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सरकार और नौकरशाही

आज के मुख्यमंती त्रिवेंद्र सिंह रावत के राज में भ्रष्टाचार के मामले उजागर तो हो रहे, लेकिन त्रिवेंद्र के लिए ये अच्छी बात है कि अभी तक खुद उनका नाम किसी संवेदनशील घोटाले में नहीं उछला है। उनके बारे में ये जरूर कहा जा सकता है कि काम करने और प्रशासनिक कुशलता प्रदर्शित करने के मामले में वह सुस्त हैं लेकिन ये आरोप नहीं लगा पा रहा कोई कि वह भ्रष्टाचार को पोस रहे हैं। भ्रष्टाचार के कुछ मामलों में जहां सरकार की उदासीनता दिखी है, वहां सरकार की ढिलाई को जिम्मेदार माना जा रहा है। ये सीधा सा सिद्धांत जो मेरी समझ में आया है, वह यह कि अगर मुख्यमंत्री या सरकार न चाहे तो नौकरशाही की मजाल नहीं कि वह भ्रष्टाचार के दलदल में उतर जाए या फिर नोटों के काला सागर में तैरने लगे।

चेतन गुरुंग

सरकार, नौकरशाही और भ्रष्टाचार का चोली-दामन का साथ है। इन दिनों सीबीआई में भ्रष्टाचार और शर्मनाक सिर फुटव्वल का जो नजारा दुनिया देख रही, वह एक बार फिर इसको साबित कर रहा है। आलोक वर्मा पर सीबीआई चीफ निदेशक रहते और राकेश अस्थाना पर विशेष निदेशक रहते जिस प्रकार भ्रष्टाचार में लिप्त रहने और अन्य किस्म के गंभीर आरोप लगे, वह देश को हिला के रखने के लिए काफी है। अस्थाना को केंद्र सरकार का संरक्षण मिला और वर्मा के खिलाफ दुश्मनी की हद तक केंद्र सरकार का पहुंचना ये जाहिर करने के लिए काफी है कि खेल में सरकार और बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोगों का भी निश्चित रूप से हाथ है। केंद्र सरकार में इस बार के भ्रष्टाचार को ले कर ज्यादा शोर-शराबा इसलिए भी हो रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भ्रष्टाचार के खिलाफ हुंकार शुरू से भरते रहे हैं। साथ ही इस बार मामला सीबीआई के शीर्ष अफसरों की लड़ाई सडक़ पर जिस तरह आ गई है, वह अभूतपूर्व है.केंद्र और राज्यों में नौकरशाही और राजनेताओं (मंत्रियों तक) का नाम और संलिप्तता भ्रष्टाचार में पाया जाना जरूद अभूतपूर्व नहीं है। इतना जरूर है कि नौकरशाही अगर भ्रष्टाचार में धंसती जाती है तो इसमें सरकार और उसके सरमाएदारों का बहुत बड़ा हाथ होता है।
उत्तराखंड और उससे पहले उत्तर प्रदेश के विभाजन के दौर में मैंने नौकरशाहों को न सिर्फ करीब से देखा बल्कि उनकी कार्य शैली और मजबूरियों को भी समझने का अच्छा मौक़ा मिला। मेरे साथ वे कई मौकों पर न सिर्फ अपनी मजबूरियां और गोपनीय मसले बांट लेते थे, बल्कि सरकार में बैठे शक्तिशाली लोगों की तरफ से मिल रहे फरमानों से हो रही परेशानी का भी जिक्र करते थे या रहे हैं। आज के मुख्यमंती त्रिवेंद्र सिंह रावत के राज में भ्रष्टाचार के मामले उजागर तो हो रहे, लेकिन त्रिवेंद्र के लिए ये अच्छी बात है कि अभी तक खुद उनका नाम किसी संवेदनशील घोटाले में नहीं उछला है। उनके बारे में ये जरूर कहा जा सकता है कि काम करने और प्रशासनिक कुशलता प्रदर्शित करने के मामले में वह सुस्त हैं लेकिन ये आरोप नहीं लगा पा रहा कोई कि वह भ्रष्टाचार को पोस रहे हैं। भ्रष्टाचार के कुछ मामलों में जहां सरकार की उदासीनता दिखी है, वहां सरकार की ढिलाई को जिम्मेदार माना जा रहा है. ये सीधा सा सिद्धांत जो मेरी समझ में आया है, वह ये कि अगर मुख्यमंत्री या सरकार न चाहे तो नौकरशाही की मजाल नहीं कि वह भ्रष्टाचार के दलदल में उतर जाए या फिर नोटों के काला सागर में तैरने लगे।
