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शिकस्तों के बाद माने त्रिवेंद्र

  • जिद छोड़ सरकारी दायित्व बांटने को हुए मजबूर
  • मंत्रियों की खाली कुर्सियों पर घमासान
  • जातीय-क्षेत्रीय समीकरणों में तालमेल असली चुनौती
  • मंत्रियों की कुर्सी भर जाने से लोकसभा चुनाव में और दिक्कत भी हो सकती है

चेतन गुरुंग @WeeknadTimes

देहरादून। दबाव में न आने की प्रतिष्ठा बना चुके मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को भी आखिर पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों की तरह वही करना पड़ा, जिसके लिए सरकारें-पार्टियां-मुख्यमंत्री अपयश ढोते रहे। 20 महीने तक खर्च कम करने के अपने संकल्प पर टिके रहने और पार्टी के नेताओं को बे-इन्तहां इन्तजार कराने के बाद उन्होंने सरकारी महकमों की राजनीतिक कुर्सियां पार्टी नेताओं को सौंप दी। इतना ही नहीं अभी कई दायित्व और बांटे जाने तय हैं और मंत्री परिषद की खाली दो कुर्सियों के लिए भी चेहरे जल्द तय होंगे, ऐसा समझा जा रहा है। इसमें शक नहीं कि सरकारी दायित्व बांटने का दौर ख़ास तौर पर कांग्रेस की एनडी सरकार ने शुरू किया था। इसको बाद की सभी सरकारों ने अपने करीबियों को रेवड़ी बांटने और पार्टी में असंतोष को शांत करने के लिए इस्तेमाल किया। इसके पीछे एक वजह ये भी रही कि त्रिवेंद्र को छोड़ एक भी मुख्यमंत्री ऐसे नहीं रहे, जो दबाव में न रहे हों। एनडी हों या फिर बीसी खंडूड़ी,रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा,हरीश रावत की सरकारें, सभी अल्पमत की थी। उनको न सिर्फ बाहरी विधायकों की बैसाखी की जरुरत पड़ी थीं, बल्कि पार्टी के भीतर भी उनको वह समर्थन और शक्ति नहीं मिली थी, जो त्रिवेंद्र के पास है। वे सभी सरकार बचाने की जुगत में रहते थे और कैसे अपनी कुर्सी को सुरक्षित रख सके, इसी उधेड़बुन में ज्यादा रहते थे। त्रिवेंद्र तकदीर वाले हैं कि उनके पास न सिर्फ आला कमान का जबरदस्त समर्थन है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के वह ख़ास विश्वासपात्र हैं। ऐसे में उनको छेडऩे या हिलाने का हौसला कोई नहीं कर सकता है। यहाँ तक कि राष्टï्रीय स्वयं सेवक संघ के अफसर भी उनके आगे पानी भर रहे। ऐसा पहली बार है कि संघ के लोग अपनी सरकार से नाखुश-नाराज दिखते हैं लेकिन त्रिवेंद्र का बाल भी बांका कर पाने की हैसियत नहीं है। त्रिवेंद्र को दिक्कत उसी सूरत में आ सकती है जबकि मोदी-शाह कमजोर पड़े। वैसे जिस तरह स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे आए और खुद त्रिवेंद्र के गढ़ डोईवाला नगर पालिका सीट बीजेपी ने गँवा दी उससे त्रिवेंद्र के नेतृत्व पर अंगुली उठने लगी है। हरिद्वार और कोटद्वार की मेयर सीट हो या फिर अल्मोड़ा नगर पालिका अध्यक्ष की सीट पर हार, पार्टी में अंदरखाने घमासान बढ़ा है।

अल्मोड़ा की हार इसलिए भी अहम है कि प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट वहीं से हैं। हरिद्वार में हार इसलिए अहम है कि मंत्री और सरकार के प्रवक्ता मदन कौशिक के जिम्मे उस सीट को जितवाना था। कोटद्वार की शिकस्त को मंत्री हरक सिंह रावत की निजी शिकस्त के तौर पर देखा जा रहा था। हरक ने अचानक ही ये बोल के खलबली मचा डाली कि कोटद्वार का टिकट उनसे पूछ के नहीं दिया गया। उनकी मर्जी से टिकट दिया गया होता तो नतीजा जीत होती न कि हार। हरक लगातार सनसनी पैदा करने वालों में हैं, चाहे पार्टी और सरकार कोई भी हो। उनकी बोल को त्रिवेंद्र के खिलाफ नाराजगी के तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने ये बोल के सनसनी मचा दी थी कि वह एनडी सरकार को गिराने वाले थे। इसको त्रिवेंद्र को चेतावनी के तौर पर भी लिया जा रहा है,त्रिवेंद्र के काम करने की शैली से पार्टी और सरकार में कई लोग नाखुश हैं, और न्यूज़ चैनल के स्टिंग ऑपरेशन के हल्ले ने मुख्यमंत्री पर दबाव बढ़ा डाला। इसी बीच पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी के सफाए ने आलाकमान के आत्मविश्वास को डांवाडोल कर दिया है। साथ ही मोदी-शाह की जोड़ी कमजोर पड़ी है, ऐसा सोचना है। इस बदली सियासी फिजां ने ही त्रिवेंद्र को मजबूर कर दिया कि वह पार्टी के लोगों को खुश रखे। इसमें उन्होंने देर नहीं की। दायित्वों का बंटवारा कर उन्होंने इसकी शुरुआत कर दी। लोकसभा चुनाव से पहले ऐसे कई दायित्व और बंटने तय हैं। हालांकि अभी उनको किस किस्म का दर्जा दिया जाएगा और क्या वाकई काम करने का मौका मिलेगा, ये तय नहीं हुआ है। दायित्वों के बाद मंत्री परिषद में खाली दो सीटों को भरने पर भी अंदरखाने काम चल रहा है, ऐसा सूत्र बता रहे हैं। त्रिवेंद्र की दिक्कत ये है कि खाली कुर्सियों के भरे जाने के बाद लोकसभा चुनाव में कहीं उनको और बड़े असंतोष का सामना करना न पड़े। अभी तक कई मजबूत विधायक महज इसलिए खामोश हैं कि उनको लगता है वे मंत्री बनाए जा सकते

