You Are Here: Home » Front Page » चुनावी मौसम में संकट के बादल

चुनावी मौसम में संकट के बादल

  • बीजेपी को भारी न पड़ जाए टिकट बंटवारा और विवादों का पिटारा
  • पूर्व सैनिक, शिक्षक और कर्मचारी भी नाराज
  • संघ अभी भी सरकार से खुश नहीं
  • कोश्यारी,खंडूड़ी की नाराजगी भारी न पड़ जाए
  • हरिद्वार सीट भी बहुत बड़ी समस्या

चेतन गुरुंग
देहरादून। लोकसभा चुनाव अब आ ही गए हैं। चुनाव आयोग चुनावों की घोषणा करने में अब ज्यादा वक्त नहीं लेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी मोड में काफी पहले से हैं। अब उन्होंने पूरा वक्त पार्टी को देने का फैसला कर लिया है। जनसभाओं में ही वह अब ज्यादा दिखाई देंग। उत्तराखंड उन राज्यों में है जहाँ पिछले लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने जलवा दिखाया था। पांच की पांच सीटें बीजेपी ने अपने खाते में डाली थी। तब देश में मोदी-मोदी हो रहा था। मोदी नाम का जादू छाया हुआ था। कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार से लोग खुन्नस खाए हुए थे। इसका खामियाजा कांग्रेस ने उत्तराखंड में भी बुरी तरह भुगता। इस बार न मोदी लहर की छाया है न ही मोदी पर अब लोग आँख मूँद के भरोसा कर रहे हैं। पांच राज्यों की विधानसभा चुनावों में ये हकीकत सामने आ गई है। बीजेपी तीन हिंदी बोली वाले राज्यों में सरकार गंवा बैठी और अन्य दो राज्यों में उसका प्रदर्शन बहुत बुरा रहा। ऐसे माहौल में बीजेपी को उत्तराखंड में पिछले प्रदर्शन को दोहराने या फिर बेहतर प्रदर्शन करने के लिए जरूरी है की संगठनात्मक स्तर पर वह बहुत सशक्त दिखाई दे। सरकार के कामकाज से लोग संतुष्ट दिखें। ऐसा होता नजर नहीं आ रहा। पार्टी के पूर्व महामंत्री (संगठन) संजय कुमार सेक्स स्कैंडल ने जहाँ उसकी छवि को बहुत चोट पहुंचाई है वहीं ऐसा भी लग रहा है कि इस बार टिकटों का बंटवारा बहुत बड़ा सिर दर्द साबित होगा। ये पिछले चुनावों जैसा तो बिल्कुल नहीं होने वाला है। साफ़ लग रहा है की हर सीट पर टिकट को ले कर अंदरखाने गृह युद्ध सरीखी स्थिति सामने आ सकती है। इसका नुकसान पार्टी को पहुँचने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है।

