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दिल्ली कितनी पास कितनी दूर

  • विपक्षी दलों को उम्मीद आएगा खंडित जनादेश
  • भाजपा को सत्ता से दूर रखने को गोलबंदी शुरू
  • भाजपा नीति गठबंधन को बहुमत का भरोसा
  • एनडीए को बहुमत का भरोसा

Sanjay Sharma #WeeknadTimes

क सभा चुनाव अभी खत्म नहीं हुआ है लेकिन विपक्षी दलों ने अभी से गोलबंदी शुरू कर दी है। विपक्षी दलों को उम्मीद है कि इस बार खंडित जनादेश आएगा। लिहाजा सभी दल भाजपा को सत्ता से दूर रखने की कोशिश में सियासी चालें चलने लगे हैं। टीडीपी अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू इस गोलबंदी को तैयार करने में जुट गए हैं। वहीं भाजपा को उम्मीद है कि एनडीए को इस बार भी पूर्ण बहुमत मिलेगा और मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे। फिलहाल भाजपा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आक्रामक ढंग से चुनाव प्रचार में जुटी है। भाजपा को भरोसा है कि यदि यूपी में सपा-बसपा गठबंधन के कारण कुछ सीटों की कमी होगी भी तो उसकी क्षतिपूर्ति बंगाल और उड़ीसा से हो जाएगी। अब यह तो चुनाव परिणाम ही बताएगा कि दिल्ली की गद्दी पर कौन बैठता है।

…लोक सभा चुनाव चरम पर पहुंच चुका है। भाजपा मोदी के नेतृत्व में धुआंधार प्रचार कर रही है। हिंदी पट्टी के राज्यों के अलावा इस बार भाजपा की नजर उड़ीसा और पश्चिम बंगाल पर भी टिकी हुई है। भाजपा के दिग्गजों को पता है कि यूपी में सपा-बसपा गठबंधन के कारण उसकी सीटों में कमी हो सकती है। पिछली बार भाजपा ने यहां की 80 में से 73 सीटों पर कब्जा जमाया था। इसमें दो सीटें उसके सहयोगी अपना दल की शामिल हैं। भाजपा के सामने यूपी में अपना पुराना रिकॉर्ड दोहराने की चुनौती है लेकिन इस बार यूपी की सियासी फिजा बदली हुई है। यहां सपा-बसपा गठबंधन ने उसकी नींद उड़ा दी है। सपा-बसपा यहां जातीय समीकरण के आधार पर भाजपा के सामने बड़ी चुनौती पेश कर रही है। गठबंधन के बाद ही भाजपा के दिग्गजों ने अपनी रणनीति बदल दी थी। भाजपा के सिपहसालारों को पता है कि जातीय समीकरण से गठबंधन उनको नुकसान पहुंचा सकता है। लिहाजा उन्होंने उड़ीसा और पश्चिम बंगाल पर फोकस किया है। पश्चिम बंगाल में भाजपा ममता बनर्जी के एंटी इनकंबेंसी का फायदा उठाने में जुटी है। हालांकि यहां ममता बनर्जी अपना गढ़ बचाने में जोर-शोर से लगी हुई हैं। वहीं कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश के मैदान में उतार कर सियासी पारा चढ़ा दिया है। कांग्रेस को उम्मीद है कि प्रियंका के आने से यूपी में उसकी सीटों में इजाफा हो सकता है। हालांकि कांग्रेस के कई दिग्गजों ने साफ तौर पर स्वीकार कर लिया है कि यूपीए को बहुमत नहीं मिल रहा है। विपक्षी दलों को भी लग रहा है कि वे इस बार मोदी के रथ को रोक लेंगे और एनडीए को बहुमत नहीं मिल पाएगा। इसको ध्यान में रखते हुए अभी से विपक्षियों ने दिल्ली की सत्ता पर कब्जा करने की रणनीति बनानी शुरू कर दी है। यही वजह है कि चुनाव खत्म होने के पहले विपक्षी दलों के नेताओं के बीच मुलाकातों का दौर शुरू हो चुका है। टीडीपी अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात कर चुके हैं। विपक्षी दलों का दावा है कि इस लोकसभा चुनाव में किसी भी एक पार्टी या मौजूदा गठबंधन को बहुमत नहीं मिलेगा। ऐसे में नई सरकार के गठन में उनकी भूमिका अहम होगी। यही नहीं भाजपा और कांग्रेस से अलग एक तीसरे मोर्चे के गठन की भी चर्चा हो रही है। इस संबंध में पिछले दिनों तेलंगाना के मुख्यमंत्री और टीआरएस प्रमुख के चंद्रशेखर राव ने केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन से मुलाकात की थी। इस मामले पर 21 मई को विपक्षी दलों की बैठक दिल्ली में बुलाने की योजना पर चर्चा की गई है ताकि चुनाव बाद गठबंधन की रूपरेखा तय हो सके। चर्चा यह है कि विपक्षी पार्टियां चुनाव परिणाम से पहले राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात की योजना में हैं। इन पार्टियों की रणनीति है कि राष्ट्रपति से अपील की जाए कि अगर खंडित जनादेश (किसी भी एक गठबंधन को बहुमत नहीं मिलना) मिलता है तो राष्ट्रपति सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित न करें। वहीं यूपी में सपा मुखिया अखिलेश यादव ने दावा किया है कि अगला प्रधानमंत्री गठबंधन से होगा। हालांकि चुनाव पूर्व भी विपक्षी पार्टियों ने राज्यवार गठबंधन बनाने की कवायद की थी लेकिन क्षेत्रीय वर्चस्व ने सभी को एक-दूसरे के सामने खड़ा कर दिया। फिर से विपक्ष ने साथ आकर भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए रणनीति बनानी शुरू कर दी है। बावजूद इसके 23 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद ही तस्वीर साफ होगी।

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