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पतन के कगार पर नौकरशाही

उत्तराखंड की तस्वीर तो तभी दिखने लग गई थी जब राज्य के गठन की तैयारी जोर-शोर से चल रही थी। एक महकमे की महिला अधिकारी से कहा गया कि वह अपना दफ्तर खाली करें। वहां सरकार के लिए अन्य बंदोबस्त होंगे। जिलाधिकारी निवेदिता शुक्ला हुआ करती थीं। वह भी दबंग और कडक़ थीं। निवेदिता के पसीने छूट गए थे, उस महिला अधिकारी को काबू में करने में। बात इतनी थी कि उस महिला अधिकारी की पकड़ सियासत में बड़े नाम वालों से थीं। उस फेर में उसने डीएम को भी धौंस में लेने की कोशिश की। सरकार की वह खासमखास हो गईं बाद में। इससे प्रशासनिक तंत्र में लोगों को आगे बढऩे का रास्ता मिल गया।

चेतन गुरुंग

त्तर प्रदेश के जमाने को याद करने की जरुरत है। हम तब पत्रकारिता के शिशु थे। डीएम-एसपी तो बहुत बड़ी तोप थे, लेकिन एसडीएम-सीओ भी वजूद रखते थे। आयुक्त और डीआईजी की हैसियत आप सोच सकते हैं। तब क्या हुआ करती थी। गढ़वाल मंडल तब पुलिस महकमे में आईजी (मेरठ रेंज) के आधीन हुआ करता था। वह कभी-कभी देहरादून दौरे पर आते थे। जितने भी पत्रकारों को पता चलता था, उनका इंटरव्यू करने सर्किट हाउस पहुंच जाते थे। सर्किट हाउस यानि आज का राज भवन। कभी लखनऊ से कोई सचिव या विशेष सचिव (उत्तराखंड में अपर सचिव) भी आते थे तो उनका इंटरव्यू लेना बन ही जाता था। मुझे याद है एक बार मुख्य सचिव माता प्रसाद और एक बार योगेन्द्र नारायण देहरादून आए। उनके पीछे कारों का काफिला ऐसा था कि उत्तराखंड में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के साथ भी नहीं होता है। उस दौर में कभी आयुक्त बैठक लिया करते थे तो जिलाधिकारियों में तनाव झलकता था।
एसपी बेचैन दिखा करते थे। इसमें सिर्फ भय नहीं होता था। कुर्सी और पोजीशन को लेकर सम्मान भाव का मिश्रण हुआ करता था। डीएम अगर किसी डॉक्टर, इंजीनियर, दारोगा या किसी को भी निलंबित बोल दे तो वह फिर निलंबित ही होता था। आज की तरह नहीं, डीएम कुछ भी बोल दे, एसएसपी कुछ भी बोल दे, दरोगा तो दूर कांस्टेबल तक का बाल बांका नहीं होता है। बहुत पुरानी बात नहीं है। पिछली ही सरकार में एक कोतवाल का तबादला एसएसपी ने किया। एसएसपी भी ऐसा-वैसा वाला नहीं। बहुत कडक़ और ईमानदार छवि वाला। कोतवाल की पहुँच का आलम ये कि एसएसपी को अपना फैसला वापिस लेना पड़ा। नंदाराजजात यात्रा के बारे में एक आयुक्त से मैंने जानकारी चाही तो बोले ये तो डीएम बता सकता है। मैंने कहा ठीक है, मैं बात करता हूँ डीएम से,आयुक्त ने गुजारिश किस्म की करते हुए कहा-चेतन जी, मुझे भी बता देना कि डीएम क्या बोल रहे, मैं हैरान,आयुक्त अपने डीएम से बात नहीं कर पा रहे। ऐसा इसलिए भी होता है जब सरकार कम योग्य नौकरशाहों को ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी सिर्फ जुगाड़ और रिश्तों-सिफारिशों-सियासी कोण के चलते सौंप देते हैं।
उत्तराखंड की तस्वीर तो तभी दिखने लग गई थी जब राज्य के गठन की तैयारी जोर-शोर से चल रही थी। एक महकमे की महिला अधिकारी से कहा गया कि वह अपना दफ्तर खाली करें। वहां सरकार के लिए अन्य बंदोबस्त होंगे। जिलाधिकारी निवेदिता शुक्ला हुआ करती थीं। वह भी दबंग और कडक़ थीं। निवेदिता के पसीने छूट गए थे, उस महिला अधिकारी को काबू में करने में। बात इतनी थी कि उस महिला अधिकारी की पकड़ सियासत में बड़े नाम वालों से थीं। उस फेर में उसने डीएम को भी धौंस में लेने की कोशिश की। सरकार की वह खासमखास हो गईं बाद में। इससे प्रशासनिक तंत्र में लोगों को आगे बढऩे का रास्ता मिल गया। उत्तराखंड बना तो अजय विक्रम सिंह मुख्य सचिव बने। वह दूसरे नंबर की वरिष्ठता वाले मधुकर गुप्ता, डॉ. रघुनन्दन सिंह टोलिया और ज्योति राव से पूरे चार बैच ऊपर थे। तब अफसर भी कैडर व वरिष्ठता का सम्मान करने वाले थे। उत्तर प्रदेश की संस्कृति उनकी दिमाग में थीं। जहां वरिष्ठ का मतलब हर हाल में वरिष्ठ हुआ करता था। बैच मैट भाई या दोस्त, सिंह को कुछ महीने के कार्यकाल में खूब