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किसका चमकेगा सितारा,किसका होगा अस्त!

  • खंडूड़ी,कोश्यारी और महारानी पर होगा अंतिम फैसला
  • महाराज, कौशिक भी समर में कूदने के फेर में
  • शंक के आसान नहीं होगा टिकट बचाना
  • इस बार बीजेपी प्रत्याशियों को खुद दिखाना होगा दम
  • मोदी जादू न होने से उनको अधिक मेहनत करनी होगी

चेतन गुरुंग
देहरादून। लोकसभा चुनाव की दुदुंभी बजने के लिए अब अधिक वक्त नहीं रह गया है। डेढ़-दो महीने बाद चुनावों की घोषणा हो जाएगी और आचार संहिता अस्तित्व में आ जाएगी, ये तय है,ये हैरानी की बात कही जा सकती है कि इतना कम अरसा बचा रहने के बावजूद अभी तक बीजेपी या कांग्रेस के प्रत्याशियों के बारे में तस्वीर किसी को नहीं दिखी है। दावे के साथ कोई ये नहीं कह पा रहा है कि दोनों प्रमुख दलों के किन लोगों को अगले लोक सभा चुनाव में टिकट मिलने वाला है। क्या बीजेपी के मौजूदा सांसदों को फिर मैदान में उतारा जाएगा या फिर बीजेपी नेतृत्व इस बार नए चेहरों पर दांव खेलेगा? कांग्रेस में इस बार फिर पुराने चेहरे, जो पिछली बार शिकस्त खा के बैठे हुए हैं, को ही टिकट दे दिया जाएगा या फिर नई ऊर्जा और अविवादित नामों को आजमाया जा सकता है। तय अगर कुछ है तो वह ये कि ये चुनाव कईयों की सियासी पारी की समाप्ति की घोषणा कर देंगे। इनमें ज्यादातर नाम बीजेपी के मौजूदा सांसदों के हैं। तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों बीसी खंडूड़ी, भगत सिंह कोश्यारी और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के लिए ये चुनाव इस लिए बहुत अहम हैं कि अगर उनका टिकट कट गया तो फिर उनकी सियासी डगर में सिर्फ अँधेरा ही अँधेरा होगा। बीजेपी की ओर से उनकी जगह कोई नया चेहरा जीत जाता है तो फिर आने वाले सालों में उनका सितारा राज्य की सियासत में ध्रुव तारे की तरह चमकेगा, ये तय है।

