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यूपी में आसान नहीं कांग्रेस के लिए गढ़बंधन की राह

  • तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव जितने के बाद कांग्रेस नेताओ के हौसले बुलंद
  • लोकसभा चुनाव को लेकर प्रदेश में कांग्रेस नेताओ की नहीं दिख रही कोई रणनीति
  • सपा बसपा से सीटों को लेकर फसेगा पेंच कमजोर जनाधार पर आसान नहीं सौदेबाजी
  • पिछले दो साल में कोई मजबूत आंदोलन नहीं चला सकी पार्टी गुट बजी जारी

Sanjay sharma @ WeekandTimes

लखनऊ। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों ने कांग्रेस को संजीवनी देने का काम किया है। हिंदी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विजय पताका फहराने के बाद कांग्रेस नेताओं के हौसले बुलंद हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा का रथ रोकने के लिए महागठबंधन की दीवार बनाने की तैयारी में जुटे हैं। छोटे राज्यों के कई क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस की इस पहल का स्वागत किया है और वे गठबंधन में शामिल भी हो रहे हैं। बावजूद इसके दिल्ली के तख्त तक पहुंचाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हालत पतली है। यहां वह कोमा में है। पार्टी में गुटबाजी चल रही है और लोक सभा चुनाव को लेकर प्रदेश कांग्रेस ने यहां अभी तक अपनी कोई रणनीति तैयार नहीं की है। ऐसे में यहां की दो बड़ी पार्टियां सपा और बसपा बराबरी के आधार पर कांग्रेस को गठबंधन में शामिल करने के मूड में कतई नहीं दिखाई पड़ रही हैं। वहीं जीत से उत्साहित कांग्रेस सपा-बसपा के साथ गठबंधन करके कम से कम 25 सीटों पर अपना दावा पेश करना चाहती है। कांग्रेस के कमजोर जनाधार को देखते हुए सपा-बसपा गठबंधन इतनी सीटें उसे देने को तैयार नहीं है। सियासी गलियारों में जैसी खिचड़ी पक रही है वह कांग्रेस के पक्ष में जाती नहीं दिख रही है। सपा-बसपा कांग्रेस से किनारा करने के मूड में दिख रही है। ऐसे में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के गठबंधन की राह फिलहाल आसान नहीं दिख रही है।

…लोकसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो गई हैं। भाजपा और कांग्रेस की नजर उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों पर टिकी हैं। वहीं उत्तर प्रदेश के दो बड़े सियासी दल सपा और बसपा भी बराबरी की टक्कर देने की तैयारी कर रहे हैं। सपा और बसपा गठबंधन यहां भाजपा को पटखनी देने को रणनीति बनाने में जुटी है। कांग्रेस भी इस गठबंधन में शामिल होना चाहती है ताकि भाजपा को दिल्ली के तख्त पर दोबारा आसीन होने से रोका जा सके लेकिन यूपी में कमजोर कांग्रेस को गठबंधन ज्यादा तवज्जो देने के मूड में नहीं दिख रहा है। हालांकि मध्य प्रदेश और राजस्थान में सपा-बसपा ने कांग्रेस को समर्थन दिया है। वहीं, तीन राज्यों में सरकार बनाने के बाद कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में अपना दावा मजबूती से रखना चाह रही है। गौरतलब है कि पांच राज्यों के चुनाव से पहले भी अखिलेश और मायावती कांग्रेस को ज्यादा तवज्जो देने के पक्ष में नहीं थे मगर जिस तरह तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी उसके बाद कांग्रेस नेताओं के अरमान परवान चढऩे लगे और वे यूपी में 25 सीटों से ज्यादा सीटें मांगने लगे। सपा और बसपा को समझ आने लगा कि अगर इतनी सीटें कांग्रेस को दे दी जाएंगी तो भविष्य में लोकसभा चुनावों में उनकी हैसियत कम होगी और विपक्ष के सरकार बनाने की स्थिति में वह ज्यादा मोलभाव भी नहीं कर पाएंगे। इसी के बाद रणनीति बनी कि कांग्रेस को अलग करके लोकदल को गठबंधन में शामिल किया जाए और तीन से चार सीटें दे दी जाएं। हाल ही में गठबंधन की जो पहली तस्वीर उभर रही है उसमें सपा और बसपा लगभग बराबर सीटों पर चुनाव लडऩे के लिए राजी होते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस की मजबूरी यह है कि अगर वह इस गठबंधन से बाहर रहती है तो उसकी स्थिति बहुत खराब होने वाली है मगर अखिलेश और मायावती कांग्रेस को ज्यादा भाव देने के पक्ष में नहीं है। कांग्रेस का दुर्भाग्य भी है कि विधानसभा चुनाव के बाद से अब तक कांग्रेस ने यूपी में लोकसभा चुनावों के मद्देनजर कोई खास मेहनत नहीं की है। उनके प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं से मिलने की जगह नेताओं की आपसी गुटबाजी दूर करने में ही उलझे रहे। कांग्रेस के किसी भी बड़े नेता ने लोगों के बीच जाकर जनसंपर्क करने का प्रयास नहीं किया। कोई भी बड़ा आंदोलन कांग्रेस इन दो सालों में नहीं कर पाई, जिससे जनता के बीच उसकी पहचान बन सके। इसके अलावा कांग्रेस यह बात भी अच्छी तरह जानती है कि अगर उसने यूपी की सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़ा करने का फैसला लिया तो अधिकांश जगहों पर उसके प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो जाएगी। पिछले दिनों यूपी के तीन लोकसभा उपचुनावों में कांग्रेस अपनी यह हालत देख भी चुकी है। इसलिए कांग्रेस के नेता पसीने-पसीने हैं और वह समझ नहीं पा रहे की चुनाव से ठीक पहले सिर पर आ गई इस मुसीबत से वह कैसे निपटें। इस मामले में सपा के एमएलसी सुनील सिंह साजन का कहना है कि पार्टी के राष्टï्रीय अध्यक्ष ऐसे फार्मूले पर काम कर रहे हैं, जिससे देश के प्रधानमंत्री को बदला जाए। देश से भाजपा सरकार को हटाया जाए क्योंकि इस सरकार ने गरीबों को छलने का काम किया है। फिलहाल गठबंधन का स्वरूप कैसा होगा यह पार्टी अध्यक्ष ही बता सकेंगे। वहीं कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत का कहना है कि लोकसभा चुनाव दो विचारधाराओं पर लड़ा जाएगा। एक गांधी लोहिया और आंबेडकर और दूसरी गोलवरकर व गोडसे की। हम शुरुआत से ही गठबंधन के हिस्सा थे और हैं। भाजपा को हम सब मिलकर हराएंगे और यह गठबंधन कब और कैसे होगा इसका फैसला पार्टी आलाकमान करेंगे। जाहिर है यदि कांग्रेस ने अडिय़ल रवैया अपनाया तो यूपी में सपा-बसपा के साथ उसका गठबंधन लगभग नामुमकिन हो जाएगा। यह कांग्रेस के लिए घाटे का सौदा साबित होगा।

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