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फिर सियासत के ‘जादूगर’ बने मोदी

  • UP में जातीय समीकरण ध्वस्त गठबंधन नहीं दे सका चुनौती
  • पांच वर्षो के विकास कार्य और राष्ट्रवाद ने लिखी पठकथा
  • मोदी के व्वातित्व के सामने नहीं टिक सके विपक्ष
  • जनता ने वंशवाद की राजनीति को नकारा

Sanjay Sharma @ WeekandTimes

लखनऊ। लोक सभा चुनाव में प्रचंड जीत हासिल करने के बाद नरेंद्र मोदी एक बार फिर सियासत के जादूगर बनकर उभरे। दोबारा प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। संसदीय दल का नेता चुने जाने के दौरान दिए अपने पहले भाषण में मोदी ने अपनी नयी सरकार का एजेंडा लोगों के सामने रख दिया। प्रधानमंत्री ने सबका साथ, सबका विकास नारे के साथ सबका विश्वास जोड़ कर संकेत दे दिया है कि उनकी सरकार को देश के अल्पसंख्यकों के हितों की भी चिंता है। भाजपा की इस प्रचंड जीत से साफ हो गया है कि जनता ने वंशवाद की राजनीति को पूरी तरह नकार दिया है। सभी जाति और धर्म के लोगों का वोट हासिल कर भाजपा ने वर्षों से चली आ रही जाति और धर्म की दीवार को ध्वस्त कर दिया है। उत्तर प्रदेश में जातियों के आधार पर बने सपा-बसपा गठबंधन की गणित धराशायी हो गई है। यहां भाजपा की कैमिस्ट्री और मोदी मैजिक चला। चुनाव के दौरान विपक्ष मोदी विरोध के अलावा कोई एजेंडा नहीं चला सका जबकि भाजपा ने अपने पांच साल के विकास कार्यों, मोदी के व्यक्तित्व और राष्टï्रवाद के सहारे जीत का परचम फहरा दिया।

….लोकसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। पूर्ण बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी दोबारा दिल्ली के तख्त पर आसीन हो गए हैं। विपक्ष पूरी तरह बेदम दिख रहा है। कांग्रेस, सपा-बसपा और अन्य राज्यों के क्षेत्रीय दलों में हार से हाहाकार मचा है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी भाजपा की जीत से स्तब्ध हंै। यहां भी भाजपा ने उनके किले में सेंध लगा दी है। पिछले लोक सभा में पश्चिम बंगाल में दो सीटें हासिल करने वाली भाजपा इस चुनाव में ममता बनर्जी को बराबरी की टक्कर दे रही है। यहां भाजपा को 18 जबकि ममता बनर्जी को 22 सीटें ही मिली हैं। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन महज 15 सीटों पर सिमट गया है। भाजपा व उसके सहयोगी दल ने उम्दा प्रदर्शन करते हुए 80 सीटों में से 64 सीटों पर कब्जा जमा लिया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव के परिवार के तीन सदस्य चुनाव हार चुके हैं। खुद अखिलेश यादव और सपा संरक्षक मुलायम सिंह चुनाव जीत सके हैं। कुल मिलाकर मोदी की सुनामी में पूरे देश में विपक्ष बह चुका है। 542 लोक सभा सीटो में भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ 353 सीटें जीत चुकी हंै। इसमें अकेले भाजपा ने 303 सीटें जीती हंै। भाजपा को यह जीत ऐसे ही नहीं मिली है। इसके पीछे मोदी का व्यक्ति और उनकी कल्याणकारी नीतियां, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति और राष्टï्रवाद रहा है। चुनाव के दौरान पीएम मोदी ने राष्ट्रवाद, विकास और हिंदुत्व जैसे मुद्दों को जमकर भुनाया। पुलवामा आतंकी हमले के बाद पूरा देश रोष में था। 40 जवान शहीद होने के बाद पीएम मोदी ने पाकिस्तान के बालाकोट स्थित आतंकी ठिकानों पर एयरस्ट्राइक का आदेश दिया, जिसके बाद पाकिस्तान बौखला गया। इससे जनता में संदेश गया कि पाकिस्तान का दिमाग मोदी ही ठिकाने लगा सकते हैं। 13 पॉइंट रोस्टर और एसटी/एससी एक्ट को लेकर मोदी सरकार के रुख से अगड़ी जातियां काफी नाराज चल रही थीं। लिहाजा उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए सरकार ने गरीब सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का ऐलान कर दिया। यह मोदी के लिए तुरुप का इक्का साबित हुआ। पीएम नरेंद्र मोदी हो या अन्य कोई भाजपा नेता सभी ने अपने भाषणों में राष्टï्रवाद को धार दी। वे लोगों को यह बताने में सफल रहे कि कैसे भाजपा सरकार में सेना को खुली छूट दी गई और उसे मजबूत बनाया गया जबकि पूर्ववर्ती सरकारें न तो दुश्मन को जवाब दे पाईं और न ही सेना को सक्षम कर पाई। किसानों के मुद्दे पर विपक्ष लंबे समय से पीएम मोदी को घेरता आ रहा था। कई किसान आंदोलन भी हुए। लोक सभा चुनाव से पहले हिंदी हार्टलैंड मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधान सभा चुनाव में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा था। भाजपा के दिग्गजों का मानना था कि इन राज्यों में हार का मुख्य कारण किसानों का असंतोष रहा है। लिहाजा सरकार ने किसान सम्मान निधि योजना के तहत किसानों के खातों में 6 हजार रुपए देने का ऐलान किया। यह योजना सफल रही और किसानों की नाराजगी कम हो गई। इसके अलावा उज्जवला गैस, पीएम आवास योजना, मुद्रा योजना, स्वच्छ भारत, आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का लाभ भी जमीनी हकीकत पर लोगों को मिला। इसका फायदा भाजपा को लोकसभा चुनाव में मिला। रणनीति के तौर पर भाजपा ने घर-घर पहुंचने की मुहिम चलाई। अपना बूथ सबसे मजबूत के दम पर वह लोगों को भाजपा की ओर करने में सफल रही। भाजपा को मिली इस जीत का एक साफ संदेश यह है कि जनता को पीएम मोदी की बातें समझ में आई हैं। मतदाताओं ने जातिगत समीकरणों को किनारे रखकर भाजपा के उम्मीदवारों को वोट दिया है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन था। दोनों पार्टियों के एक साथ आने की एक बड़ी वजह ये थी कि वे अपनी-अपनी पकड़ वाली जाति के वोटों को बिखरने से रोकेंगे। उन्हें उम्मीद थी कि यूपी की अस्सी लोकसभा सीटों में से 50-60 सीटों पर भाजपा को पटकनी दी जा सकती है लेकिन जब नतीजे आए तो हुआ इसका उलटा। बिहार में आरजेडी, रालोसपा, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा और विकासशील इंसान पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली है। वहीं वंशवाद की राजनीति को इस बार जनता ने पूरी तरह नकार दिया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अपनी परंपरागत सीट अमेठी में हार का मुंह देखना पड़ा। लालू यादव के आरजेडी व अजित चौधरी की रालोद का सफाया हो गया। वहीं अखिलेश यादव की सपा को निराशा का सामना करना पड़ा। वहीं कांग्रेस ने सुविधा से विपक्ष की राजनीति की। किसानों की समस्या, बेरोजगारी या आर्थिक मामलों को लेकर ऐसा कभी नहीं हुआ कि कांग्रेस के बड़े नेता या पार्टी कार्यकर्ता सडक़ों पर आए हों। राफेल मुद्दे को लेकर पीएम मोदी पर निजी हमले करने को भी जनता ने नकार दिया। भाजपा से लड़ते हुए कांग्रेस ने अपने विजन को बदल दिया। भाजपा के हिंदुत्व से लडऩे के लिए कांग्रेस ने सॉफ्ट हिंदुत्व का सहारा लिया। जनता ने इसे भी सिरे से खारिज कर दिया। कांग्रेस यह बताने से बचती रही कि अगर उन्हें मौका मिला तो वे देश के लिए क्या करेंगे। कांग्रेस के बड़े नेता ‘न्याय योजना’ के बारे में बात करने की अपेक्षा मोदी की आलोचना में जुटे रहे। वहीं भाजपा बार-बार बताती रही कि उसने इतना काम किया है जितना पिछले 60-70 वर्षों में नहीं हुआ। वहीं विपक्ष जनता के सामने मोदी के विकल्प को भी पेश करने में नाकाम रहा। कुल मिलाकर इस चुनाव ने राजनीति के तमाम समीकरणों को ध्वस्त कर दिया और मोदी को लगभग अजेय बना दिया।

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