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फिर बजा आरक्षण का सियासी नगाड़ा

  • मोदी ने गरीब सवर्णो को दस फीसदी आरक्षण देने का चला बड़ा दाव
  • परंपरागत वोट बैंक की दूर करने की भाजपा ने की कोशिश
  • तीन राज्यों में बिधानसभा चुनाव में हार और नोटा से बेचैन भाजपा
  • संबिधान संशोधन विधेयक संसद में पास , विपछ ने बताया चुनावी स्टंट

Sanjay Sharma @WeekandTimes

लखनऊ। लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर आरक्षण का सियासी नगाड़ा बजाया गया। इस बार यह नगाड़ा सवर्णों को लुभाने के लिए बजाया गया। मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों को शिक्षा और नौकरियों में दस फीसदी आरक्षण का ऐलान ही नहीं किया बल्कि संविधान संशोधन बिल पर संसद की मुहर भी लगवाने में सफलता प्राप्त कर ली। लोकसभा चुनाव से पहले इसे मोदी का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है। विपक्ष ने तमाम किंतु-परंतु के बाद इस बिल को अपना समर्थन दिया। हालांकि विपक्ष ने विधेयक को लाने के समय और सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए इसे भाजपा का चुनावी स्टंट करार दिया है। बावजूद इसके भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को उम्मीद है कि मोदी का यह दांव आने वाले चुनाव में गेम चेंजर साबित होगा और उसका परंपरागत सवर्ण वोट बैंक अब उसका खुलकर साथ देगा। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रया क्या होती है। सवर्ण आरक्षण के मोदी दांव का आगामी लोकसभा चुनाव पर कितना असर पड़ेगा, यह भविष्य ही बताएगा।

लोकसभा का चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है, राजनीतिक दल सियासी दांव चलने लगे हैं। भाजपा भी चुनावों को लेकर अपनी तैयारियों में जुटी हुई है। वह किसी भी सूरत में दोबारा सत्ता पर काबिज होना चाहती है। वहीं दूसरी ओर भाजपा को दिल्ली के तख्त से उखाड़ फेंकने के लिए विपक्षी दल महागठबंधन बनाने में जुटे हैं। हिंदी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पराजित होने के बाद भाजपा और भी चौकन्नी हो गई है। इन चुनावों में पराजित होने का एक बड़ा कारण सवर्णों की नाराजगी बताई जा रही है। भाजपा के सवर्ण वोटबैंक ने इन चुनावों के दौरान जमकर नोटा का इस्तेमाल किया। इसकी प्रमुख वजह सरकार द्वारा एससी-एसटी अधिनियम पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटना था। एससी-एसटी अधिनियम में सुप्रीम कोर्ट ने बिना जांच गिरफ्तारी न करने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ दलितों ने जमकर विरोध किया। विपक्षी पार्टियों ने भी सरकार पर इस फैसले को बदलने का दबाव बनाया। पिछले लोकसभा चुनाव में दलितों ने भाजपा का काफी साथ दिया था लिहाजा मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया और अधिनियम को यथावत बनाए रखा। इससे सवर्ण नाराज हो गए। उन्होंने न केवल सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बहाल करने की मांग की बल्कि आरक्षण देने की भी मांग की। इसी दौरान विधानसभा चुनाव हुए और सवर्णों ने भाजपा के खिलाफ नोटा का जमकर इस्तेमाल किया। अपने परंपरागत वोट बैंक की नाराजगी को दूर करने के लिए भाजपा ने सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण देने का ऐलान किया है। चूंकि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर जाता है। इसलिए भी सरकार ने सवर्णों की नाराजगी दूर करने में भलाई समझी। उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं। जिसमें दस फीसदी सीटें सवर्ण बहुल है। यही नहीं उत्तर प्रदेश में सवर्णों की संख्या सबसे ज्यादा है। ये कुल आबादी का 20 फीसदी से अधिक हैं। सवर्णों में भी ब्राह्मïणों की जनसंख्या दस फीसदी है। भाजपा के कई नेता खासकर उत्तर प्रदेश की ऊंची जातियों से संबंध रखने वाले हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को सवर्णों का सबसे अधिक 47.8 फीसदी वोट मिला था, जबकि कांग्रेस को महज 13.8 फीसदी वोट मिला था। जाहिर है भाजपा के लिए सवर्ण मत बेहद महत्वपूर्ण है। वह भी तब जब उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन से उसे दो-दो हाथ करना है। सपा-बसपा गठबंधन ने लोकसभा उपचुनाव के दौरान यहां की तीनों लोकसभा सीटें भाजपा से छीन ली थी और उसे शिकस्त का सामना करना पड़ा था। भाजपा की मुश्किल यह है कि वह दलितों को भी नाराज नहीं कर सकती और सवर्णों को भी नहीं। यही वजह है कि उसने एससी-एसटी एक्ट को बरकरार रखकर एकओर दलितों को खुश करने की कोशिश की वहीं दूसरी ओर दस फीसदी आरक्षण देकर सवर्णों को खुश करने की कोशिश कर रही है। इसमें दो राय नहीं है कि गरीब सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की बात काफी दिनों से उठ रही थी और मोदी सरकार ने इसको संवैधानिक संशोधन के जरिए लागू करने की कोशिश की है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि इसका असर यूपी समेत पूरे देश खासकर हिंदी पट्टी के तमाम राज्यों पर पड़ेगा। इस बिल के पास होने पर पीएम मोदी ने कहा था कि संविधान संशोधन विधेयक पारित हो गया है। यह सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को शिक्षा एवं रोजगार में 10 प्रतिशत आरक्षण मुहैया कराएगा। यह सामाजिक न्याय की जीत है। यह युवा शक्ति को अपना कौशल दिखाने का व्यापक मौका प्रदान करता है और देश में एक बड़ा बदलाव लाने में सहायक होगा। हालांकि विपक्ष ने समर्थन देने के बावजूद इसे भाजपा का चुनावी स्टंट करार दिया है। वहीं इसके सुप्रीम कोर्ट से खारिज होने की आशंका भी जताई जा रही है। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट क्या रुख अपनाता है यह भविष्य के गर्त में है लेकिन भाजपा को इसका फायदा लोकसभा चुनाव में मिलना तय है।

 

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