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बदला जरूर लें, शहीदों के परिवारों का भी ख्याल रखें

देश के समय दुख की इस घड़ी में वह मानवाधिकारवादी कहीं दिखाई नहीं दे रहे और वो पुरस्कार लौटाने वाला समूह भी दिखाई नहीं दे रहा जो आतंकियों या माओवादियों के मारे जाने पर या उनको सजा दिये जाने पर आंदोलन चलाने लगते हैं। वे बड़े-बड़े वकील भी नहीं दिखाई दे रहे जो आतंकवादियों के मानवाधिकार की रक्षा की खातिर आधी रात को न्यायालयों का दरवाजा खटखटाते हैं। कश्मीर में सुरक्षा बलों पर आतंकी हमलों की बात हो या फिर जब माओवादी झारखंड, ओडिशा या छत्तीसगढ़ में स्कूल या कोई सरकारी कार्यालय उड़ाते हैं तो भी ये मानवाधिकार कार्यकर्ता चुप ही रहते हैं जबकि यही लोग इस बात का ज्यादा रोना रोते हैं कि इलाके में सुविधाएं नहीं होने के कारण लोग असंतुष्ट हो रहे हैं। इन मानवाधिकारवादियों को अपना दोहरा रवैया छोडऩा चाहिए और सुरक्षा की दृष्टि से उठाये गये कदमों का सदैव समर्थन करना चाहिए।

