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अपने अधिकारों को समझें लड़कियां : किरन जोशी

देश में युवा प्रतिभाओं की कमी नहीं है। यदि युवा कुछ अलग करने की ठान लें और उसे पाने की हर संभव कोशिश करें तो सफलता उनके कदम चूमती है। किरन जोशी ऐसी ही एक प्रतिभाशाली बिजनेस टाइकून बन चुकी हैं। उनका किचन औरा दि रेस्टोरेंट देहरादून ही नहीं पूरी दुनिया में तेजी से पॉपुलर हो रहा है। किरन जोशी ने 4पीएम और वीकएंड टाइम्स के संपादक संजय शर्मा के साथ बेबाकी से बात की। 

किरन जोशी

आपके मन में अपना बिजनेस शुरू करने का ख्याल कहां से आया, जिसने रेस्टोरेंट, पब, ड्रिंक और डांस को एक ही प्लेटफार्म पर उपलब्ध कराने का निर्णय लिया….
बचपन से जिस माहौल में रही हूं, वह गवर्नमेंट सर्विसेज का था। मैंने भी शुरू में सिविल सर्विसेज में जाने का प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिल पाई जबकि डिजाइनिंग की तरफ मेरा पहले से इंट्रेस्ट रहा है। इसलिए मैंने बचपन के शौक को हकीकत का रूप देने का डिसीजन लिया। मैंने यूरोपियन थीम को लेकर औरा कॉन्सेप्ट का रेस्टोरेंट और रूफ टॉप बनाने का फैसला किया। इसके बाद मैंने रेस्टोरेंट को बहुत ही बेहतर ढंग से डिजाइन किया, जो देहरादून में बिल्कुल नया था। मेरे रेस्टोरेंट का पहला महीना नुकसान में गया। इसके बाद मैं काफी डिप्रेशन में आ गई लेकिन फेमिली के लोगों ने हिम्मत दी और कहा कि कोई बात नहीं हम तीसरे वाले भाई के साथ मिलकर ठीक कर लेंगे। तीसरे महीने में हमने प्रॉफिट कमाना शुरू कर दिया।

बचपन में ही मां की मौत हो जाने के बाद आपके मन में किस सेक्टर में जाने का ख्याल आता था…
बचपन से ही एक चीज क्लीयर थी कि मुझे कुछ भी करके पापा को खुश करना है। मैं पापा के सबसे करीब थी, साथ ही मम्मी के न होने की वजह से अपने भाइयों के भी काफी करीब थी। बचपन से ही भाइयों की इमीडिएटर मैं ही थी। जब भैया सिविल सर्विसेज में गये तो पापा काफी खुश हुए इसलिए मैंने सिविल सर्विसेज में जाने का डिसीजन लिया लेकिन पहले से ही दिमाग में था कि मैं बहुत लंबे समय तक सिविल सर्विसेज नहीं करूंगी। मेरा मकसद शुरू से ही एनजीओ खोलने का था, इसलिए सोसाइटी की हेल्प से लिए सिविल सर्विसेज में जाकर सीखने का डिसीजन लिया। जब सिविल सर्विसेज के एग्जाम में क्वालिफाई नहीं कर पाई तो मैंने रेस्टोरेंट खोलने और लोगों को रोजगार देकर मदद करने का निर्णय लिया।

सिविल सर्विसेज में सफल होने के बाद भी आप क्यों नौकरी छोडक़र रेस्टोरेंट खोलने के बारे में सोच रही थीं….
मैं सिविल सर्विसेज में सिर्फ इसलिए जाना चाहती थी क्योंकि मैं सिविस सर्विस की नौकरी करके उस लूप होल को जानना चाहती थी, जिसकी वजह से सरकारी योजना का लाभ लोगों को नहीं मिल पाता था। किस वजह से जमीनी स्तर पर सरकार का काम नहीं दिखता है। मैं एक गांव से विलांग करती हूं, मेरे पिता उस गांव से सिविल सर्विसेज में आने वाले पहले व्यक्ति थे। यहां स्कूल एजुकेशन नहीं है, खासकर लड़कियों के शिक्षा का स्तर बहुत खराब है जबकि मुझे अपनी फेमिली का पूरा सपोर्ट मिला। मैं चाहती हूं कि हर लडक़ी को उसी तरह का सपोर्ट मिले।

