहीं था। तेलंगाना में भी भाजपा-कांग्रेस के लिये ज्यादा कुछ नहीं था। कांग्रेस ने टीडीपी के साथ मिलकर यहां जोर लगाया, लेकिन जनता ने उसे खारिज कर दिया। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला हुआ। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लंबे वक्त के बाद जनता ने कांग्रेस को जश्न मनाने का मौका दिया है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को बड़ी जीत मिली। मध्य प्रदेश और राजस्थान में राज्य सरकारों के खिलाफ एंटी इंकम्बेंसी होने के बावजूद कांग्रेस को बड़ी जीत नसीब नहीं हुई। मध्य प्रदेश में तो कांग्रेस अपने दम पर बहुमत तक नहीं हासिल कर पायी। राजस्थान में पिछले 25 सालों की परिपाटी इस बार भी दिखी। जहां जनता हर पांच साल में सत्ता बदल देती है। यहां वसुंधरा राजे के प्रति लोगों की नाराजगी के बावजूद कांग्रेस बड़ी जीत हासिल नहीं कर पायी। कांग्रेस वैसी जीत नहीं हासिल कर पाई जैसी गहलोत सरकार के खिलाफ भाजपा को मिली थी। जनता ने 200 में से 163 सीट भाजपा की झोली में डाल दी थीं। बावजूद इसके तीन राज्यों में मिली सफलता ने कांग्रेस को संजीवनी दे दी है। साथ ही इसने क्षेत्रीय दलों को भी हिला दिया है। उत्तर प्रदेश की सपा और बसपा ने कांग्रेस से दूरी बना ली थी। बसपा प्रमुख मायावती ने यहां तक ऐलान कर दिया था कि वे कांग्रेस के साथ किसी प्रकार का गठबंधन नहीं करेगी। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस को लेकर चुप्पी साध ली थी। इससे लगने लगा था कि लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस को शामिल नहीं करेंगे लेकिन इस जीत ने दोनों दलों को अपनी रणनीति बदलने पर विवश कर दिया। आखिरकार दोनों ही दलों ने मध्य प्रदेश में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को बिना शर्त समर्थन का ऐलान किया। इसने राहुल गांधी के कद को बढ़ा दिया। कांग्रेस के दिग्गज नेताओं का आत्मविश्वास भी वापस आ गया है। विपक्ष भी अब महागठबंधन की आशा कर रहा है। बावजूद इसके गठबंधन इतना असान नहीं है क्योंकि पीएम पद पर पेंच फंसने की पूरी उम्मीद है। कांग्रेस चाहेगी कि महागठबंधन बने तो उसमें राहुल गांधी पीएम पद का चेहरा बनें। ऐसे में सवाल यह है कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी, बसपा प्रमुख मायावती जैसी वरिष्ठï नेता इसे स्वीकार करेंगी। ममता और मायावती पहले भी राहुल को पीएम उम्मीदवार के रूप में खारिज कर चुकी हैं। वहीं उत्तर प्रदेश में कांग्रेस गठबंधन अपनी शर्तों पर करेगी। वह सपा-बसपा से कम से कम 25 लोकसभा सीटें मांग सकती है। ऐसा नहीं होने पर वह उत्तर प्रदेश में अकेले दम पर चुनाव लड़ सकती है। हालांकि पिछले दिनों महागठबंधन को लेकर दिल्ली में 21 दलों की बैठक हुई है और इसमें भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों की एकजुटता पर जोर दिया गया था। यदि कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल एक साथ मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी। हालांकि अभी महागठबंधन को लेकर कोई स्थिति स्पष्टï नहीं हुई है। सभी दलों को साथ लेकर चलना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती होगी। वहीं भाजपा अभी से विपक्षी दलों की एकता से दो-दो हाथ करने की तैयारी में जुट गई है। वह अपने सहयोगी दलों के साथ लगातार वार्ता कर रही है। वह टीआरएस और अन्य दलों का साथ पाने की कोशिश भी करेगी। कुल मिलाकर भाजपा के लिए आगामी लोकसभा चुनाव किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। जरा सी चूक उस पर भारी पड़ेगी।

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