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भावनाओं को भडक़ाकर जीतेंगे चुनाव !

  • पक्ष बिपक्ष मुद्दों से फिसले
  • धर्म , जाति, संप्रदाय और राष्ट्रवाद पर जोर 

Sanjay Sharma @ WeekandTimes 

लखनऊ। लोकसभा चुनाव की सरगर्मियां चरम पर हैं। सियासी दल एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगे हैं। रैलियां और सभाओं का दौर जारी है। सभी दलों के दिग्गज एक दूसरे पर वार-पलटवार कर रहे हैं। फिलहाल बिजली, सडक़, पानी, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा के मुद्दों से शुरू हुई चुनावी लड़ाई जाति, संप्रदाय, राष्ट्रवाद पर आकर टिक गई है। भाजपा जहां राष्टï्रवाद का मुद्दा भुनाने में जुटी है, वहीं अन्य दल संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की गुहार लगा रहे हैं। इसके अलावा जाति और सांप्रदायिक समीकरणों को साधने की कोशिश भी तेज हो गई है। दरअसल, सियासी दलों के नेता यह बात अच्छी तरह समझ चुके हैं कि जनता भावनाओं के आवेश में आकर जरूरी मुद्दों को भूल जाती है। नेता इसी का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। इतिहास गवाह है कि 2004 के आम चुनाव में जब भाजपा नीत राजग सरकार ‘शाइनिंग इंडिया’ के सहारे मैदान में उतरी तो उसे सफलता नहीं मिली। ठीक उसी तरह 2017 में सपा सरकार यूपी में ‘काम बोलता’ के नारे के दम पर वापसी का प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हो सकी। लिहाजा जरूरी मुद्दों की जगह भावनाओं को भडक़ाने की कोशिश में सभी सियासी दल लगे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस बार फिर भारतीय जनमानस भावनाओं में बहकर अपने मताधिकार का प्रयोग करता है या विकास और बुनियादी मुद्दों को लेकर अपना जनप्रतिनिधि चुनता है।

हाल यह है कि चुनाव जीतने के लिए खुलेआम जाति और धर्म का उन्माद फैलाया जा रहा है। राष्टï्रवाद और राष्टï्रीय सुरक्षा की भावनाओं से जनता को भडक़ाने की कोशिश की जा रही है। अपने-अपने वोटबैंक को रिझाने के लिए भय का माहौल उत्पन्न किया जा रहा है। घोषणापत्रों के जरिए भी कुछ ऐसे ही वादे किए जा रहे हैं। कुल मिलाकर सियासी दल मुद्दों से हटकर जनभावनाओं को भुनाने में जुट गए हैं।
लोकसभा चुनाव का बिगुल बच चुका है। पूरे देश में चुनावी मौसम दिखने लगा है। इसी के साथ दिल्ली के तख्त तक पहुंचने की जोर आजमाइश भी शुरू हो गई है। राष्टï्रवाद के नाम पर सियासी गोटियां खेली जा रही है। जाति, धर्म और सांप्रदाय का कार्ड खुलकर खेला जा रहा है। विरोधी दलों को देशद्रोही बताने से भी गुरेज नहीं किया जा रहा है। आतंकवाद और राष्टï्रवाद के नाम पर भाजपा विरोधियों को घेर रही है। वहीं विरोधी दल भाजपा के इस राष्टï्रवाद लोकतंत्र के लिए खतरा मान रहे हैं। सियासी दल जनता को अपने जोशीले संदेशों से उकसा रहे हैं और वोट की फसल काटने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ सियासी दल चुनावी सभाओं में खुलेआम जाति और संप्रदाय की राजनीति कर रहे हैं। धार्मिक और जातीय उन्माद चरम पर पहुंच चुका है। धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं। इन सबके बीच जरूरी मुद्दों मसलन बेरोजगारी, गरीबी पर कोई बात नहीं की जा रही है। विकास के नाम पर कोई भी दल जनता के बीच जाता नहीं दिख रहा है। निजी हमले भी शुरू हो गए है। अपने-अपने वोट बैंक को बचाने की जुगत लगाई जा रही है। वोटों के बिखराव को रोकने के लिए सारी लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रख दिया है। कुल मिलाकर यह कोशिश की जा रही है कि भावनाओं को इस कदर उभार दिया जाए ताकि जनता का ध्यान जरूरी मुद्दों से हट जाए। चुनाव में भावनाओं के साथ जाति और संप्रदाय के नाम पर भी वोट लिए जा सके। मंच से बताया जा रहा है कि वोट का धु्रवीकरण कैसे करो। विरोधी को हराना है तो वर्ग विशेष के लोग एकजुट होकर वोट करें। जाहिर है, सियासी दलों के ये दांव-पेच किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए शुभ नहीं कही जा सकती। लोक सभा चुनाव परिणामों से ही पता चलेगा कि इस बार जनता ने अपने मताधिकार का प्रयोग किस आधार पर किया।

 

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