You Are Here: Home » Front Page » फिर बैतलवा डाल पर

फिर बैतलवा डाल पर

  • लोकसभा चुनाव में मुद्दे गायब हो रही धर्म और जाति की सियासत
  • भाजपा हिंदुत्त और राष्ट्रवाद का बजा रही बैंड
  • दलित मुस्लिम और पिछड़े पर जोर दे रहा गठबंधन
  • कांग्रेस भी मुस्लिमो को अपने पीला में करने में जुटी

Sanjay Sharma @WeekandTimes

लखनऊ। लोक सभा का संग्राम शुरू हो चुका है। सियासी दलों के सेनापति अपनी-अपनी सेना के साथ मैदान में कूद पड़े हैं। सियासत के युद्ध में शब्दों के जहरीले बाण छोड़े जा रहे हैं। वार-पलटवार का खेल चरम पर पहुंच गया है। चुनाव में एक बार फिर धर्म और जाति का बोलबाला हो चुका है। भाजपा जहां हिदुत्व और राष्टï्रवाद के नाम पर जंग जीतने की जुगत लगा रही है वहीं सपा-बसपा-रालोद गठबंधन दलित-पिछड़े और मुस्लिमों को साध कर किंग मेकर की भूमिका में आना चाहता है। कांग्रेस भी पीछे नहीं है। वह भी धर्म और जाति के नाम पर वोटों की फसल काटने में जुटी हुई है। जनता से जुड़े तमाम मुद्दे सियासी दलों के घोषणापत्र में दफन हो चुके हैं। उस पर कोई पार्टी या सियासी दल का नेता बात भी नहीं करना चाहता है। भाजपा पर हिंदुत्व के नाम पर देश को बांटने का आरोप लगाने वाले खुद उसी धारा के साथ बहने लगे हैं। खुलकर वर्ग विशेष से वोट करने की अपीलें की जा रही हैं। कुल मिलाकर लोकतंत्र रूपी विक्रमादित्य के कंधे से उतरकर जाति और धर्म का बेताल फिर सियासत की डाल पर लटक गया है। देखना यह है कि मतदाता क्या फैसला करते हैं।

…लोक सभा चुनाव के पहले का दृश्य अब पूरी तरह बदल चुका है। चुनाव से ठीक पहले सियासी दल विशेषकर भाजपा और कांग्रेस जनता के सामने विकास का एक खाका पेश कर रहे थे। कांग्रेस और भाजपा ने अपने वादों की पोटली भारतीय जनता के सामने खोली थी। दोनों के घोषणापत्र देखकर लग रहा था, यह चुनाव विकास किया और विकास करेंगे, के नाम पर लड़ा जाएगा। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में सरकार बनने पर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सहित तमाम मुद्दों पर काम करने का वादा किया था। दूसरी ओर भाजपा ने भी अपने पांच साल के काम को गिनाते हुए आगे के पांच साल के कामों की रूपरेखा जनता के सामने रखी थी। इन वादों में सभी किसानों को सालाना 6 हजार देने, छोटे दुकानदारों को पेंशन देने और आयुष्मान योजना का दायरा बढ़ाने आदि शामिल थे। यही नहीं यूपी में सपा ने भी अपना घोषणापत्र जारी किया था। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने पुराने काम को बढ़ाने पर जोर दिया था। यह दीगर है कि सपा गठबंधन में शामिल बसपा प्रमुख मायावती ने कोई घोषणापत्र नहीं पेश किया लेकिन उन्होंने भी गरीबी दूर करने पर जोर दिया था। बावजूद इसके जैसे-जैसे चुनाव चरम पर पहुंचा, मतदान की शुरूआत हुई, सारे घोषणापत्र और वादे धर्म और जाति की राजनीति के शोर में गुम हो गए। कांग्रेस साफ्ट हिंदुत्व और मुस्लिमों के सहारे चुनावी नैया पार लगाने की जुगत में लग गई।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा मंदिर-मंदिर भ्रमण करने लगे। प्रियंका ने मोदी की तर्ज पर नाव पर सवार होकर गंगा दर्शन करने काशी पहुंच गई। वहां बाबा विश्वनाथ के दर्शन किए। उसी तरह वायनाड में मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन कर राहुल गांधी ने मुस्लिमों को संदेश देने की कोशिश की। इसके अलावा वे वायनाड में मंदिर में दर्शन-पूजन कर अपने साफ्ट हिंदुत्व को भी धार देने की कोशिश करते दिखे। यही नहीं कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू तो खुलेआम मुस्लिमों को एकजुट होकर कांग्रेस को वोट की अपील करने से भी पीछे नहीं हटे। भाजपा पहले से ही हिंदुत्व के भरोसे रही है। भाजपा की कमान दो बड़े दिग्गजों ने संभाल रखी है। एक ओर पीएम नरेंद्र मोदी हिंदुत्व और राष्टï्रवाद का झंडा बुलंद कर रहे हैं तो दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व को साधने में जुटे हुए हैं।
सीएम योगी ने पिछले दिनों साफ तौर पर कह भी दिया था कि यदि विपक्ष को केवल मुस्लिम वोट चाहिए तो भाजपा को बाकी सभी का वोट चाहिए। यही नहीं उन्होंने अली और बजरंग बली के नाम पर भी हिंदुत्व को धार देने की कोशिश की। पीएम मोदी हिंदुत्व के साथ राष्टï्रवाद के नाम पर जनता से वोट की अपील कर रहे है। वे अपनी हर सभा में साफ तौर पर कहते हैं कि भारत की जनता को आतंकवादियों को घर में घुसकर मारने वाली मजबूत सरकार चाहिए या मजबूर सरकार चाहिए। मजबूर सरकार से उनका मतलब गठबंधन से है। सपा-बसपा-रालोद गठबंधन पूरी तरह जाति समीकरण पर आधारित है। यह गठबंधन पिछड़े-मुस्लिम और दलितों के वोट के भरोसे यूपी में जीत हासिल करना चाहता है ताकि दिल्ली सरकार के गठन में किंग मेकर की भूमिका निभा सके। गठबंधन ने कांग्रेस को साथ नहीं लिया है। लिहाजा कांग्रेस भी पूरे दम-खम के साथ यूपी में मैदान में उतर गई है। कांग्रेस ने मजबूत प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है।
इससे गठबंधन की चिंता बढ़ गई है। गठबंधन को लग रहा है कि कांग्रेस के खुलकर आने से मुस्लिम वोटों के बंटने का खतरा बढ़ गया है। इससे भाजपा को फायदा मिलेगा। यही वजह है कि देवबंद में हुई गठबंधन की संयुक्त रैली में बसपा प्रमुख मायावती ने खुलकर मुस्लिमों से वोट मांगे और साफ कह दिया कि मुस्लिम अपने वोट न बांटे और एकमुश्म गठबंधन को वोट करें। कुल मिलाकर लोकतंत्र की सारे आदर्श परिदृश्य से गायब हो चुके हैं। अब केवल जाति और धर्म के आधार पर वोट मांगने और चुनाव जीतने की होड़ लगी हुई है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत की जागरूक हो चुकी जनता क्या फैसला लेती है।

All Rights Reserved to Weekand Times . Website Developed by Prabhat Media Creations.