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शिक्षा की दुकानों को लूट की छूट…!

आज कोई भी कॉलेज मालिक ऐसा नहीं है, जिसके पास लग्जरी कार न हो और अवस्थापना सुविधा एक चौथाई भी ले के बैठा हो। फर्जीवाड़ा करने का उनका स्वभाव अलबत्ता ख़त्म नहीं हुआ है। कई कॉलेज सीबीआई और एसआईटी जांच झेल रहे। इसके बावजूद कॉलेजों की पकड़ का आलम ये हो चुका है की मंत्री तो छोडिय़े मुख्यमंत्री तक उनके यहाँ मुख्य अतिथि के तौर पर शोभायमान नजर आते हैं। जिन अखबारों और चैनलों की जिम्मेदारी उनके काले अतीत और काले कारनामों का खुलासा करने की है, वे बाकायदा समारोह आयोजित कर के उनको सम्मानित कर रहे हैं। उनको अवार्ड दे रहे हैं।

चेतन गुरुंग

लवामा हमले में उत्तराखंड के जवानों की शहादत की खबर बहुत जल्दी आ गई थी। रात बीतते-बीतते मेजर विभूति ढोंडियाल की भी शहादत का फोन आ गया तो हाहाकार मच गया। इससे पहले मेजर चित्रेश बिष्ट बम डिफ्यूज करते वक्त कर्तव्य वेदी पर बलिदानी होने का स्वर्गीय सुख अर्जित कर चुके थे। जब तक राजधानी और उत्तराखंड के लोग बिष्ट की शहादत से उपजे गम को सहने की कोशिश कर रहे थे, तब तक ये खबर सामने आ गई कि देहरादून का एक कश्मीरी छात्र बडगाम में सुरक्षा बलों से मुठभेड़ में दोजख नसीब हो गया। ये छात्र प्रेमनगर से नीचे नंदा की चौकी में स्थित अल्पाइन इंस्टिट्यूट का छात्र था। ये सब अभी चल ही रहा था कि इसी कॉलेज के साथ ही एक अन्य कॉलेज का छात्र तथा रूडक़ी के भी एक कॉलेज के छात्र ने शहीद सैनिकों के प्रति नफरत वाला सन्देश सोशल मीडिया में जारी कर दिया है इससे राजधानी में मामला भडक़ उठा। बजरंग दल और छात्रों के दल ने इन कॉलेजों का घेराव किया। कश्मीरी छात्रों को निकाल बाहर करने और प्रवेश देने पर पाबंदी लगाने की चेतावनी दी। इसके बाद कॉलेज प्रबंधन ने आरोपी छात्रों को कॉलेज से निलंबित किया और भविष्य में कश्मीरी छात्रों को अपने यहाँ प्रवेश न देने का आश्वासन दिया। अब तक मिले आंकड़ों के मुताबिक देहरादून के विभिन्न व्यावसायिक निजी कॉलेजों में दो हजार के करीब कश्मीरी लडक़े-लड़कियां पढ़ाई कर रहे हैं। कश्मीर से वे देहरादून पढऩे क्यों आ रहे? इस पर पता किया तो चौंकाने वाली बातें सामने आईं। एक तो ये कॉलेज इस बात का दबाव कतई नहीं डालते हैं कि उनको कॉलेज में जरूरी उपस्थिति देनी ही होगी। ऐसे में हो ये रहा कि कश्मीरी लडक़े-लड़कियां प्रवेश लेने के बाद सुविधानुसार कश्मीर जाते-आते रहते हैं। उनके साथ प्रबंधन का रुख बेहद ग्राहक-दुकानदार वाला रहता है। प्रबंधन के लिए ये बच्चे ग्राहक ही हैं। उनको पटा और फुसला के कॉलेजों में लाया जाता है। तमाम सुविधाएं देने का आश्वासन दिया जाता है। इनमें पास होने की सौ फीसदी गारंटी शामिल है। उनको कश्मीर से लाने के लिए बाकायदा एजेंट रखे गए हैं। जिनको प्रति छात्र 10 हजार रूपये तक दिए जाते हैं। अल्पाइन कॉलेज ने तो अपने यहाँ डीन ही कश्मीरी रखा हुआ है। यही वजह है कि उसके यहां कश्मीरी बच्चों की तादाद अच्छी-खासी है।
इसके साथ ही कॉलेजों को उनकी विश्वविद्यालयों ने स्व केंद्र प्रणाली की सुविधा दी हुई है। ऐसे में बच्चों को पास कराना कॉलेजों के लिए बहुत आसान हो जाता है। ये धंधा पिछले कई सालों से चल रहा है। हकीकत ये है कि जहाँ कश्मीर के बच्चों को देहरादून के कॉलेज बहुत मुफीद लगते हैं वहीं अन्य राज्यों के बच्चों को भी यहाँ के प्रबंधन से कोई शिकायत कभी नहीं रहती है। मैं कई कॉलेजों के मालिकों को निजी तौर पर जानता हंू। आज वे विशाल भूखंड में फैले कॉलेजों का स्वामित्व भले देख रहे, लेकिन उनकी पृष्ठभूमि