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लोस चुनाव-2009 पार्ट-2 की साजिश!

त्रिवेंद्र से नाराज हैं क्षत्रप

  • पाँचों सीटों पर न लग जाए झटका
  • खंडूड़ी के खिलाफ चले कामयाब ऑपरेशन को दोहराने की आशंका

चेतन गुरुंग
देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत निस्संदेह उत्तराखंड के अब तक के सबसे शक्तिशाली मुख्यमंत्री हैं। उनको किसी बात का डर नहीं है। सरकार के अल्पमत में आने की वह आशंका तो कतई नहीं, जिसके दंश को पूर्व के मुख्यमंत्रियों ने हलक तक के खतरे के तौर पर जिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्टï्रीय अध्यक्ष अमित शाह की इच्छा के बिना पार्टी में पत्ता तक नहीं हिलता। त्रिवेंद्र दोनों के बेहद विश्वासपात्र हैं। विधानसभा में बहुमत इतना है कि विपक्षी दल कांग्रेस कभी सोच भी नहीं सकती उनकी सरकार को किसी तरह गिराने की। त्रिवेंद्र को अगर खतरा है तो सिर्फ अपनों से.यानि, बीजेपी में मौजूद उन लोगों से, जिनको क्षत्रप कहा जाता है। बीजेपी में मुख्यमंत्री की चलती गाड़ी का पहिया पंक्चर कर देना, परम्परा है। नित्यानंद स्वामी, जो राज्य के पहले मुख्यमंत्री थे, के वक्त से ये दौर शुरू हुआ। फिर आगे खंडूड़ी-निशंक के मुख्यमंत्रित्व काल तक चलता रहा। त्रिवेंद्र राज में भी ये फिर चरम पर दिख रहा है। इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है कि त्रिवेंद्र को हटाने की इच्छा रखने वाले क्षत्रप चंद महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में पार्टी को राज्य की पाँचों सीटों पर पटखनी खिला सकते हैं। बीसी खंडूड़ी जब मुख्यमंत्री थे तो उनके खिलाफ भी असंतोष बगावत की हद तक फ़ैल चुका था। हाई कमान उनको हटाने को राजी नहीं था। लोकसभा चुनाव (2009) में बीजेपी राज्य के सभी सीटें हार गई। हाई कमान को उत्तराखंड में पार्टी की दशा-दिशा ठीक करने के लिए खंडूड़ी की छुट्टी करनी पड़ी थी। बीजेपी के क्षत्रप उस कहानी को दोहरा दें तो हैरानी नहीं होगी।