……निशंक के हक़ में अभी बेशक उम्र है, फिर भी उनके टिकट को लेकर आशंका बहुत अधिक है। खंडूड़ी और कोश्यारी के खिलाफ तो उम्र है ही। उनका स्वास्थ्य भी पहले जैसा दुरुस्त नहीं रह गया है। साथ ही तीनों नामों को पार्टी में नए उभर रहे नामों से चुनौती बहुत कड़ी मिल रही है। खंडूड़ी और कोश्यारी इशारा करते रहे हैं कि वे अब नहीं लडऩा चाहते हैं। उनकी इस इशारे के पीछे उनकी इच्छा से ज्यादा पार्टी में उनकी सीट पर बढ़ते द्वंद्व और हाई कमान में कमजोर पड़ चुकी पकड़ को देखा जा रहा है। इसमें शक नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई वाले नेतृत्व में उनको कहीं से भी तवज्जो मिलती दिख नहीं रही है। उत्तराखंड के ये दिग्गज तब कहीं उपेक्षित दिखाई देते हैं, जब यहाँ मोदी या शाह दौरे पर आते हैं। मोदी-शाह के दौरों के दौरान पार्टी के नए उभरते चेहरों राज्यमंत्री डॉ. धन सिंह रावत और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को ही उनकी तवज्जो मिलती है।
कोश्यारी भले 75 पार हैं,फिर भी वह चुनावी सियासत से किनारा करने को अभी राजी नहीं हैं। अगर पार्टी ने उनको टिकट नहीं दिया, तो ये मान लिया जाएगा कि उनकी सियासी पारी में आगे कोई धूम-धड़ाका नहीं दिखेगा। वह नैनीताल से सांसद हैं। वहां जिसको भी टिकट मिले, लेकिन मंत्री यशपाल आर्य, जो कांग्रेस से आए हैं ने अपनी इच्छा जतला दी है कि वह नैनीताल से कोश्यारी के स्थान पर चुनाव लडऩे को तैयार हैं.कोश्यारी वैसे पार्टी के आज भी सशक्त स्तम्भ हैं। उनका टिकट काट दिया जाता है तो ये देखना भी अहम रहेगा कि आखिर बीजेपी नैनीताल सीट वाकई निकाल पाने का दम रखेगी। कोश्यारी अगर टिकट नहीं हासिल कर पाते हैं तो वह ये कोशिश तो जरूर करेंगे कि उनकी करीबी और विश्वासपात्र को ही टिकट मिले। खटीमा के विधायक पुष्कर सिंह धामी उनकी ऐसे हाल में पसंद हो सकते हैं। धामी की संघ और पार्टी में पकड़ है। साथ ही युवाओं में लोकप्रिय चेहरा भी माने जाते हैं। ये सच है कि नैनीताल में कोश्यारी नहीं तो फिर कौन की लड़ाई में इतने कम समय बाद भी कुछ साफ़ नहीं हो पाया है। पौड़ी के सांसद खंडूड़ी को टिकट नहीं मिलेगा, ये तय है। 90 पार वाले खंडूड़ी अपनी सियासी पारी पूरी कर चुके हैं और उनको खुद ही पारी घोषित करने में देर होती है तो कुछ समय बाद ही टिकट बंटवारे दौरान उनको मैदान से वापिस बुला लिया जाएगा। उनकी जगह भरने के लिए शौर्य डोभाल सबसे आगे चल रहे हैं। ये बात अलग है कि पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और राज्यमंत्री रहे तीरथ सिंह रावत के लिए खंडूड़ी पूरी ताकत लगा देंगे। रावत को खंडूड़ी का ही शिष्य समझा जाता है। कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज भी पौड़ी से टिकट चाहते हैं, उनकी नजर भी मुख्यमंत्री या फिर केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनने पर है। उनको टिकट मिलने के असार वैसे कम हैं, निशंक अगर इस बार हरिद्वार से टिकट नहीं बचा पाते हैं और त्रिवेंद्र मंत्रिपरिषद में सदस्य मदन कौशिक, उनका टिकट ले उड़ते हैं, तो फिर उनको लम्बे समय तक उत्तराखंड की सियासत के बवंडर में उड़ते रहना पड़ सकता है। कौशिक उनके सियासी प्रतिद्वंद्वी हमेशा से रहे हैं। कौशिक संसद के जरिये मुख्यमंत्री की कुर्सी के बड़े दावेदार बनना चाहते हैं। बिल्कुल वैसे ही, जैसे खंडूड़ी, एनडी तिवाड़ी और हरीश रावत ने किया था। टिहरी की महारानी माला राज्यलक्ष्मी को लोकतंत्र में भी महारानी की तरह बर्ताव करना और अपने संसदीय क्षेत्र में पार्टी के ही लोगों तक की नाराजगी का खामियाजा टिकट कटाई के तौर पर भुगतना पड़ जाए तो अचम्भा नहीं होगा। महारानी को ले कर उनके क्षेत्र में इस कदर नाराजगी है कि पार्टी नेतृत्व पसोपेश में है कि क्या किया जाए। उनकी टिहरी सीट को बीजेपी नेतृत्व ने बी श्रेणी में डाल दी है। मतलब, जीत-हार दोनों की संभावना सामान.इससे महारानी नाराज भी बताई जाती हैं।
कांग्रेस में पौड़ी से गणेश गोदियाल मजबूत दावेदार के तौर पर उभर के आए हैं। युवा गोदियाल को कांग्रेस नेतृत्व पसंद भी करता है। यहाँ अभी और नाम उभरे नहीं हैं, लेकिन इतना तय है कि गोदियाल का दावा टिकट पर हो चुका है। हरिद्वार में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत कांग्रेस के प्रत्याशी हो सकते हैं। वह नैनीताल में भी ध्यान लगाए हुए हैं। ऐसा लग रहा कि वह दोनों में से एक सीट पर टिकट ले ही लेंगे। रावत के लिए खतरनाक बात ये है कि वह टिकट मिलने पर चुनाव नहीं जीत पाते हैं, तो उत्तराखंड की सियासत में उनके लिए दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। ऐसा ही अल्मोड़ा सीट पर टिकट के मजबूत दावेदार प्रदीप टम्टा के साथ हो सकता है।
पिछला चुनाव केन्द्रीय मंत्री अजय टम्टा के खिलाफ हार चुके प्रदीप के लिए ये आखिरी मौका हो सकता है। उनको टिकट मिल जाएगा, इसकी सम्भावना काफी मजबूत है। टिहरी सीट पर कांग्रेस की तस्वीर अभी भी बहुत धुंधली है। यहाँ टिकट किसको मिलेगा, ये जाने के लिए अभी और वक्त लगने वाला है, इतना जरूर है कि बीजेपी प्रत्याशियों को इस बार अपने बूते भी चुनाव जीतना होगा। मोदी जादू इस बार नहीं है.असर भी बहुत कम रह गया है। ऐसे में उनको सरकार विरोधी या फिर पार्टी विरोधी लहर का सामना भी करना पड़ सकता है.जो उनके लिए चुनाव और कठिन कर सकते हैं।

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