बहुत काली है। इनमें ज्यादातर प्रमुख और बड़े कॉलेजों के मालिक ढाई-तीन दशक से इसी धंधे में हैं। उत्तराखंड बनने के बाद मैंने ही इन कॉलेजों के फर्जीवाड़े का खुलासा किया था। तकरीबन डेढ़ दशक पहले, तब सरकार ने भी मेरी स्टोरीज पर जम के आक्रामक कदम उठाए थे। कॉलेजों के मालिकों के खिलाफ मुकदमे लिखे गए थे। मालिकों को फरारी काटनी पड़ी थी। वक्त गुजरता गया, मालिकों ने सियासी आका और अफसरों को पकड़ लिए, उनकी चरण स्पर्शी हो गए। सो धंधा जबरदस्त ढंग से फिर चल निकला। आज कोई भी कॉलेज मालिक ऐसा नहीं है, जिसके पास लग्जरी कार न हो और अवस्थापना सुविधा एक चौथाई भी ले के बैठा हो। फर्जीवाड़ा करने का उनका स्वाभाव अलबत्ता ख़त्म नहीं हुआ है। कई कॉलेज सीबीआई और एसआईटी जांच झेल रहे। इसके बावजूद कॉलेजों की पकड़ का आलम ये हो चुका है की मंत्री तो छोडिय़े मुख्यमंत्री तक उनके यहाँ मुख्य अतिथि के तौर पर शोभायमान नजर आते हैं। जिन अखबारों और चैनलों की जिम्मेदारी उनके काले अतीत और काले कारनामों का खुलासा करने की है, वे बाकायदा समारोह आयोजित कर के उनको सम्मानित कर रहे हैं। उनको अवार्ड दे रहे हैं।
ये कोई नहीं पूछ या देख रहा कि ये कॉलेज आखिर खेल क्या कर रहे हैं। कैसे इतने सारे कश्मीरी युवाओं को कॉलेज में आसानी से प्रवेश मिल जा रहा है। कैसे यहाँ कश्मीरी युवा आतंकवादी हरकतों को अंजाम देने से पहले पनाह पा रहे हैं। देहरादून का शांत माहौल और इन्डियन मिलिट्री एकेडमी सटे होने के कारण अल्पाइन और उससे आगे के करीबी कॉलेजों में प्रवेश लेना कश्मीरी आतंकवादियों के लिए बहुत मुफीद है। पहले भी कुछ कश्मीरी आतंकवादी गिरफ्तार हुए थे। वे इसी एकेडमी पर हमले की साजिश रच रहे थे।राष्टï्रीय राजमार्ग एकेडमी के बीच से गुजरता है। ऐसे में आतंकवादियों के लिए एकेडमी पर नजर रखना और साजिश रचना आसान हो जाता है। इसके साथ ही एकेडमी में भारतीय ही नहीं मित्र राष्टï्रों के नौजवान अधिकारी भी प्रशिक्षण लेने आते हैं। यहाँ हमला हो जाता है तो दुनिया की नजर इस पर पड़ेगी। हैरानी की बात ये है कि पिछले कई सालों से कश्मीर में आतंकी माहौल बहुत खराब होने और कश्मीरी लडक़ों के देहरादून में आतंकी हरकतों में गिरफ्तार होने के बावजूद न प्रशासन और न ही सरकार ने इन कॉलेजों के प्रबंधन से जवाब तलब किए। निजी कॉलेजों प्रबंधन से कभी ये नहीं पूछा गया कि आतंकी गतिविधियों से ग्रस्त राज्य के युवाओं को प्रवेश देने और उनके आतंकी साबित होने तथा मारे जाने के बावजूद क्यों प्रवेश से पहले उनका पुलिस सत्यापन नहीं कराया जाता रहा है।
कॉलेजों की बात समझ में आती है कि इतनी औपचारिकता करेंगे तो उनका धंधा चौपट हो जाएगा, लेकिन प्रशासन क्यों नहीं अपनी जिम्मेदारी निभाता.जाहिर सी बात है कि प्रशासन और पुलिस के अफसरों के साथ ही शासन में बैठे अफसरों के साथ कॉलेज मालिकों के करीबी ताल्लुकात इस जिम्मेदारी को देश की सुरक्षा के लिए निभाने में आड़े आ रहे हैं। कॉलेजों के प्रबंधन का आलम ये है कि अल्पाइन के मालिक ने पहले तो ये कह दिया कि वह किसी भी कश्मीरी को अब प्रवेश नहीं देंगे और कश्मीरी डीन को भी निकाल दिया है, फिर दो दिन बाद ही कह दिया कि वह तो दबाव में की गई कार्रवाई और बयान था। डीन को वापस कॉलेज ज्वाइन करने के लिए कह दिया गया है, कश्मीर के ताजा बदतर हालात और हमारे जांबाज जवानों की शहादतों के बाद सरकार को चेत जाना चाहिए,अभी भी नहीं चेतेंगे तो यही माना जाएगा कि कॉलेजों के मालिकों से उनकी यारी देश और देवभूमि को भारी पडऩे वाली है। आगे भी।

 

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