सम्मान मिला। वह बाद में देश के रक्षा सचिव बने। कैडर में सम्मान भाव के चलते सुरजीत किशोर दास सिर्फ एक बैच ऊपर वाले एम रामचंद्रन से तकरीबन खौफ खाते थे। ये बात अलग है कि रामचंद्रन ने वरिष्ठता के साथ ही मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के करीबी और विश्वासपात्र लोगों के साथ अपनी करीबी का भरपूर दोहन किया। सिर्फ दशक भर पहले तक हाल ठीक चलता रहा। उसके बाद बीजेपी सरकार आई बीसी खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने। प्रभात कुमार सारंगी उनके सचिव,नौकरशाही का रंग और तस्वीर में तेजी से बदलाव आया।
ये वह दौर था जब मुख्य सचिव से कहीं ज्यादा शक्तिशाली सारंगी हो गए थे। जो सारंगी बोले उसी का पालन होता था। मंत्री तक सारंगी से निर्देश या आदेश लेते थे। सारंगी सियासी काम भी संभाल चुके थे। खंडूड़ी उन पर बुरी तरह आश्रित हो चुके थे,उस वक्त के मुख्य सचिव सुरजीत दास के पास कई बार घंटों कोई अफसर तो दूर आम आदमी तक मिलने नहीं आते थे। सभी सीधे सारंगी से मुलाकात करते थे। दास भले और समझदार थे, उन्होंने मुख्य सचिव की कुर्सी छोड़ उत्तराखंड राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष की कुर्सी पकडऩा बेहतर समझा, जो स्वायत्त थी। वैसे रामचंद्रन ने डॉ. टोलिया को मुख्य सचिव रहने के दौरान काफी हद तक पैदल कर दिया था।. बड़े अफसर सिर्फ रामचंद्रन को खुश रखने की कोशिश करते थे। वह तब महज प्रमुख सचिव (मुख्यमंत्री) और बाद में अपर मुख्य सचिव हो गए थे। फिर भी उनका जलवा सारंगी सरीखा नहीं था।
सारंगी-रामचंद्रन की दिखाई राह बाद के नौकरशाहों को ऐसी पसंद आई कि कइयों ने उसी पर चलना शुरू कर दिया। इनमें वरिष्ठ और जूनियर स्तर के आईएएस-आईपीएस-आईएफएस अफसर शामिल हैं। कई जूनियर आईएएस अफसर सिर्फ सियासी पकड़ के चलते इस कदर स्वच्छंद और मजबूत हो गए कि उन्होंने वरिष्ठों और मुख्य सचिव तक को पूछना और उनके आदेशों को मानना बंद कर दिया। जिस मुख्य सचिव का कार्यकाल कम रह जाए उसकी तरफ तो देखना भी पसंद नहीं करते, आज आज के अफसर, वे नंबर दो या फिर जिसकी सरकार में चल रही, उसके गुट में बैठना पसंद कर रहे हैं। ऐसा इन दिनों खूब हो रहा है। इसमें सियासी नेतृत्व और नौकरशाही दोनों ही बराबर जिम्मेदार हैं। नौकरशाहों को ये समझ लेना चाहिए कि मुख्य सचिव या फिर डीजीपी सिर्फ पद नहीं है.वे संस्थान हैं। आज वे उसको कमजोर करेंगे तो कल उनको ही फॉलो करते हुए उनके जूनियर अफसर उनके साथ वही बर्ताव करेंगे, जो वे आज वरिष्ठों के साथ कर रहे है। इस व्यवस्था पर सरकार की तरफ से कभी नियंत्रण की कोशिश भी नहीं हुई है। उसने आँखें मूंदे रखीं,कमजोर विजन वाले या फिर एजेंडा वाले मुख्यमंत्रियों के चलते इस तमाशे को बढ़ावा ही मिला। इसके चलते विकास योजनाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहीं। आम लोगों को भी नुक्सान हो रहा है। जिनकी सरकार में चल रही, वे तमाम बड़े और अहम महकमे-कुर्सियां संभाल रहे हैं। इससे उनके पास वक्त की कमी पड़ जाती है या फिर वे ढंग से काम नहीं देख पा रहे हैं। जिन अफसरों के सियासी माई-बाप नहीं हैं, वे नाखुश और निराश हो के बैठे हैं, उनके पास वे महकमे हैं, जिनको कोई नहीं रखना चाहते या फिर कम अहमियत वाले हैं। सबसे बड़ा नुकसान ये हो रहा है कि नौकरशाही कई धड़ों में बंट गई हैं।
सब अपना काम छोड़ के विरोधी खेमे के अफसरों को निबटाने में व्यस्त हैं। मुख्यमंत्री जो भी रहे, उनके बारे में ये कहा जा सकता है कि उनकी कुर्सी से रुखसती में नौकरशाहों का खराब चयन भी अहम रहा। नौकरशाही भूल रही कि जो वे आज कर रहे हैं, उससे सिर्फ उनका कैडर ही कमजोर हो रहा है। इसका खामियाजा वे जल्द या फिर उनकी आने वाली पीढ़ी जरूर भुगतेगी। इस पतन के कगार पर पहुँच चुकी नौकरशाही को अब सिर्फ एक धक्का और लगा तो यकीन मानिए कि मोहल्ले के नेताओं के आगे भी उनको खींसे निपोरते और उनके आदेश लेते हुए देखने का नजारा जल्द सामने होगा।

 

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