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मंत्री-विधायकों के लिए प्रशिक्षण!

हरक कांग्रेस में भी रहे हैं। वह पूर्व में सेक्स स्कैंडल और भर्ती घोटालों में संलिप्त ही नहीं रहे बल्कि एनडी तिवारी राज में उनके मंत्री की कुर्सी जैनी सेक्स स्कैंडल के कारण चली गई थी। उसके बाद भी उनमें कोई सुधार नहीं दिखा। विवाहेत्तर सम्बन्ध के साथ ही एक और सेक्स स्कैंडल में उनका नाम आया। ये बात अलग है कि इस तरह के झंझावातों से पार पाने में अब उनकी मास्टरी हो चुकी है। वे ऐसे मामलों से घबराते नहीं हैं। वह आज भी सनसनी फैलाने वाले बयान दे देते हैं। देहरादून की मसूरी सीट से विधायक गणेश जोशी भी अपनी हरकतों से लगातार विवादों में घिरे रहते हैं।

चेतन गुरुंग

राजेश शुक्ला, राजकुमार, संजय कुमार और प्रणव सिंह बीजेपी के विधायक हैं और हरक सिंह रावत मौजूदा त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार में मंत्री। इनके नामों का जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि ये वे लोग हैं जो सरकार के लिए मुसीबत का सबब बनते रहे हैं। कई मौकों पर उनके बयान आग में घी का काम तो करते ही रहे हैं। कभी-कभी वे ऐसे बयान दे डालते हैं कि लगता ही नहीं वे सत्ता धारी दल से हैं। ऐसे ही हरक सिंह की पहचान मुंह फट होने के साथ ही ऐसे विवादों में डूबे रहने वाले राजनेता और मंत्री की रही है, जो तकदीर साथ न दे तो सियासी जिंदगी ही ख़त्म कर डाले, ये बात अलग है कि इनमें से हरेक अपने दम पर सियासत में जमे हुए हैं, पार्टी का फायदा अलबत्ता, मिलता है। देखा जाए तो सरकार के प्रवक्ता और मंत्री मदन कौशिक भी कुछ मौकों पर ऐसे बोल निकाल चुके हैं जो उनकी सियासी तौर पर परिपक्व होने पर अंगुली उठाते हैं।
शुक्ला का नाम इन दिनों इसलिए चर्चा में है कि अपनी ही सरकार में उन्होंने मिट्टी तेल का घोटाला रुद्रपुर में होने का मामला उठाकर सरकार के लिए बेचैनी उत्पन्न कर दी है। जीरो टालरेंस वाली त्रिवेंद्र सरकार के लिए अब इस मामले में कड़े कदम उठाना जरूरी हो गया है। अगर ऐसा नहीं होता है तो उसकी छवि पर चोट पहुंच सकती है। राज कुमार भी उधमसिंह नगर में अपने उधमी बर्ताव के कारण चमके रहते हैं। इससे बीजेपी और सरकार ही घेरे में आ रही है। वह पुलिस से भिडऩे और महिला पुलिस कर्मियों के साथ अभद्रता के कारण भी निशाने पर आए थे। संजय कुमार हरिद्वार से हैं। वह भी अपनी बात खुल के रखने वाले हैं। भले वह बीजेपी से हैं लेकिन सरकार को निशाने पर लेने में देर नहीं लगाते हैं। वह मुख्यमंत्री पर सीधे प्रहार करने के कारण मीडिया में छा गए थे। उन्होंने त्रिवेंद्र के लिए झोटा बिरयानी खाने पूर्व बीएसपी विधायक के घर जाने का आरोप लगा के सनसनी फैला डाली थी। प्रणव को जो नहीं जानते वे उत्तराखंड की सियासत से अनजान कहे जा सकते हैं। चैम्पियन के तौर पर ज्यादा पहचाने जाने वाले प्रणव कभी मंत्री के रात्रि भोज में गोली चला कर किसी को घायल कर देने,कभी मगरमच्छ का शिकार करने तो कभी किसी के साथ झगड़ा करने के कारण जम कर सुर्खियां बटोरते रहे हैं। हरक कांग्रेस में भी रहे हैं। वह पूर्व में सेक्स स्कैंडल और भर्ती घोटालों में संलिप्त ही नहीं रहे बल्कि एनडी तिवारी राज में उनके मंत्री की कुर्सी जैनी सेक्स स्कैंडल के कारण चली गई थी। उसके बाद भी उनमें कोई सुधार नहीं दिखा। विवाहेत्तर सम्बन्ध के साथ ही एक और सेक्स स्कैंडल में उनका नाम आया। ये बात अलग है कि इस तरह के झंझावातों से पार पाने में अब उनकी मास्टरी हो चुकी