You Are Here: Home » Front Page » त्रिकोणीय मुकाबले के आसार

त्रिकोणीय मुकाबले के आसार

  • यूपी में सपा भासपा ने कांग्रेस कर लिया किनारा
  • बंगाल में भी गठबंधन को लेकर शंसय बरकार
  • भाजपा के लिए त्रिकोणीय मुकाबला भी बड़ी चुनौती

Sanjay sharma @WeeknadTimes

लखनऊ। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कोलकाता महारैली में भले ही बीस से अधिक विपक्षी दलों ने एकजुटता दिखाई हो लेकिन निजी हितों, महत्वाकांक्षाओं और सियासी समीकरणों को देखते हुए सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ अखिल भारतीय स्तर पर एक सशक्त महागठबंधन के आसार फिलहाल नहीं दिख रहे हैं। हालांकि पूरे देश में भाजपा के खिलाफ क्षेत्रीय दलों के बीच गठबंधन की गांठ जरूर मजबूत होती नजर आ रही है। यूपी में सपा-बसपा गठबंधन इसका ताजा उदाहरण है। हालिया राजनीतिक हलचलें आगामी लोकसभा चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबले की ओर संकेत कर रही हैं। इस त्रिकोणीय संघर्ष में भाजपा, क्षेत्रीय दल और कांग्रेस मुकाबिल होगी। यह त्रिकोणीय संघर्ष भी भाजपा के लिए दिल्ली की राह को बेहद कठिन कर देगा क्योंकि विभिन्न राज्यों में तमाम क्षेत्रीय दलों का मजबूत जनाधार है। यूपी में इसी जनाधार के बल पर सपा-बसपा गठबंधन ने लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में भाजपा को पटखनी दी थी। जाहिर है इस बार भाजपा के सामने 2014 जैसा राजनीति माहौल बिल्कुल नहीं है।


….लोकसभा चुनाव की आहट के साथ विपक्षी दल लगातार एक महागठबंधन बनाने की कवायद कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसकी पहल भी की। ममता की महारैली में सपा समेत एक दर्जन से अधिक दलों के मुखियाओं ने शिरकत की। सभी ने मंच से भाजपा के खिलाफ एकजुटता का प्रदर्शन किया, लेकिन यह एकजुटता महागठबंधन की शक्ल ले पाएगा, इसमें संशय बना हुआ है। हालांकि कांग्रेस ने ममता के इस कदम का नैतिक समर्थन किया लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मंच साझा नहीं किया। इसके पीछे प्रदेश कांग्रेस इकाई की अस्वीकृति को मुख्य कारण माना जाता है। भले ही विपक्षी दल चुनाव परिणामों के बाद प्रधानमंत्री तय करने और इस पर कोई विवाद नहीं होने की बात कर रहे हों, लेकिन महागठबंधन की राह में यही सबसे बड़ा रोड़ा है। एक ओर तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी और बसपा प्रमुख मायावती तो दूसरी ओर कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के अहम दावेदार हैं। इसके अलावा कांग्रेस अभी भी बंगाल में तय नहीं कर पायी है कि वह वाम दलों के साथ जाए या तृणमूल कांग्रेस को अपना साथी बनाए। हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में फतह हासिल कर कांग्रेस पूरी तरह उत्साहित है और वह बहुत ज्यादा झुकने के मूड में नहीं दिख रही है। कुछ राज्यों में कांग्रेस को गठबंधन में साथी मिल सकते हैं, लेकिन कुछ राज्यों की तस्वीर अभी साफ नहीं है। राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर बनने वाले महागठबंधन का नेतृत्व अपने हाथ में रखना चाहती है। उसकी यह भी रणनीति है कि जिन राज्यों में कांग्रेस कमजोर है, वहां वह क्षेत्रीय दल की जूनियर पार्टनर बनने को तैयार है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पूरी तरह किनारे कर दी गई है। यहां सपा-बसपा का गठबंधन हो चुका है और उसने कांग्रेस को हाथ जोड़ दिया है। इस गठबंधन में रालोद के शामिल होने की उम्मीद दिख रही है। सपा-बसपा से झटका खाने के बाद कांग्रेस ने यहां अकेले दम पर सभी अस्सी सीटों पर चुनाव लडऩे का ऐलान कर दिया है। खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसका ऐलान किया है। राहुल गांधी को उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करेगी लेकिन सपा-बसपा गठबंधन और कमजोर जनाधार के कारण कांग्रेस यहां बहुत कुछ कर पाएगी, ऐसा फिलहाल दिख नहीं रहा है। हालांकि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने अभी भी महागठबंधन की उम्मीद नहीं छोड़ी है लेकिन देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में जिस तरह से सपा-बसपा ने अपने गठबंधन से कांग्रेस को शामिल करने से इनकार कर दिया, उसके बाद अब यूपी में तिकोणीय लड़ाई होना तय है। 21 सीट वाले ओडिशा में नवीन पटनायक ने किसी भी गठबंधन का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया है। वहां भी बीजेडी-कांग्रेस-भाजपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबला तय है। 17 सीटों वाले तेलंगाना में महागठबंधन बनने का सवाल ही नहीं। भाजपा के खिलाफ टीआरएस-ओवैसी एक साथ हैं तो कांग्रेस-चंद्रबाबू नायडू दूसरे पाले में हैं। 25 सीटों वाले आंध्र प्रदेश में भी कुछ ऐसी ही तस्वीर है। सात सीटों वाले दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के साथ आने की संभावना नहीं दिख रही है। असम में भी राजग के खिलाफ कांग्रेस का क्षेत्रीय दलों के साथ फिलहाल अभी मेल नहीं हो सका है। 42 सीटों वाले पश्चिम बंगाल में एका नहीं है। टीएमसी अपने साथ किसी भी सूरत में वामदलों को लेने को तैयार नहीं है। यहां कांग्रेस गठबंधन को लेकर संशय में है। छत्तीसगढ़ में बसपा और जोगी की पार्टी लोकसभा चुनाव में मिलकर कांग्रेस और भाजपा से मुकाबला करेगी। केरल में भाजपा के खिलाफ लेफ्ट फ्रंट और यूडीएफ अलग-अलग लड़ेंगी। कुल मिलाकर इन राज्यों में महागठबंधन जैसी तस्वीर नहीं दिख रही है। हालांकि महाराष्ट्र में भाजपा, शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन से सीधे मुकाबला होगा। हालांकि यदि शिवसेना भाजपा से अलग होकर लड़ेगी तो महाराष्ट्र में भी त्रिकोणीय संघर्ष होगा। कर्नाटक में तस्वीर साफ नहीं है। छह सीटों वाले जम्मू-कश्मीर में भी भाजपा के खिलाफ कांग्रेस-पीडीपी-एनसी के बीच गठबंधन की संभावना कम है। पीडीपी को लेकर जिस तरह की नाराजगी घाटी में है, उसमें कांग्रेस और एनसी दोनों ही उससे दूरी बनाकर चलना चाहती हैं। बिहार में आरजेडी गठबंधन को लीड कर रही है। गुजरात में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में यदि सपा-बसपा ने अपने प्रत्याशी उतारे तो यहां भी त्रिकोणीय संघर्ष होगा। कुल मिलाकर ताजा सियासी समीकरण महागठबंधन की उम्मीद को धूमिल और त्रिकोणीय संघर्ष की ओर इशारा कर रहे हैं।

 

 

All Rights Reserved to Weekand Times . Website Developed by Prabhat Media Creations.