उत्तर प्रदेश के दिनों की बात है। देहरादून से तबादला हो कर बेकार सी पोस्टिंग में गए वरिष्ठ आईएएस अफसर (अब मरहूम) बृजमोहन बोहरा को अचानक सरकार ने मुअत्तल कर दिया। देहरादून में तैनाती के दौरान उनके साथ मेरी खूब अच्छी पटती थी। वह दो बार गढ़वाल और एक बार कुमायूं के आयुक्त रहे। क्रिकेट के जबरदस्त दीवाने थे। मरहूम विनोद खन्ना उनकी सगी बहन के बेटे थे। मस्त-कलंदर,जब उन्होंने विनोद खन्ना से मुझे निजी तौर पर देहरादून के सर्किट हाउस में मिलवाया था तो चुटकी लेते हुए बताया था,मेरे खानदान में सभी बड़े लोग हुए,बस मैं ही कुछ नहीं कर पाया। खन्ना अपने बेटे अक्षय की पहली फिल्म हिमालय पुत्र की शूटिंग गढ़वाल में करना चाहते थे। इसी सिलसिले में वह देहरादून अपने मामा के पास आए थे। निलंबित हुए तो वह देहरादून अपने निजी घर आ गए। फिर लंबा समय उन्होंने खाली गुजारा। बिना किसी काम के.एक दिन उनकी बहाली हो गई। मैंने पूछा कैसे हुआ? वह सपाट चेहरे के साथ बोले, कुछ नहीं उनकी जिद पूरी कर दी और कितना खाली बैठता। इससे आगे मैंने उनसे कुछ पूछा नहीं। मुझे समझने की जरुरत भी नहीं पड़ी।
एक और मौके पर एक दिन दो आईपीएस अफसरों से एक साथ मुलाकात हुई। इनमें से एक बाद में उत्तर प्रदेश के डीजीपी बने। दोनों का तबादला उसी दिन हुआ था। देहरादून कचहरी में मिल गए। मैंने पूछा क्या चल रहा? वे बोले, क्या बताएं हमारा तो तबादला हो गया है। मैंने पूछा क्यों? उनका कहना था, जो सरकार हमसे चाहती है, वह हमारे बस में नहीं है। उन्होंने इशारों में बताया कि उनसे सरकार कुछ हट के उम्मीद कर रही है।
उत्तराखंड के गठन के बाद भ्रष्टाचार-कदाचार के मामले एक के बाद एक ऐसे सामने आए कि देवभूमि राज्य की प्रतिष्ठा आज भ्रष्टतम राज्यों में होने लगी है। इतनी जल्दी एक छोटे से पहाड़ी राज्य की ऐसी छवि बन जाना वाकई दुखद और शर्मनाक है.आज ये प्रतिष्ठा स्थापित हो चुकी है कि बिना लिए दिए उत्तराखंड में कोई काम नहीं होता और बिना जुगाड़ के कोई काम कराना मुमकिन नहीं। जिसका जुगाड़ हो वह कोई सा भी गलत काम आराम से करा सकता है। नित्यानंद स्वामी जब अंतरिम मुख्यमंत्री थे, तभी से भ्रष्टाचार के स्वर उठने लगे थे, लेकिन कोई बड़ा मामला सामने कभी नहीं आया। एनडी तिवाड़ी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान निस्संदेह विकास कार्य बहुत हुए लेकिन उसी दौर में भ्रष्टाचार ने भी विशाल आकार लिया। बीसी खंडूड़ी,निशंक,विजय बहुगुणा और हरीश रावत के मुख्यमंत्री रहने के दौरान कुछ नौकरशाहों का गजब का असर सरकार में रहता था। इसमें कोई शक नहीं कि उनकी इच्छा के बगैर कोई भी बड़ा काम तो सरकार में हो ही नहीं सकता था। इसके कारण सरकारें और मुख्यमंत्रियों को भी कीमत चुकानी पड़ी। इन मुख्यमंत्रियों के दौर में कुछ खासमखास नौकरशाहों को मंत्रियों से ज्यादा शक्तियां हासिल थीं। ये कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने सरकार या फिर कहे कि मुख्यमंत्री के लिए कोष जुटाने का काम उनकी ही इच्छा से अपने हिसाब से किया। हर मुख्यमंत्री आँखें बंद किए रहे। बहरे भी हो गए। इसका खामियाजा भी उन्होंने भुगता। सिवाय तिवाड़ी के, जिन्होंने पूरे पांच साल राज किया। मुख्य सचिव की कुर्सी से रिटायर हुए एक नौकरशाह को ले कर कुछ दिन ही पहले मेरी एक मंत्री के आवास पर किसी राजनेता से अचानक चर्चा हुई। नौकरशाह के लिए उस नेता ने कुछ नकारात्मक कहा ये बात अलग है कि उन्होंने भी उस अफसर से खूब काम कभी कराए थे। मंत्री ने माना कि वह नौकरशाह भले आज नकारात्मक प्रतिष्ठा रखता है, लेकिन इसके लिए वह नहीं बल्कि मुख्यमंत्री और सरकारें जिम्मेदार थीं।
उन्होंने कहा कि ये तो मुख्यमंत्री पर निर्भर करता है कि किस नौकरशाह से कैसा काम लेना है। सरकार और मुख्यमंत्री न चाहे और नौकरशाह मनमानी करने लगे या फिर भ्रष्टाचार करे ये मुमकिन नहीं है। मैं उस मंत्री की बात का समर्थन करता हूं। मैंने अपने सामने सरकार के बड़े सियासी दिग्गजों और मंत्रियों को फोन कर के उनसे मदद मांगते देखा था। मुख्यमंत्री को चुनावी कोष के लिए व्यवस्था करने को कहते सुना था। वह खुद भी कई बार परेशान दिखते थे। बार-बार कोष के नाम पर पैसे की मांग पर.अब अगर ये कहा जाए की मुख्यमंत्री तो घनघोर ईमानदार था। गीता की जगह उन पर हाथ रख के कसम खा सकते हैं, लेकिन उनका खासमखास प्यादा बहुत भ्रष्ट था, तो ये बात सिवाय मजाक के और कुछ नहीं।

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