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पुलिस की नजर में मुख्यमंत्री योगी ‘पीपी’ तो अखिलेश यादव हैं ‘ग्लोब’

  • लखनऊ पुलिस की नजरों में राष्ट्रपति ‘स्टार’, प्रधानमंत्री ‘सन’
  • डिप्टी सीएम केशव मौर्या ‘प्लेटिनम’, दिनेश शर्मा बने ‘गोल्ड’
  • विदेशी राष्ट्राध्यक्ष का नाम ‘डायमंड’ तो डीजीपी बने ‘राकेट’

 गणेश जी वर्मा
लखनऊ। राजधानी पुलिस वीवीआईपी लोगों और भवनों के लिए ऐसे नाम रखती है जिनको वे कोड की तरह इस्तेमाल कर सकें। मगर मजे की बात यह है कि सिपाही और अन्य कुछ पुलिसकर्मी चौराहों पर अपनी शान दिखाने के लिए सभी को यह कोड बताते रहते हैं। आइये हम आपको बताते हैं कि लखनऊ पुलिस किसको किस नाम से बुलाती या जानती है ।
लखनऊ पुलिस की नजरों में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को जहां ‘स्टार’ माना जाता है। वहीं उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू का नाम ‘ब्लू स्टार’ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी का नाम ‘सन या सेन्ट’ तो राज्यपाल राम नाईक का नाम ‘जी’ है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम ‘पीपी’ है तो लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन का नाम ‘नोवा’ है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को जहां लखनऊ पुलिस ‘मून’ कहती है तो विधान सभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित को ‘किशटल’ केंद्रीय मंत्रियों को जहां ‘फ्लैश’ कहा करती है, वहीं विदेशी नेताओं को ‘मिग’ कहती है। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को पुलिस ‘डायमंड’ तो आतंकवादियों को ‘—’ (सुरक्षा की दृष्टिकोण से नाम नहीं छापा जा रहा है)कहते हैं। वीवीआईपी को पुलिस ‘लोटस’ तो वीआईपी को ‘रोज’ कहती है। नेता विपक्ष राम गोविंद चौधरी को ‘स्कार्प’ कहते हैं जबकि भगौड़ा सैनिक को ‘इग्लू’, सैन्य अधिकारियों को ‘स्नाइपर’ बोला जाता है। इसी तरह मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पुलिस ‘मैरीगोल्ड’ कहती है। न्यायाधीशों को ‘शिगमा’, मुख्य सचिव को ‘अल्फा’, प्रमुख सचिव गृह उत्तर प्रदेश को ‘पी.एस. होम’ कहती है जबकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह को ‘डेन’, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को ‘ग्लोब’ तो इनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को ‘ऐलोरा’ कहती है। वहीं अपने ही मुखिया डीजीपी ओपी सिंह को ‘रॉकेट’, कमिश्नर लखनऊ अनिल कुमार गर्ग को ‘लीयो’, आईजी जोन लखनऊ को ‘ज्युपिटर’ नाम से जाना जाता है जबकि उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या को ‘प्लेटिनम’ तो उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा को लखनऊ पुलिस अपने कोडवर्ड में ‘गोल्ड’ कहती है।

राजधानी: संसाधनों की कमी से जूझ रहा फायर विभाग, लापरवाही से कबाड़ बनीं कई गाडिय़ां

वीकएंड टाइम्स न्यूज नेटवर्क

विभाग की कई यूनिटों में रखी-रखी जंग खा रही चेचिस, बॉडी बनवाने के लिए नहीं मिल रहा बजट उपकरणों की बदहाली पर अधिकारियों ने साधी चुप्पी, सरकार भी नहीं ले रही सुध
लखनऊ। सूबे में हर साल सरकारी विभागों, आवासों और खेतों में आग लगने की अनेकों घटनाएं होती हैं। करोड़ों की संपत्ति आग में जलकर राख हो जाती है। राजधानी में तो सरकारी कार्यालयों में आग लगने की अनेकों घटनाएं होती रहती हैं। इसके बावजूद लखनऊ के फायर विभाग में तमाम गाडिय़ां और उनकी चेचिस पड़े-पड़े धूल फांक रही हैं। इनमें कई में जंग लग चुकी है। इतने गंभीर मुद्दे पर अधिकारियों की चुप्पी साफ बता रही है कि वे इसको लेकर सजग नहीं हैं। यदि सरकार व फायर अफसरों को इसकी थोड़ी भी सुध होती तो ये गाडिय़ां आज सडक़ों पर दौड़ रही होतीं और आम जनमानस की आग से होने वाली क्षति रोकने में कारगर साबित होतीं।
प्रदेश में एक तरफ पूरा फायर ब्रिगेड संसाधन के अभाव से जूझ रहा है तो वहीं दूसरी तरफ करोड़ों खर्च कर फायर ब्रिगेड के लिए खरीदी गई ट्रक की चेचिस कबाड़ हो रही हैं। अफसरों की अनदेखी के चलते दो साल पहले खरीदी गई 35 गाडिय़ों की चेचिस न अब चलने लायक बची हंै और न ही उन्हें मोडीफाई कर फायर ब्रिगेड का रूप दिया जा सकता है। आलम यह है कि चौक और पीजीआई फायर स्टेशन में खड़ी इन ट्रकों की चेचिस में जंग और पेड़ों ने अपना ठिकाना बना लिया है। हालांकि उच्च अधिकारियों की मानें तो गाडिय़ां सही हैं और बॉडी का टेंडर जल्द करा लिया जाएगा, फिर इनको जिलों की मांग को देखते हुए आग की रोकथाम हेतु लगाया जाएगा। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर चेचिस खरीदते समय विभाग ने बॉडी के बारे में नहीं सोचा या फिर यह किसी घोटाले की शुरूआत तो नहीं।

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