नीरज कुमार दुबे

श जानता है कि उरी हमले का मुंहतोड़ जवाब इस देश और देश की सेना ने दुश्मन के घर में घुस कर दिया था। पुलवामा में हमला कर भारत को जो आघात पहुँचाया गया है उसका बदला सेना और सरकार लेगी और इसके लिए कमर कस ली गयी है। पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों पर हुए आतंकी हमले के बाद पूरे देश में गुस्सा व्याप्त है, हर भारतीय का खून उबाल मार रहा है, जिसको देखो उसके मन में आक्रोश है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वीकार किया है कि देशवासियों का यह गुस्सा और नाराजगी जायज है। उन्होंने देश को विश्वास दिलाया है कि हमारे जवानों का सर्वोच्च बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा। प्रधानमंत्री का यह कहना कि यह लड़ाई हम जीतने के लिए लड़ रहे हैं, देशवासियों को इस बात के लिए आश्वस्त करता है कि आतंकवाद और उसको पनाह देने वालों का बहुत बुरा अंजाम होने वाला है। यह शायद पहला मौका है जब आतंकवादी हमले की सरकार ने कड़ी निंदा करने का बयान जारी करने की बजाय यह कहा कि बदला लिया जायेगा। और इसी का असर है कि देश में आक्रोश होने के बावजूद हर शख्स सरकार पर यकीन रखते हुए कार्रवाई के समय का इंतजार कर रहा है। देश जानता है कि उरी हमले का मुंहतोड़ जवाब इस देश और देश की सेना ने दुश्मन के घर में घुस कर दिया था।
पुलवामा में हमला कर भारत को जो आघात पहुँचाया गया है उसका बदला सेना और सरकार लेगी और इसके लिए कमर कस ली गयी है। लेकिन हमें सरकार और सेना पर तुरंत बदला लेने का दबाव डालने की बजाय समय से चुनाव उन्हें ही करने देना चाहिए। यह सही है कि हमारे मन में बेहद आक्रोश है लेकिन जमीनी परिस्थितियां क्या हैं इसको देखना सेना का काम है। हमें यह याद रखना चाहिए कि कोई भी लड़ाई पूरी तैयारी के साथ ही जीती जा सकती है। भावनाओं पर काबू रखकर होश में काम लेना चाहिए। हमारी तीनों सेनाएं पूरी तरह से सक्षम हैं कि किसी भी हमले का करारा जवाब दे सकें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की सुरक्षा मामलों की समिति की बैठक में पुलवामा हमले के बाद की पूरी स्थिति का विश्लेषण किया गया। सरकार ने तत्काल प्रभाव से पाकिस्तान से प्रमुख तरजीही राष्ट्र (एमएफएन) का दर्जा वापस ले लिया है। इसके अलावा फैसला किया गया है कि भारतीय विदेश मंत्रालय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को पूर्ण रूप से अलग-थलग करने के लिए हरसंभव राजनयिक कदम उठाएगा। सरकार ने साथ ही सर्वदलीय बैठक बुलाने का भी निर्णय लिया है और शनिवार को आयोजित होने वाली इस बैठक में सभी दलों को पुलवामा की घटना के बाद सरकार की संभावित कार्रवाई पर उनका नजरिया जाना जा सकता है। आगामी चुनावों की वजह से राजनीतिक दलों के बीच दिन-रात चल रही किचकिच के बीच यह देखना सुखद रहा कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कहा कि यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं है और एकजुट होकर आतंकवाद के मुकाबले का है तो उसके थोड़ी देर बाद ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि यह दुख की घड़ी है और हम इस समय पूरी तरह सरकार के साथ खड़े हैं और कोई भी ताकत आतंकवाद फैलाकर हम भारतीयों को आपस में बांट नहीं सकती है। अन्य राजनीतिक दलों ने भी बड़ी संजीदगी के साथ बयान जारी किये हैं और देश की सरकार और देश की सेना को अपना समर्थन जताकर अत्यंत परिपक्वता का परिचय दिया है। देश के समय दुख की इस घड़ी में वह मानवाधिकारवादी कहीं दिखाई नहीं दे रहे और वो पुरस्कार लौटाने वाला समूह भी दिखाई नहीं दे रहा जो आतंकियों या माओवादियों के मारे जाने पर या उनको सजा दिये जाने पर आंदोलन चलाने लगते हैं। वो बड़े-बड़े वकील भी नहीं दिखाई दे रहे जो आतंकवादियों के मानवाधिकार की रक्षा की खातिर आधी रात को न्यायालयों का दरवाजा खटखटाते हैं। कश्मीर में सुरक्षा बलों पर आतंकी हमलों की बात हो या फिर जब माओवादी झारखंड, ओडिशा या छत्तीसगढ़ में स्कूल या कोई सरकारी कार्यालय उड़ाते हैं तो भी ये मानवाधिकार कार्यकर्ता चुप ही रहते हैं जबकि यही लोग इस बात का ज्यादा रोना रोते हैं कि इलाके में सुविधाएं नहीं होने के कारण लोग असंतुष्ट हो रहे हैं। इन मानवाधिकारवादियों को अपना दोहरा रवैया छोडऩा चाहिए और सुरक्षा की दृष्टि से उठाये गये कदमों का सदैव समर्थन करना चाहिए। अब भारत सरकार क्या कार्रवाई करती है इस पर पूरे देश की निगाह रहेगी। लेकिन इतना तय है कि बड़ी कार्रवाई होकर रहेगी क्योंकि प्रधानमंत्री बार-बार कहते रहे हैं कि यह न्यू इंडिया है और हमले को कतई बर्दाश्त नहीं करता। भाजपा के कई बड़े नेता अपने भाषणों में भारत की तुलना इजराइल से करते हुए कहते रहे हैं कि जिस तरह इजराइल अपने ऊपर होने वाले हमलों का मुंहतोड़ जवाब देता है उसी तरह भारत भी देता है। भाजपा नेताओं ने जिस तरह उरी हमले के बाद की गयी सर्जिकल स्ट्राइक का जिक्र बार-बार चुनावी भाषणों में किया है, उससे इस समय सरकार का नेतृत्व कर रही भाजपा पर बड़ी कार्रवाई करने का दबाव भी बढ़ गया है। भाजपा को पता है कि आगामी दिनों में होने वाली चुनावी सभाओं में उससे इस बात का जवाब मांगा जायेगा कि पुलवामा हमले के बाद क्या कार्रवाई की गयी? भाजपा को उसका 2014 का वह वादा याद दिलाया जायेगा जिसमें उसने एक सिर के बदले 10 सिर लाने का वादा किया था साथ ही 56 इंच की छाती वाले दावे पर सवाल उठाया जायेगा। वैसे सवाल जम्मू-कश्मीर के उन नेताओं से भी पूछे जाने की जरूरत है कि क्यों आखिर वह लोग पाकिस्तान से बातचीत की वकालत करते हैं? क्या इन हालातों में किसी भी प्रकार की बातचीत, किसी भी प्रकार का सीमा व्यापार किया जा सकता है? क्यों महबूबा मुफ्ती ने अफजल गुरु के अवशेष लौटाए जाने की मांग की? क्या वह उसकी वहां पर मजार बनवा कर आतंकवादियों के लिए प्रतिज्ञा स्थल बनवाना चाहती हैं? अब जब बड़ी कार्रवाई होनी ही है तो वह आतंकवादियों के साथ ही उन पर भी हो जो हुर्रियत कांफ्रेंस में शामिल होकर भारत सरकार के खिलाफ अभियान चलाते हैं, बार-बार बंद बुलाकर कश्मीर की अर्थव्यवस्था को तबाह करने की साजिश पर तुले हुए हैं, किसी आतंकवादी के मारे जाने पर शोकसभा बुलाते हैं और उसमें भारत विरोधी नारे लगवाते हैं, यही नहीं शुक्रवार की नमाज के बाद आईएसआईएस और पाकिस्तान के झंडे लहराते हैं, सेना के ऑपरेशनों के दौरान पत्थरबाजी कर बाधा पहुंचाते हैं और जम्मू-कश्मीर पुलिस और सेना में शामिल कश्मीरी युवकों को घर लौटने के दौरान निर्ममता से मार देते हैं। बहरहाल, इस समय जिस तरह मीडिया मारे गये जवानों के परिवारों की पीड़ा को देश के सामने रख रहा है और सरकारें शहीद जवानों के परिवारों के लिए मुआवजे का ऐलान करने में लगी हुई हैं। उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि कुछ समय बाद क्या आपको यह परिवार याद रहेंगे? समय बीत जायेगा और यह परिवार अपने हाल पर छोड़ दिये जाएंगे। सरकार को पुलवामा हमले का बदला लेने की प्रतिज्ञा के साथ-साथ एक और प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि किसी शहीद का परिवार बेहाली पर नहीं छोड़ा जायेगा और पूरा देश इनके साथ हमेशा एकजुटता के साथ खड़ा रहेगा। हमें यह समझना चाहिए कि जिस जवान ने देश के लिए शहादत दे दी है वह सीमा पर सुरक्षा के समय इतना तो आश्वस्त होगा ही कि यदि उसको कुछ हुआ तो उसके परिवार की देखरेख के लिए भारतवासी उसके साथ खड़े रहेंगे।

सदियों से कश्मीर है मेरा,
अब भी मुझसे दूर नहीं
तुम मांग रहे हो कश्मीर,
मुझे मिट्टी देनी मंजूर नहीं
बीवी बच्चों से बढक़र,
कश्मीर तो हमारी जानू है
मत करना धमाके की बात,
भारत का पत्थर भी परमाणु है

 

यह सही है कि हमारे मन में बेहद आक्रोश है लेकिन जमीनी परिस्थितियां क्या हैं इसको देखना सेना का काम है। हमें यह याद रखना चाहिए कि कोई भी लड़ाई पूरी तैयारी के साथ ही जीती जा सकती है। भावनाओं पर काबू रखकर होश में काम लेना चाहिए।

 

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