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आर्थिक मंदी की आहट, भारत और आशंकाएं

सवाल यह है कि विश्व के तमाम देशों पर आर्थिक संकट क्यों मंडरा रहा है? क्या अमेरिका और अन्य देशों के बीच चल रहा व्यापार वॉर इसके लिए जिम्मेदार है? क्या आने वाले दिनों में आर्थिक हितों को लेकर विभिन्न देशों के बीच टकराव बढ़ेंगे? आर्थिक मंदी का कितना असर पड़ेगा? क्या इससे बचाव का कोई रास्ता सरकारों के पास नहीं है? क्या आर्थिक रूप से उभरते भारत पर इसका असर नहीं पड़ेगा?

Sanjay Sharma

विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट ने दुनिया के तमाम देशों के होश उड़ा दिए हैं। इसके मुताबिक विश्व पर आर्थिक मंदी का खतरा मंडरा रहा है। मंदी के कारण न केवल पूंजी निवेश बल्कि कल्याणकारी योजनाओं पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा। हालांकि रिपोर्ट में भारत की आर्थिक सेहत अच्छी रहने की संभावना जताई गई है। इस वर्ष इसकी विकास दर 7.5 फीसदी रहने की उम्मीद है। इसके साथ भारत सबसे तेजी से बढऩे वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा। अहम सवाल यह है कि विश्व के तमाम देशों पर आर्थिक संकट क्यों मंडरा रहा है? क्या अमेरिका और अन्य देशों के बीच चल रहा व्यापार वॉर इसके लिए जिम्मेदार है? क्या आने वाले दिनों में आर्थिक हितों को लेकर विभिन्न देशों के बीच टकराव बढ़ेंगे? आर्थिक मंदी का कितना असर पड़ेगा? क्या इससे बचाव का कोई रास्ता सरकारों के पास नहीं है? क्या आर्थिक रूप से उभरते भारत पर इसका असर नहीं पड़ेगा? क्या भारत अपनी आर्थिक नीतियों के जरिए अपने विकास दर में संभावित वृद्धि को हकीकत में उतार पाएगा?
आर्थिक मंदी की स्थितियां एक दिन में नहीं उत्पन्न हुई हैं। विश्व के विकसित और विकासशील देशों के बीच पिछले कुछ वर्षो से बढ़ी प्रतिस्पर्धा ने आर्थिक संतुलन को बिगाड़ दिया है। अमेरिका जैसी आर्थिक महाशक्ति ने चीन समेत कई देशों से व्यापार वॉर छेड़़ दिया है। इसने अपने यहां आयात होने वाली तमाम वस्तुओं पर भारी कर लगा दिए हैं। इसके पहले विकासशील देशों से अमेरिका जाने वाले सामानों पर नाममात्र का कर लगता था। अधिक कर के कारण वस्तुओं के दामों में अचानक इजाफा हो गया है, जिससे मांग में गिरावट आई। प्रतिक्रिया में इन देशों ने भी अमेरिकी सामानों पर भारी कर लगा दिए। इस नये व्यापार वॉर ने उत्पादन और वितरण पर विपरीत असर डाला है। मांग में कमी आने से आर्थिक स्थितियां ही डांवाडोल नहीं हुईं बल्कि बेरोजगारी भी बढ़ी। वहीं विदेशी निवेश में भी तेजी से गिरावट आई। इसका खामियाजा विकासशील देशों को भुगतना पड़ रहा है। उन पर कर्ज का दबाव बढ़ता जा रहा है। लिहाजा वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर 2019 में तीन प्रतिशत से घटकर 2.9 प्रतिशत पर पहुंच गई है और आने वाले वर्षों में भी सुधार की संभावना नहीं है। हालांकि भारत पर इसका असर नहीं दिखेगा। इसकी वजह यह है कि भारत कई मामलों में आत्मनिर्भर है और अर्थ नीति को दुरुस्त करने में जुटा है। अपनी विशाल जनसंख्या के कारण वह वस्तुओं के उत्पादन और वितरण पर दूसरे देशों पर निर्भर नहीं है। विदेशी निवेश को प्रोत्साहित कर रहा है। लिहाजा इसकी विकास दर पर ब्रेक लगने की संभावना नहीं है। बावजूद इसके भारत को सतर्क रहना होगा।

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