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नैया पार लगाएंगी प्रियंका ?

  • यूपी में संगठन को मजबूत करना सबसे बड़ी चुनैती
  • अपने पुराने वोटबैंक को पार्टी से जोड़ना नहीं आसान
  • जीत के लिए भाजपा के गढ़ पूर्वी यूपी में लगाना होगा सेंध
  • सपा – बसपा के ताकतबर गठबंधन से भी पाना होगा पार

Sanjay Sharma @WeekandTimes

लखनऊ। कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की एंट्री राजनीति में पूरी तरह हो चुकी है। यूपी की राजधानी लखनऊ में अपने पहले मेगा रोड शो के साथ प्रियंका ने अपनी दमदार उपस्थिति भी दर्ज करा दी है। इस रोड शो के जरिए प्रियंका ने एक झटके में पूरी सियासी महफिल लूट ली। प्रियंका की लोकप्रियता ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया को रोड शो में करीब-करीब साइड लाइन कर दिया। बावजूद इसके प्रियंका के सामने भाजपा और सपा-बसपा गठबंधन से दो-दो हाथ करना कतई आसान नहीं है। प्रियंका के सामने यूपी में मृतप्राय हो चुके पार्टी संगठन को मजबूत करने के अलावा अपने परंपरागत वोट बैंक सवर्णों, दलितों और मुस्लिमों को अपने पाले में करने की कठिन चुनौती है। इसके अलावा लोकसभा चुनाव के मद्देनजर जिस पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान कांग्रेस ने उनको सौंपी है, वह डगर भी बेहद कठिन है। पूर्वी उत्तर प्रदेश फिलहाल भाजपा का गढ़ है। वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है तो गोरखपुर सीएम योगी का गढ़ है। इसके अलावा सपा-बसपा गठबंधन के मजबूत जातीय समीकरणों से भी प्रियंका को निपटना होगा। जाहिर है, रोड शो की भीड़ से मोर्चा मारने की कल्पना नहीं की जा सकती। ऐसे में सवाल यह है कि क्या प्रियंका यूपी में बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस की नैया पार लगा पाएंगी?

सपा-बसपा गठबंधन से दरकिनार किए जाने के बाद कांग्रेस ने प्रियंका को सक्रिय राजनीति में उतारकर अब तक का सबसे बड़ा दांव चल दिया है। लोकसभा चुनाव से पहले यूपी में मृतप्राय कांग्रेस में जान फूंकने की जिम्मेदारी भी प्रियंका गांधी वाड्रा और ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंपी गई है। प्रियंका ने यह जिम्मेदारी स्वीकार कर ली है और भाजपा का रथ रोकने के लिए सियासी रथ पर सवार हो चुकी हैं। लखनऊ में मेगा रोड शो कर उन्होंने इस बात का संकेत दे दिया है कि वे राष्टï्रीय राजनीति में उतर चुकी है और कांग्रेस को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। उनके रोड शो में उमड़ी भीड़ ने कांग्रेसियों में नया जोश भर दिया है। रोड शो के बाद प्रियंका पार्टी संगठन को मजबूत करने में जुट गई हैं। इसके लिए वे तीन दिनों तक यहां पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श करती रहीं। बाजवूद इसके यूपी में प्रियंका के लिए सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस संगठन को फिर से खड़ा करने की है। लोकसभा चुनाव बेहद करीब है। इतने कम समय में संगठन को नए तरीके से खड़ा करना बिल्कुल आसान नहीं नजर आ रहा है। इतना ही नहीं कांग्रेस के पास अपना कोई मजबूत वोट बैंक भी नहीं है। कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक सवर्ण, मुस्लिम और दलित पूरी तरह बिखर चुके हैं। सवर्णों ने भाजपा का दामन थाम लिया है जबकि दलित और पिछड़ी जातियां बसपा और सपा के साथ जुड़ गई हैं। ऐसे में अपने परंपरागत वोट बैंक को पाना प्रियंका के लिए आसान नहीं होगा। यूपी में कांग्रेस के पास महज दो सांसद और 6 विधायक और एक एमएलसी है। वहीं पार्टी का वोट प्रतिशत बेहद कम है। पार्टी के पास जमीनी कार्यकर्ताओं की बेहद कमी है। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को संगठित करना प्रियंका के लिए आसान नहीं होगा। दूसरी ओर भाजपा के पास न केवल संगठित और कैडर बेस कार्यकर्ता हैं बल्कि उसकी लोकप्रियता का ग्राफ भी काफी बढ़ा हुआ है। इसके अलावा भाजपा के पास पीएम नरेंद्र मोदी जैसा लोकप्रिय चेहरा भी है। तमाम सर्वे भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि देश के करीब 68 फीसदी लोग बतौर पीएम मोदी को पसंद करते हैं। वहीं महज 25 फीसदी लोग बतौर पीएम दावेदार राहुल गांधी को पंसद करते हैं। प्रियंका गांधी वाड्रा को यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से 42 सीटों की जिम्मेदारी सौंपी गई हैं और बाकी 38 सीटें ज्योतिरादित्य सिंधिया को दी गई हैं। प्रियंका के जिम्मे जो 42 सीटें हैं, 2009 के लोकसभा चुनाव में इनमें से 18 सीटें कांग्रेस जीतने में सफल रही थी। यही वजह है कि कांग्रेस को प्रियंका से उम्मीदें हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश यानी पूर्वांचल में वाराणसी, गोरखपुर, भदोही, इलाहाबाद, मिर्जापुर, प्रतापगढ़, जौनपुर, गाजीपुर, बलिया, चंदौली, कुशीनगर, मऊ, आजमगढ़, देवरिया, महराजगंज, बस्ती, सोनभद्र, संत कबीरनगर और सिद्धार्थनगर जैसे जिले आते हैं। इस इलाके में ब्राह्मïण मतदाता अच्छे खासे हैं, जो एक दौर में कांग्रेस का मूल वोट बैंक रहे हैं।
माना जा रहा है कि प्रियंका के सहारे कांग्रेस इन्हीं वोटों को साधने की रणनीति पर काम कर रही है। इसके अलावा कांग्रेस लोकसभा चुनाव में भी साफ्ट हिंदुत्व का सहारा लेकर सवर्णों को साधने की कोशिश करेगी। प्रियंका के सामने सपा-बसपा जैसा मजबूत गठबंधन भी है। इसके अलावा जिस तरह भाजपा अपना प्रचार अभियान तेज गति से चला रही है, उसकी काट भी प्रियंका को खोजना होगा। भाजपा पूरी तरह आक्रामक राजनीति कर रही है और वह आने वाले दिनों में अपने हर विरोधी को बूथ स्तर पर घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। प्रियंका को अपने पति राबर्ट वाड्रा के कथित भ्रष्टïाचार के सवालों का भी जवाब देना होगा। विरोधी दल इस मामले को लेकर आने वाले दिनों में कांग्रेस पर पुरजोर
हमला करेंगे। ऐसे में त्रिकोणीय संघर्ष में कांग्रेस का
प्रियंका दांव कितना सफल होता है, यह तो वक्त ही बताएगा।

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