……उत्तराखंड बीजेपी में भगत सिंह कोश्यारी, बीसी खंडूड़ी और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक हमेशा से बड़े क्षत्रप के भूमिका में रहे। तीनों खांटी भाजपाई रहे और आजन्म कमल के फूल पर सवार रहे। आज तस्वीर ये है कि कोश्यारी और खंडूड़ी का सियासी कैरियर समाप्तप्राय है। कोश्यारी नैनीताल और खंडूड़ी पौड़ी लोकसभा सीट से सांसद हैं। दोनों ही एलान कर चुके हैं कि अगले चुनाव में वे टिकट के दावेदार नहीं होंगे। निशंक हरिद्वार से सांसद हैं। वह अभी 60 साल के पूरे नहीं हुए हैं। लिहाजा उनका चुनाव लडऩे का दावा अभी सालों पुख्ता रहना तय है। कोश्यारी-खंडूड़ी के खिलाफ उनकी उम्र चली गई है। पार्टी नेतृत्व यूं ही युवाओं और कम उम्र के लोगों को ही टिकट देने के हक़ में है। इस नीति से कोश्यारी-खंडूड़ी को बहुत नुकसान हुआ है, जबकि कोश्यारी सियासत में जबरदस्त सक्रिय ही नहीं हैं, बल्कि उनके चेलों और समर्थकों की तादाद पार्टी में बहुत बड़ी है। नेतृत्व के नए फैसलों ने उनको बहुत नुकसान पहुँचाया है। वह एक बार फिर मुख्यमंत्री बनने की हसरत रखते हैं। जिस वक्त त्रिवेंद्र को मुख्यमंत्री चुनाव गया था तब ही कोश्यारी इस कुर्सी के दावेदार थे। ये बात अलग है कि उनको तब भी नेतृत्व ने एकदम अलग कर दिया था। त्रिवेंद्र के साथ अगर कोई मुख्यमंत्री के दावेदार के तौर पर उभरे तो वह प्रकाश पन्त थे। कोश्यारी और खंडूड़ी के साथ त्रिवेंद्र की रिश्ते इस वक्त अच्छे नहीं माने जाते हैं। खंडूड़ी के साथ त्रिवेंद्र के रिश्ते तभी से असहज थे, जब वह कोश्यारी खेमे के मरजीवड़े समझे जाते थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके रिश्ते कोश्यारी से भी अच्छे नहीं रह गए हैं। त्रिवेंद्र को सिर्फ इन दोनों उस्तादों से नहीं जूझना पड़ रहा। उनके हम उम्र निशंक ने अपनी मुख्यमंत्री बनने की हसरत छोड़ी नहीं है। उनको बहुत तूफानी और शातिर सियासतदां समझा जाता है। जब वह मुख्यमंत्री बने थे, तब कोश्यारी की दावेदारी सबसे बड़ी समझी जा रही थी। कोश्यारी को पता भी नहीं चला था। निशंक मुख्यमंत्री की कुर्सी ले उड़े थे। कांग्रेस को बुरी तरह हिला और मथ के बीजेपी में चेलों के साथ आए पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और उनके साथ ही आए हरक सिंह रावत की भी चुनौती का सामना त्रिवेंद्र को करना पड़ रहा है। हरक हाल ही में ये कह के एक किस्म से सनसनी मचा चुके हैं कि उनको एनडी तिवाड़ी सरकार गिराने का जिम्मा मिला हुआ था। सियासी समीक्षक इसको उनकी त्रिवेंद्र को धमकी के तौर पर देख रहे हैं। हरक भी उनमें शामिल हैं, जो मुख्यमंत्री से असंतुष्ट हैं, कांग्रेस से ही आए और बहुगुणा के दाएं हाथ सुबोध उनियाल भी त्रिवेंद्र खुश नहीं हैं। हरक-उनियाल मंत्री हैं लेकिन उनको महकमों को ले कर ख़ुशी नहीं है। वे ज्यादा बेहतर तथा अधिक मंत्रालय की इच्छा रखते हैं। बहुगुणा को न राज्यपाल बनाया गया न ही राज्यसभा भेजा गया।
राष्टï्रीय स्वयं सेवक संघ के भी ज्यादातर पदाधिकारी और प्रचारक त्रिवेंद्र को ले कर नाखुश बताए जाते हैं। त्रिवेंद्र खुद संघी रहे हैं, वह संघ के दबाव में कभी नहीं दिखते हैं। इससे पहले मुख्यमंत्री संघ से आदेश लेते रहते थे। ये बात भी संघ को नागवार गुजरती है। संघ ये राय भी बनाता रहा और ऊपर सन्देश देता रहा है कि त्रिवेंद्र के रहते पार्टी के लिए लोकसभा चुनाव में हालात बहुत अच्छे नहीं रहने वाले,जातीय समीकरण देखें तो ब्राह्मण लॉबी त्रिवेंद्र को शुरू से ही नापसंद करती रही है। त्रिवेंद्र पर मोदी-शाह का हाथ न होता तो इतने सब के बाद कभी की उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी से छुट्टी हो जाती। ये बात अलग है कि कामकाज सुस्त रफ़्तार से करने और सलाहकारों को सही न चुनने तथा कुछ नौकरशाहों के प्रभाव में रहने के आरोप उन पर लगते रहे हैं। फिर भी उन पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का आरोप कभी नहीं लगे। जिलाधिकारियों और जिलों के पुलिस प्रमुखों की तैनाती भी उनके वक्त में बहुत अच्छी हुई है। इसके चलते त्रिवेंद्र के खिलाफ पार्टी में असंतुष्टों के पास शिकायत करने के लिए बहुत ठोस कुछ नजर नहीं आता है। ऐसे में ये समझा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी पाँचों सीट हार जाती है तो त्रिवेंद्र के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी। नेतृत्व तब उनको बदलने पर विचार कर सकता है। इस पहलू को देखते हुए पार्टी के क्षत्रप और असंतुष्ट लोकसभा चुनाव-2009-पार्ट-2 का प्लॉट तैयार कर सकते हैं। सभी को याद है कि खंडूड़ी को तभी मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाया था, जब पार्टी लोकसभा की पाँचों सीटों पर हार गई थी। ऐसा नहीं था कि बीजेपी तब कमजोर थी। बीजेपी हारी क्योंकि क्षत्रप ऐसा चाहते थे। खंडूड़ी को हटाने के लिए.वे अपने मकसद में कामयाब हो गए थे। तब कोश्यारी,निशंक और संघ के कुछ लोगों की भूमिका को पार्टी की जबरदस्त शिकस्त के पीछे देखा गया था। इस बार भी इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि बीजेपी लोकसभा चुनाव में सभी सीटें हार जाती है तो त्रिवेंद्र के लिए कुर्सी पर बने रहना बहुत बड़ी चुनौती होगी। यही इकलौता और बड़ा खतरा त्रिवेंद्र के सामने है, जिससे पार पाना उनके लिए बहुत जरूरी है। ऐसा नहीं हुआ तो चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन भी मुमकिन है। इस आशंका से कोई इनकार नहीं कर सकता।

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