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मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान से लेंगे त्रिवेंद्र सबक !

  • मोदी साहा के कमजोर पडने से कार्य शैली पर पड़ेगा असर
  • असन्तुष्टो को मना सकते है , मंत्री की खली कुर्शी दायित्वों पर होगा फैसला
  • धामी, यतीश्वरानन्द , चौहान मंत्री बनने के मजबूत दावेदार

Chetan Gurung @ WeekandTimes

देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत किसी के दबाव में नहीं आते हैं। कोई उनसे जबरन कोई काम या फैसला नहीं करा सकता है। ये उनकी खासियत है। ऐसा आज से नहीं है, जब वह खंडूड़ी मंत्रिमंडल में थे तो भी अंदाज ऐसा ही था। वह अकेले मंत्री थे जो कडक़ खंडूड़ी से खुलकर बोल लेते थे और मुख्यमंत्री भी उनकी बातों का ख्याल-सम्मान करते थे। जब वह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने तो ये माना गया था कि जल्द ही वह मंत्रिपरिषद की सीटें भर देंगे और फिर आराम से कुर्सी संभालेंगे। त्रिवेंद्र ने सभी को धता बता दिया और मंत्रिपरिषद की दो सीटों को खाली छोड़ दिया। इन कुर्सियों पर बैठने के लिए लालायित विधायक और वरिष्ठ नेता लोभ के चलते कभी भी त्रिवेंद्र के खिलाफ खुलकरनहीं बोल पाए हैं। 20 महीने की सरकार में त्रिवेंद्र ने निष्कंटक राज किया है, लेकिन लगता है कि उनको अब वक्त और माहौल के साथ चलना होगा। खास तौर पर ये देखते हुए कि देश में बीजेपी की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे आ रहा है। एक के बाद एक हिंदी बोले जाने वाले राज्यों से वह बाहर होती जा रही है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान से जिस तरह बीजेपी बाहर हुई है, उसके चलते बीजेपी हाई कमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की हैसियत कम हो सकती है। ऐसा वाकई हुआ तो यकीन करिए कि त्रिवेंद्र को भी जल्दी ही दिक्कत आएगी। ऐसे में उनको जल्दी ही पार्टी में असंतोष को दूर करना होगा। तभी वह पूरे पांच साल आराम से राज कर पाएंगे। त्रिवेंद्र के खिलाफ हालांकि शुरुआत से ही कोई नहीं बोल पाया है। अभी भी किसी की हिम्मत उनके खिलाफ बोलने की नहीं हुई है। बीजेपी के पास बहुमत सदन में इतना है कि विधायक और मंत्री जानते हैं कि उनकी कोई सुनवाई कम से कम दबाव बनाकर तो नहीं हो सकती है। जो दो लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह संगठन और देश को चला रहे हैं, त्रिवेंद्र न उनके चहेते हैं, बल्कि उनकी प्रतिष्ठा भी त्रिवेंद्र से ताल्लुक रखती है। त्रिवेंद्र को मजबूत और पूरे पांच साल बनाए रखना उनकी निजी प्रतिष्ठा से जुड़ा मसला भी है।