आप कितने साल की थीं जब किसी हादसे में आपकी मां की मौत हो गई थी…
मैं उस समय पांच साल की थी। इसलिए मैं अपने भाइयों और पापा के काफी क्लोज रही हूं। बचपन से ही पापा और उसके बाद बड़े भैया, फिर बीच वाले भैया सिविल सेवा में गये, जो कि एक आईपीएस हैं। इन लोगों को देखकर मेरा मन भी सिविल सर्विसेज में जाने का करने लगा लेकिन काफी प्रयास के बाद भी मैं सफल नहीं हुई। तो मैंने कुछ अलग करने का डिसीजन लिया, जिसमें फेमिली का पूरा सपोर्ट मिला। इसी वजह से मेरा रेस्टोरेंट एक साल में देहरादून का टॉप मोस्ट रेस्टोरेंट है। जहां का खाना और अन्य फैसिलिटीज सबको हमेशा याद रहती हंै।

आप पापा का सपना पूरा करना चाहती थीं। आपका रेस्टोरेंट टॉप मोस्ट रेस्टोरेंट में शामिल हो गया है, तो अब पापा को कैसा लगता है….
मैं सच कहूं तो पापा रेस्टोरेंट औरा खोलने से खुश नहीं थे। उन्हें लगता था कि रेस्टोरेंट, पब और डॉस फ्लोर है, तो बेटी को रात तक रुकना पड़ेगा, यह सही नहीं है। इसके अलावा शुरुआत में रेस्टोरेंट में हमें नुकसान भी हुआ लेकिन जब प्राफिट होने लगा और धीरे-धीरे रेस्टोरेंट का नाम होने लगा तो पापा यहां आने लगे। यहां आकर उन्हें पता चला कि रेस्टोरेंट में आने वाले लोग बहुत ही पॉजिटिविटी के साथ जाते हैं। मुझे अपने काम की वजह से कुछ अवार्ड भी मिले। जिससे मेरा उत्साह बढ़ा और अपने काम को बेहतर करना शुरू कर दिया। तब पापा ने भी मुझे पूरा सपोर्ट किया।

आप बचपन से ही एक ऐसी लाइफ जी चुकी हैं, जिसमें चारों तरफ नौकर-चाकर और ऐशो आराम था। ऐसे में अपना रेस्टोरेंट खोलने के बाद आपको दिन रात शेफ और नौकरों के साथ काम करना पड़ता है, तब कैसा महसूस होता है….
जब रेस्टोरेंट लाइन शुरू की थी, तो उसका कोई अनुभव नहीं था। किसी दिन रेस्टोरेंट में इम्प्लाई नहीं होते तो खुद सर्विस देनी पड़ती है। मुझे याद है करवाचौथ पर मेरा पूरा रेस्टोरेंट पैक था लेकिन अधिकांश स्टाफ करवाचौथ मनाने चला गया था। उस समय मुझे बहुत सी चीजों का एहसास हुआ और पता चला कि किसी भी बिजनेस को अच्छे से करने के लिए आपको उसके बारे में शून्य से लेकर 100 तक की जानकारी होनी चाहिए। इस इंडस्ट्री में हमें मेहमान की हर बात को मानना और उसे अपने तरीके से समझाने आना चाहिए।

आप जैसी खूबसूरत लड़कियों को देखकर बहुत से लोग नशे में सीमाएं लांघते हैं। ऐसी सिचुएशन में आप अपने पब में आने वाले लोगों को कैसे हैंडल करती हैं….
इस पेशे में ऐसे बहुत से मौके आते हैं। मेरे छोटे भाई मेरे साथ रहते हैं, जो कई बार मुझसे कहते हैं कि तुम ऊपर चली जाओ लेकिन मैं उन्हें समझाती हूं कि जेंट्स की जगह बहुत से मौकों को लेडीज बहुत अच्छे से हैंडल कर सकती हैं।

रात के 12 बजे तक रेस्टोंरेंट में डांस का शोर और नशे में झूमते लोगों के बीच रहना काफी चुनौतीपूर्ण है। ऐसे मौकों को हैंडल करने की हिम्मत आपमें कहां से आती है….
मुझे लगता है कि मेरी हिम्मत के पीछे सबसे बड़ी वजह फेमिली का सपोर्ट है। आपको अपने राइट्स पता हैं, तो आप उनसे उलझोगे नहीं। इसके अलावा आपमें पेशेंस होना बहुत जरूरी है। यदि कोई अभद्र व्यवहार कर रहा है, तो आप पीछे हट जाओ। यदि मैं हर चीज को ईगो पर लेकर झगड़ा करूंगी तो बहुत मुश्किल हो जाएगा।