है। वे ऐसे मामलों से घबराते नहीं हैं। वह आज भी सनसनी फैलाने वाले बयान दे देते हैं। देहरादून की मसूरी सीट से विधायक गणेश जोशी भी अपनी हरकतों से लगातार विवादों में घिरे रहते हैं। खुद मंत्री कौशिक के अपरिपक्व बयान के चलते सरकार और आबकारी मानती प्रकाश पन्त परेशानी झेल चुके हैं। कौशिक ने एक बार प्रेस कांफ्रेंस में ये कह के सरकार की आफत कर दी थी कि परचून की दुकान में भी शराब बेची जा सकेगी। सरकार के लिए ये समझाना लम्बे समय तक भारी पड़ा था कि उसने फैसला डिपार्टमेंटल स्टोर के लिए किया है, न कि परचून की दुकान के लिए.ये कुछ मिसालें हैं, जो ये साबित करती हैं कि सिर्फ नए विधायक ही नहीं बल्कि मंत्री और पुराने विधायकों को भी सिखलाई की दरकार है। इसके लिए विधायकों को प्रबोधन कार्यक्रमों में बैठना जरूरी होता है। ख़ास तौर पर जो पहली बार विधायक बन के आए हों। ये कार्यक्रम इसलिए भी अहम होते हैं कि इनमें विधायकों को सदन में बैठने और काम करने तथा आचार-विचार के बारे में सिखाया जाता है.प्रशिक्षण देने और सिखाने वाले भी पुराने और अनुभवी विधायक या पूर्व विधायक होते हैं। ये कार्य विधानसभा प्रशासन करता है। आज ज्यादातर विधायकों को सदन में बर्ताव करने या फिर अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन के बारे ज्ञान और भान है. पूर्व में ऐसा नहीं था। उत्तराखंड जब बना था तो प्रबोधन कार्यक्रम से जुड़ा एक किस्सा है। राज्य के पहले विधानसभा चुनाव 2002 में हुए। ज्यादातर जीते लोग पहली बार सदन में थे। विधानसभा प्रशासन की तरफ से प्रबोधन कार्यक्रम का आयोजन आइआइपी में किया गया था। विधायकों को प्रशिक्षण देने वालों में मुन्ना सिंह चौहान और राज्य के पहले अंतरिम मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी शामिल थे। संयोग से दोनों ही चुनाव हार गए थे। मैंने अमर उजाला में तब पहले पेज पर स्टोरी के थी। हेडिंग थी-हारने वाले सिखाएंगे जीतने का गुर। इस खबर को ले के विधानसभा के सचिव महेशचंद्र काफी खफा हुए। उनको लगा कि ये सदन की अवमानना हो गई। मुझे खंडन के लिए कहा गया लेकिन मैंने छापा नहीं। मेरा तर्क था की सदन की अवमानना तो सदन के दौरान होती है। अगर स्पीकर या विधायक सदन के बाहर या फिर सत्र न होने के दौरान कुछ गड़बड़ करते हैं और उनके बारे में कोई खबर छपती है तो वह सदन की अवमानना कहाँ से होगी। बाद में मेरे इस तर्क के चलते विधानसभा प्रशासन ने भी शांत होने का रास्ता अपनाया। मेरा मानना है कि भले मैंने तथ्यात्मक तौर पर सही खबर लिखी थी लेकिन ये भी उतना ही सही है कि चौहान या स्वामी न सिर्फ सुलझे हुए और अनुभवी सियासतदां थे, बल्कि उनको सदन के बारे में वाकई ज्ञान भी अच्छा-ख़ासा था। स्वामी तो उत्तर प्रदेश के विभाजन से पहले वहां के विधान परिषद के सभापति और उससे पहले उप सभापति भी रह चुके थे। चौहान को आज भी विद्वान राजनेताओं और विधायकों में शुमार किया जाता है। मैं महसूस करता हूँ कि विधायकों को विजयी हो के सदन में आने के बाद खुद में परिपक्वता पैदा करनी चाहिए। उनको आत्म संयम के साथ ही अनुशासन का पालन भी करना चाहिए.जिस तरह विधायक और मंत्री सार्वजनिक तौर पर बर्ताव कर रहे हैं उससे विधायिका की प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है.उनको सही प्रशिक्षण मुहैया कराना वक्त की मांग है। ऐसा होता है तो सरकार को अपने ही विधायकों और मंत्रियों के कारण संकट व परेशानी का सामना करना नहीं पड़ेगा।

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