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जहरीली कच्ची शराब ने परोसी मौत

  • अफसर-माफिया मिलीभगत से जनसंहार
  • रूडक़ी-सहारनपुर में जहरीली शराब ने हरे डेढ़ सौ के प्राण
  • आँखें मूंदे बैठी सरकार से कोई पूछने तक न गया मृतकों के घर
  • अफसरों-शराब माफिया का गठजोड़ फिर उभरा
  • ईओ को मुअत्तल करना जरूरी नहीं समझा सरकार ने

चेतन गुरुंग
देहरादून। उस दिन सुबह-सुबह ही देहरादून में मुख्यालय के आबकारी अफसरों को खबर मिली कि रूडक़ी के झबरेड़ा में कुछ लोग जहरीली शराब पीने की वजह से मौत के मुंह में समा गए हैं। हरिद्वार प्रशासन और वहां के आबकारी अधिकारियों ने ये खबर दी थी। तब ये समझा जा रहा था कि मरने वालों का आंकड़ा पांच-साथ है। इतने से ही हडक़ंप मचा और मुख्यालय से तत्काल सुबह ही अफसरों को हरिद्वार वहां रवाना कर दिया गया, जहाँ तेरहवीं के दिन कच्ची शराब परोसी जाने के कारण लोगों की जान चली गई थी। जब तक मुख्यालय के अफसर बालूवाला गाँव, जहाँ की ये घटना है, पहुँचते, पता चल चुका था कि मरने वालों की तादाद दो दर्जन पहुँच चुकी है। इसके बाद तो राजधानी देहरादून और हरिद्वार ही नहीं उत्तर प्रदेश में भी खलबली मच चुकी थी। सहारनपुर सीमा से सटा गाँव होने के कारण वहां से भी काफी जानने वाले तेरहवीं में पहुंचे थे। उन्होंने भी जहरीली कच्ची शराब पी थी। उनको क्या मालूम था कि वे अपनी तेरहवीं का भी इंतजाम करने आए हैं। शाम का धुंधलका घिर आने तक दोनों प्रदेशों में मिला के मौतों का आंकड़ा शतक पार कर चुका था। सहारनपुर में रूडक़ी से ज्यादा लोग मारे जा चुके थे। दोनों सरकारों में खलबली मची तो सम्बंधित थाने के कोतवाल और चौकी प्रभारी तथा आबकारी महकमे के अफसरों को मुअत्तल करने का फरमान भी जारी हो गया।