आपको कभी बहुत अधिक गुस्सा आया है…
जी, बहुत बार ढेर सारा गुस्सा आया है। मन करता है कि बदमाशी करने वाले को उठा कर नीचे फेंक दूं, लेकिन बहुत कुछ सोच समझकर गुस्से को कंट्रोल करती हूं। इसके पीछे बड़ी वजह फेमिली का सपोर्ट और हर सिचुएशन को इजिली हैंडल करने की आदत है।

देश भर में मीटू कैम्पेन चल रहर है। इसे आप किस नजरिए से देखती हैं …
यह बहुत ही अच्छा कैंपेन शुरू हुआ है। हम जिस परिवेश में रहते हैं, वह पितृसत्तात्मक है। हम भले ही कहते हैं कि महिलाओं को भी पूरा अधिकार मिल रहा है, लेकिन वह सिर्फ कहने को है, हकीकत में ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है। लडक़ों की तरह लड़कियों को भी बचपन से आज तक वैसी फ्रीडम नहीं मिल पाई है। मीटू कैंपेन में लड़कियां बोल सकती हैं। इसका दायरा बड़ा होना चाहिए, क्योंकि लडक़ों के साथ भी बुरा होता है, तो उन्हें भी अपनी बात कहने का मौका मिलना चाहिए। हमने देखा है कि कानून का दुरुपयोग करने वाले भी कम नहीं होते हैं। इसलिए हमें खुद सच्चाई और बुराई में अंतर करने की आदत डालनी चाहिए।

आप इतने खुले विचारों वाली और मेहनती लडक़ी हैं, तो क्या आप पॉलिटिक्स में आने की सोच रही हैं….
मुझे तो अंदर से लगता है कि राजनीति में सुधार नहीं हो रहा है। इसलिए मैं अपने पापा और भाइयों से कहती हूं कि देश में पॉॅलिटिक्स का इन्वायरमेंट सही नहीं हुआ तो मैं पॉलिटिक्स में जरूर जाऊंगी।

जब आपने पॉलिटिक्स में जाने की बात कही तो पापा और भैया को डर लगा या नहीं…
मेरा पापा और भैया को लगा कि अगर आप पॉलिटिकल कॅरियर में इंटर करेंगे तो बहुत अच्छे से करेंगे। होटल बिजनेस में भी आपका सोशल विहैवियर भी काफी मायने लगता है। यही बात पॉलिटिक्स में भी है, वहां भी सोशल विहैबियर और एक्टिवनेस जरूरी है। साथ ही जो इंसान सच में कुछ बदलाव लाना चाहता है, वह भी पॉलिटिक्स में काफी सफल होता है। आप जिस भी फील्ड में जाएं उसमें बेहतर करेंगे, तो निश्चित तौर पर बदलाव आएगा।

लड़कियों के लिए आप क्या संदेश देना चाहती हैं…
मेरा मानना है कि लड़कियों को सोसाइटी की वजह से अपनी इच्छाओं को दबाना नहीं चाहिए। आप अपने कॅरियर को फॉलो करने के बजाय कन्फ्यूजन में कोई डिसीजन नहीं ले पाती है। इसके लिए उन्हें अपनी क्वालिटी को पहचानना होगा और उसी क्वालिटी को निखारने के लिए आगे बढऩा होगा। पढ़ाई पर ध्यान दीजिए और अपने अधिकारों को समझिए, तभी कुछ हो सकता है।

लड़कियों को आज के समाज में लव मैरिज करनी चाहिए या अरेंज मैरेज करनी चाहिए…
यह हर किसी का व्यक्तिगत मामला है, लेकिन शादी सोच समझकर करनी चाहिए। मुझे लगता है कि अरेंज मैरिज पसंद है, क्योंकि मेरे लिए मेरी फेमिली लडक़ा पसंद करती है, जो कि मुझे अच्छी तरह से जानती है। शादी तब तक मत करिए जब तक आपके अंदर एक स्टेबिलिटी नहीं आती है। अपने कॅरियर को पहली प्रायोरिटी पर रखिए। खुद को मजबूत बनाएं, किसी पर निर्भर न रहें, तभी सब कुछ संभव है।

किरन जोशी की लाइफ का सबसे बड़ा सपना क्या है…
मेरी जिन्दगी में ढेरों सपने रहे हैं। बचपन के सपने अलग थे, आज सपने अलग है। मेरा सपना अपनी फेमिली को खुश रखना है। वहीं पर्सनली मेरा सपना है कि सोसाइटी में कुछ ऐसा कर सकूं जिसकी वजह से किसी की लाइफ को बदल सकूं। यदि आप किसी लडक़े को एडॉप्ट कर उसकी एजुकेशन का खर्चा लेकर उसको पढ़ा दिया तो आपकी लाइफ फुलफिल हो
जाती है।

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