……संजय सेक्स स्कैंडल ऐसे वक्त पर सामने आया जब लोक सभा चुनाव आ चुके हैं। ये मामला ऐसा साबित हो रहा, जो दबने के बजाए आए दिन गुब्बारे की तरह न सिर्फ फूलता जा रहा बल्कि मीडिया इसको हाथों-हाथ ले रहा है। बीजेपी या सरकार के मीडिया मुग़ल इस मामले को किसी भी तरह दबा पाने में नाकाम साबित हुए हैं। ताजा विवाद इस मामले में संजय के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो जाना है। इसके बाद पुलिस के लिए आसान नहीं होगा संजय को गिरफ्तार न करना। कांग्रेस इस मुद्दे को चुनाव में निश्चित रूप से बहुत जोर-शोर से भुनाएगी। इस मामले में पीडि़ता ने ये कह कर त्रिवेंद्र सरकार के लिए भी मुश्किलें पैदा कर दी हैं कि सरकार के ईशारे पर उसको किराए के मकान से बाहर किया जा रहा है।
संजय की गिरफ़्तारी चुनाव से पहले हो जाती है तो ये मुद्दा और जोर पकड़ लेगा। गिरफ़्तारी नहीं होती है तो ये आरोप सरकार पर लग जाएगा कि वह आरोपी को बचा रही है। इस बीच इसी मामले में बीजेपी के महानगर अध्यक्ष विनय गोयल फिर स्टिंग में घिर गए हैं। इस बार उनको ये कहते हुए कैमरे ने कैद कर लिया की कोई अगर दलित है और गलत काम में नहीं है तो झूठ, इससे पहले विनय ये कहने पर विवादों में आ गए थे कि संघ के प्रचारक कोई खुदा के बन्दे नहीं हैं, जिन पर आँख मूँद के यकीन किया जाए। उनकी भी शारीरिक जरूरत होती है। ये बात उन्होंने पीडि़ता को हालांकि समझाने वाले अंदाज में कहा था। वह मामला अभी शांत हुआ भी नहीं था की दलितों को ले कर की गई उनकी टिप्पणी बीजेपी को कहीं भारी न पड़ जाए। संजय संघ के आदमी हैं और संघ के लोग त्रिवेंद्र सरकार से लगातार खार खाए हुए हैं। उनको सरकार के कामकाज की शैली नहीं जंच रही और त्रिवेंद्र संघ को अपने ऊपर नाहक हावी होने भी नहीं दे रहे हैं। संजय के यौन उत्पीडऩ में फंस जाने से संघ की नाराजगी सरकार से बढ़ गई है। संघ को लगता है की सरकार अगर दिलचस्पी लेती तो संजय वाला मामला दबाया जा सकता था।
बीजेपी के लिए इससे बड़ा खतरा टिकटों का बंटवारा साबित होगा। अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट पर टिकट केन्द्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा को ही मिलेगा, ये तय दिख रहा है। उनके समकक्ष और कोई नाम पार्टी के पास दिख नहीं रहा लेकिन बाकी चार सीटों को ले कर घमासान तय है। पौड़ी के सांसद बीसी खंडूड़ी, नैनीताल के सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि व अगला चुनाव लडऩे के इच्छुक नहीं हैं। इसके पीछे उनकी नाराजगी के साथ ही अगला लोक सभा चुनाव बहुत कड़ा रहने की आशंका को भी समझा जा रहा है। राज्य सरकार की उपलब्धियां ऐसी नहीं हैं की उसके दम पर लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करना अपेक्षाकृत आसान रहे। मोदी का असर अब वैसा रहा नहीं,जीतने के बाद भी केंद्र में मंत्री बनने की सम्भावना शून्य दिखती है। फिर टिकट मिलने की गारंटी भी नहीं दिख रही। ऐसा न हो कि टिकट के लिए दौड़ धूप करें और न मिले तो सियासी जीवन की इस बेला पर ये उनकी प्रतिष्ठा के लिए भी अच्छा नहीं होगा। खंडूड़ी के स्थान पर उनके ही करीबी तीरथ सिंह रावत लम्बे समय से पौड़ी सीट से लडऩे की मंशा पाले हुए हैं। वह खुद को क्षेत्र में सक्रिय भी रखे हुए हैं। तीरथ के नाम पर पार्टी में सहमति बन पाना आसान नहीं रहने वाला। फिर फ़ौज छोड़ के सियासत में उतर चुके अजय कोठियाल बहुत बड़ा नाम हो चुके हैं। वह बीजेपी से टिकट चाहते हैं। न मिले तो कांग्रेस का दामन थाम सकते हैं। वहां भी कुछ न हो तो फिर निर्दलीय उतर सकते हैं। कोठियाल चुनाव का नतीजा प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। फिर सबसे बड़ा सिर दर्द शौर्य डोभाल साबित होने वाले हैं। वह चुनाव लडऩे के लिए लम्बे समय से हाथ-पैर मार रहे हैं। राष्टï्रीय सुरक्षा सलाहकार और मोदी-शाह के खासमखास अजीत डोभाल का बेटा होना ही बहुत बड़ी वजह टिकट हासिल करने में साबित हो सकती है। ऐसे माहौल में जिसको भी टिकट मिलेगा, उसको आन्तरिक मदद पूरा मिलने के आसार तो कम ही हैं, बल्कि पार्टी प्रत्याशी को उनसे दिक्कत ही होगी। कोश्यारी का हाल भी खंडूड़ी से अलग नहीं है। उनकी नैनीताल सीट पर भी कई दावेदार हो चुके हैं। कांग्रेस छोड़ के बीजेपी में गए और सरकार में मंत्री यशपाल आर्य बोल ही चुके हैं कि वह लोकसभा चुनाव लडऩा चाहते हैं। सरकार में मंत्री प्रकाश पन्त के नाम की भी चर्चा चल रही है। युवा नेता और दो बार के विधायक पुष्कर सिंह धामी को भी कोश्यारी के मजबूत उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा है। टिहरी से सांसद महारानी माला राज्यलक्ष्मी को लेकर खुद भाजपाई आश्वस्त नहीं हैं कि वह टिकट मिलने पर जीत भी पाएंगी अब या नहीं। वह सबसे निष्क्रिय सांसदों में शुमार की जा सकती हैं। उनकी सीट पर अभी कोई नाम बहुत मजबूती से सामने नहीं आया है लेकिन महारानी का टिकट काटना और उनको फिर देना दोनों ही फैसला बीजेपी को भारी पड़ सकता है। हरिद्वार सीट पर बहुत घमासान रहना तय है। सरकार के प्रवक्ता और मंत्री मदन कौशिक तथा मौजूदा सांसद पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक में सियासी प्रतिद्वंद्विता जबरदस्त है। कौशिक की कोशिश सांसद बनने की है। दूसरी और निशंक के लिए टिकट बचाना बहुत बड़ी जरुरत है। वह टिकट नहीं बचा पाते हैं तो ये उनके लिए सियासी शिकस्त तो होगी ही सियासी भविष्य पर भी बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर देगा। अब इतने झंझटों के चलते बीजेपी लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करती है या फिर पाँचों सीटें जीतने का कारनामा फिर कर डालती है तो इसको जादू ही कहा जाएगा। बीजेपी को राज्य कर्मचारियों और शिक्षकों से भी इस बार पहले जैसा समर्थन मिलने की गुंजाइश नहीं दिख रही। सातवें वेतन आयोग के मुताबिक भत्तों को ले कर त्रिवेंद्र सरकार कुछ ठोस एलान नहीं कर पा रही है। सरकार की वित्तीय दशा ऐसी है भी नहीं की वह जल्द भत्ते दे सके। शिक्षकों में नाराजगी लगातार बढ़ रही है। पूर्व सैनिकों में भी नाराजगी कम नहीं हुई है। वैन रैंक वैन पेंशन का मुद्दा ऐसा है, जिस पर मोदी सरकार कुछ नया नहीं कर पा रही और राज्य सरकार इस पर कुछ नहीं कर सकती है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट की मौजूदगी में हाल ही में बीजेपी कार्यकर्ताओं और पूर्व सैनिकों के बीच झड़प चुनावी मौसम में बीजेपी का सिर दर्द और बढ़ाएगी। ये तय है, बीजेपी इस संकट से कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी तरीके से पार पाती है, ये देखना दिलचस्प रहेगा। लोकसभा चुनाव का गणित इन समीकरणों पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा।

All Rights Reserved to Weekand Times . Website Developed by Prabhat Media Creations.