हैं। मुख्यमंत्री को नाराज कर के वे अपनी सम्भावना कम नहीं करना चाहते हैं। जब कुर्सी भर जाएंगीं तब उनको खामोश रख पाना त्रिवेंद्र और पार्टी नेतृत्व के लिए आसान नहीं होगा। इसी को देखते हुए त्रिवेंद्र ने कुर्सी खाली रखने का दांव खेला हुआ है लेकिन लोकसभा चुनाव आ जाने और विधानसभा चुनावों में पार्टी की दुर्दशा के बाद उनके लिए मंत्रियों की कुर्सियां खाली रखना आसान नहीं रह गया है। त्रिवेंद्र की परेशानी ये है कि वह जातीय और क्षेत्रीय समीकरण देखें या फिर अपने-पराए। एक को संतुलित करते हैं तो दूसरा गणित गड़बड़ हो जाने की आशंका है। देहरादून से अगर वह मुन्ना सिंह चौहान, हरबंस कपूर या फिर गणेश जोशी को मंत्री बनाते हैं तो ये पहलू सामने आ सकता है कि मुख्यमंत्री और स्पीकर भी देहरादून से ही हैं। पौड़ी से चार मंत्री वाला गणित पहले से है, उधमसिंह नगर से पुष्कर सिंह धामी मजबूत नाम है.मंत्री बनने के लिए युवा ठाकुर नेता धामी को संघ का भी समर्थन हासिल है तो वह ब्राह्मण लॉबी में भी स्वीकार्य हैं। दिक्कत ये है कि वहां अरविन्द पाण्डेय के मंत्री रहते शायद धामी को मौका न मिले। ये भी सत्य है कि धामी को नाखुश या नाराज रखने के स्थिति अब नहीं रह गई है। वह स्थानीय स्तर पर जबरदस्त क्षत्रप समझे जाते हैं। हरिद्वार से भी कोई नाम सामने आ सकता है। स्वामी यतीश्वरानन्द को धाकड़ और दमदार युवा नेता समझा जाता है। हिन्दू कार्ड खेलने की सूरत में उनकी अनदेखी त्रिवेंद्र और पार्टी नेतृत्व के लिए आसान नहीं होगी। ये बात अलग है कि मदन कौशिक शायद ही चाहेंगे कि उनके शहर में एक और शक्ति केंद्र तैयार हों। बहरहाल आने वाले दिन बड़े दिलचस्प और सियासी समीकरणों-उठापटक के लिहाज से अहम साबित होंगे।

जिनको सरकार में दायित्व दिए गए

  • मोहन प्रसाद थपलियाल,
  • बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति अध्यक्ष
  • केदार जोशी,
  • अध्यक्ष कुमाऊं मंडल विकास निगम
  • नरेश बंसल, उपाध्यक्ष राज्यस्तरीय 20 सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति
  • गजराज बिष्ट अध्यक्ष,
  • उत्तराखंड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड
  • ज्ञान सिंह नेगी उपाध्यक्ष,
  • राज्य ग्रामीण स्वास्थ्य सलाहकार परिषद
  • शमशेर सिंह सत्याल
  • अध्यक्ष श्रम संविदा सलाहकार बोर्ड
  • डॉ. विनोद आर्या उपाध्यक्ष
  • पशु कल्याण बोर्ड
  • विजय बड़थ्वाल अध्यक्ष
  • उत्तराखंड राज्य महिला आयोग
  • महावीर सिंह, रामगढ़ अध्यक्ष
  • गढ़वाल मंडल विकास निगम
  • डॉ. आर के जैन अध्यक्ष,
  • अल्पसंख्यक आयोग
  • शमीम आलम, अध्यक्ष
  • उत्तराखंड राज्य हज समिति
  • दीप्ति रावत, उपाध्यक्ष
  • उच्च शिक्षा उन्नयन समिति
  • घनानंद उपाध्यक्ष
  • उत्तराखंड संस्कृति साहित्य एवं कला परिषद

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