…….त्रिवेंद्र की नाकामी उनकी भी नाकामी समझी जाएगी। लिहाजा चुनाव नतीजों से पहले तो इस बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था कि त्रिवेंद्र पर किसी किस्म का दबाव ऊपर का होगा। तीन हिंदी राज्यों के साथ ही तेलंगाना और मिजोरम की हार से समझा जा रहा है कि मोदी-शाह की जोड़ी उतनी मजबूत नहीं रह गई है, जितनी थी। इसका असर त्रिवेंद्र की हैसियत पर भी पडऩा स्वाभाविक है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जिस तरह बीजेपी हारी है, उससे अब पार्टी और सरकार में उनके खिलाफ आवाजें उठने लगी हैं। भले अन्दर ही अन्दर ऐसा हो रहा है लेकिन इससे खतरे की घंटी तो बज ही गई है। जिस तरह बीजेपी ने डोईवाला नगर पालिका अध्यक्ष की कुर्सी और हरिद्वार के मेयर की कुर्सी गंवाई, उसके पीछे सिर्फ और सिर्फ गुटबाजी ही जिम्मेदार थी।
डोईवाला त्रिवेंद्र का मूल घर है। आज आलम यह है कि त्रिवेंद्र कई तरह की चहारदीवारियों से घिरे हुए हैं। ब्राह्मण लॉबी तो शुरू से ही विरोधी रही है। कुछ मंत्री भी इसमें शामिल हैं। ठाकुर लॉबी में भी त्रिवेंद्र का असर कम हुआ है। हकीकत ये है कि ठाकुरों के असली नेता समझे जाने वाले बीजेपी सांसद भगत सिंह कोश्यारी भी उनसे खुश नहीं हैं। कोश्यारी ने ही उनको सियासत में आगे बढ़ाया। जब त्रिवेंद्र मुख्यमंत्री बन गए तो उन्होंने कोश्यारी को भी दरकिनार करना शुरू कर दिया। आज कोश्यारी भी त्रिवेंद्र के विरोधी समझे जा रहे हैं, सतपाल महाराज, जो कि मंत्री हैं, मंत्री हरक सिंह रावत और विधायक पुष्कर सिंह धामी को भी उन लोगों में शुमार किया जा रहा है, जो उनके साथ दिल से खड़े नहीं हैं। इस तरह मुख्यमंत्री के लिए सरकार के मुखिया की कुर्सी काँटों भरा ताज साबित हो सकता है। ये बात अलग है कि त्रिवेंद्र से जब भी पूछा जाता है तो इस बारे में वह हमेशा बहुत पॉजिटिव अंदाज में जवाब देते हैं कि वह मंत्रियों की सभी कुर्सियों को जल्द ही भर देंगे। इस बारे में मंथन चल रहा है कि किसको क्या जिम्मेदारी दी जाए। उन्होंने कभी ये नहीं कहा कि वह खाली कुर्सी नहीं भरना चाहते हैं। इसके उलट बीजेपी के एक नेता के मुताबिक त्रिवेंद्र मंत्री की खाली कुर्सी भरने और दायित्व देने के बारे में बहुत ज्यादा इच्छुक नहीं हैं। इसके पीछे दो वजह समझी जा रही है। एक तो इससे ज्यादातर विधायकों को इस भ्रम में रखा जा सकता है कि वे खामोश बैठें। मुख्यमंत्री के खिलाफ कुछ न बोले और न ही कोई अप्रिय काम करे। उनका नंबर मंत्री बनने का आ सकता है। बोलेंगे तो पत्ता कट जाएगा। दूसरा शायद वह ये संकेत और सन्देश देना चाहते हैं कि वह मितव्ययता पर यकीन करते हैं और यथा मुमकिन कम से कम मंत्री बनाना चाहते हैं।
यही वजह है कि इतने समय बाद भी ये कुर्सियां खाली पड़ी हुई हैं। आगे भी ऐसा ही चलता रहता लेकिन माना जा रहा है कि त्रिवेंद्र के लिए अब मंत्री की कुर्सी खाली रखना मुमकिन नहीं हो पाएगा। जिस तरह उनके खिलाफ पार्टी-संघ में मुहिम चल रही है, उसको देखते हुए भी अब सभी को साथ ले के चलना उनके लिए बाध्यता हो गई है। अडिय़ल रुख अपनाना उनके लिए आसान नहीं रह गया है। पार्टी में लोग इसलिए भी नाखुश हैं कि उन्होंने 20 महीने की सरकार होने के बावजूद पार्टी के वफादारों को अभी तक दायित्व नहीं सौंपे हैं। पार्टी के लोगों का कहना है कि अगर अपनी सरकार में भी वे सरकारी दायित्वों को हासिल नहीं कर पाएंगे तो फिर सियासत में रहने और बीजेपी की सेवा करने का कोई औचित्य नहीं है। सूत्रों का कहना है कि त्रिवेंद्र दोनों काम अब करने वाले हैं। मंत्री बनाना और दायित्व सौंपना, ये भी मुमकिन है कि एकाध मंत्रियों की टीम से छुट्टी कर दी जाए या फिर उनके महकमे बदले जाए.ख़ास तौर पर ये देखते हुए कि कुछ मंत्रियों का काम बहुत बुरा चल रहा है और सिर्फ पार्टी और सरकार अपयश की भागी बन रही है.ऐसे में न सिर्फ उनकी कुर्सी खाली कर नए चेहरों को मौका दिया जा सकता है बल्कि खाली दो कुर्सियों पर भी नियुक्ति हो सकती हैं।
इन नामों के लिए खटीमा विधायक पुष्कर सिंह धामी इसलिए भी मजबूत दावेदार हैं, कि संगठन नेतृत्व युवा चेहरों को मौका दे रहा है। उत्तर प्रदेश और महाराष्टï्र के साथ ही असम इसकी बड़ी मिसाल है। साथ ही धामी को भविष्य का नेता समझा जाता है। संघ और पार्टी के साथ ही केन्द्रीय नेतृत्व में भी मजबूत पकड़ रखते हैं। फिर वह ठाकुर लॉबी से हैं। देहरादून के मुन्ना सिंह चौहान, हरिद्वार के स्वामी यतीश्वरानंद भी मंत्री बनने के मजबूत दावेदारों में शुमार हैं। नए चेहरों को मानती बना के और संगठन के लोगों को सरकार में दायित्व दे के त्रिवेंद्र असंतुष्टों को मनाने की कोशिश कर सकते हैं। उनके दिल्ली दौरों को अब इसी नजरिये से देखा जाने लगा है।

 

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