उत्तराखंड बनने से पहले या बाद में कभी भी जहरीली शराब पी कर इतनी मौतें उत्तराखंड में नहीं हुईं। शुरूआती जांच में पाया गया कि जहरीली शराब हरदेव सिंह और सुखविंदर सिंह से बालुपुर के सोनू ने खरीदी थी। सरकार ने इस मामले की जांच के लिए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के निर्देश पर आईजीपी अजय रौतेला की कमान में एसआईटी गठित कर दी है, लेकिन पुलिस हरदेव, सुखविंदर और सोनू को पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है। शराब सहारनपुर से खरीदी और लाई गई थी। ये जांच में पता चला आरोपियों ने बताया। उन्होंने बताया कि शराब में उन्होंने पानी और कुछ अन्य ऐसे पदार्थ मिला दिए थे, जिससे शराब जहरीली हो गई। सरकार के मुताबिक मिथाइल एल्कोहल की मात्र अधिक होने के कारण ही शराब जानलेवा हो गई। इसके कारण उत्तराखंड के बालुपुर, बिंदु खडक़, मानकपुर, भलस्वागाज और लाठरदेवा तथा सहारनपुर में कई घरों के चिराग बुझ गए। शुरूआती जांच में ये भी पता चला है कि अवैध शराब का कारोबार सालों से इन इलाकों में चला आ रहा था। इसके बावजूद कभी भी प्रशासन की नजर न तो इस अवैध कारोबार पर पड़ी न ही आबकारी महकमे की ही नजरें इस ओर गईं। हरिद्वार के जिलाधिकारी दीपक रावत और जिला आबकारी अधिकारी प्रशांत कुमार पर ख़ास तौर पर लोगों की नजरें रहीं। दीपक को फील्ड का बेहतरीन नौकरशाह माना जाता है। वह छापे वगैरह खूब मारते हैं। इसके बावजूद उनको इतना बड़ा अवैध कारोबार नजर नहीं आया या फिर भनक नहीं लगी। प्रशांत पिछले साल ही कई आरोपों में मुअत्तल कर दिए गए थे। वह हाई कोर्ट से स्टे ऑर्डर ले के फिर से बहाल ही नहीं हुए, बल्कि फिर से डीईओ की कुर्सी भी कब्जा ली। हैरानी की बात ये है कि स्टे के भरोसे सरकार ने पूरा साल निकाल दिया। इस अधिकारी को हटाया नहीं। इस बीच उस पर अन्य कई तमाम गंभीर आरोप और लगे। इसके बावजूद सरकार के कानों में जूं नहीं रेंगी। इतना ही काफी नहीं शायद। सरकार ने शराब जनसंहार के बाद हरिद्वार का पूरा आबकारी महकमा मुअत्तल कर दिया। जिम्मेदार प्रशांत को सिर्फ कारण बताओ नोटिस दे के मुक्ति पा ली। जिस प्रवर्तन इंस्पेक्टर दर्शनलाल को मुअत्तल किया गया, वह हरिद्वार बैठता था, और उसके पास कोई गाड़ी भी नहीं थी। जिला प्रवर्तन अधिकारी भी सरकार ने वहां कोई तैनात किया ही नहीं था। इसके चलते इंस्पेक्टर के पास ही पूरा जिम्मा था।
प्रशांत को नोटिस देने के साथ ही आबकारी महकमे में आपसी सियासत भी रंग ले आई.संयुक्त आयुक्त स्तर के एक अफसर के लिए माना जाता है कि सरकार उसके प्रभाव में काम करती है.सरकार की आबकारी नीति में विवादित बिन्दुओं के उभरने पर भी इसी अफसर को जिम्मेदार समझा जाता रहा है.मुख्यालय में उसका धड़ा इसलिए भी सशक्त है कि शासन के अफसरों को भी उसने असर में लिया हुआ है। पहले के आयुक्त षणमुगम के बारे में कहा जाता था कि वह इस अफसर से खुश नहीं थे, लेकिन उनको ही जाना पड़ा। आबकारी मंत्री प्रकाश पन्त और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट के भी करीबियों में इस संयुक्त आयुक्त को शुमार किया जाता है। हरिद्वार के डीईओ के साथ ही मुख्यालय के अपर आयुक्त, संयुक्त आयुक्त और उपायुक्त को भी कारण बताओ नोटिस दिए जाने के पीछे इसी अफसर का हाथ माना जा रहा है। खबर लिखे जाने तक मौतों का आंकड़ा डेढ़ सौ के करीब, तकरीबन 140 पहुँच चुका था। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने इस घटना को सरकार की शर्मनाक लापरवाही करार दिया था जन संहार बताते हुए मुख्यमंत्री और मंत्री से इस्तीफे की मांग की। उन्होंने कहा कि ये जनसंहार प्रशासन और आबकारी के अफसरों की शराब माफिया के साथ मिली भगत का बेशर्म उदाहरण है। जांच में ये भी सामने आ रहा है कि उत्तराखंड के सीमावर्ती गाँवों में अवैध शराब का कारोबार सालों से चलता आ रहा है। सम्बंधित महकमे के अफसरों, पुलिस और प्रशासन के लोगों ने कभी भी इस धंधे को रोकने की कोशिश नहीं की। इसके पीछे उनकी शराब तस्करों और माफिया के साथ मिलीभगत को समझा जा रहा है। दो प्रदेशों को हिला के रख देने वाले इस जनसंहार के बाद मुख्यमंत्री रावत ने कहा कि जो भी शख्स इस घटना के लिए जिम्मेदार है, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। साथ ही उन्होंने कहा कि जहरीली शराब की बिक्री को रोकने के लिए सख्त कानून बनाया जाएगा। ये भी सच है कि इतने बड़े जनसंहार के बावजूद कोई मंत्री या सांसद या फिर विधायक तो दूर आला अफसर तक ने मृतकों के आश्रितों से तत्काल मिलने में कोई गंभीरता नहीं दिखाई। हरिद्वार से विधायक और मंत्री मदन कौशिक तक प्रभावित परिवारों से नहीं मिले। सरकार के रुख और हाल ही में आई शराब नीति के बाद एक बार फिर सरकार आरोपों के घेरे में है। लोग पूछने लगे हैं कि आखिर शराब बेच कर राजस्व कमाने को ही सरकार क्यों मुख्य कमाई बनाना चाह रही। राजस्व के लिए घर-घर शराब बेचा जाना, दुकानों और बार की तादाद बढ़ाया जाना कहाँ तक उचित है।

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