You Are Here: Home » Front Page » विपक्ष को लानी होगी धार

विपक्ष को लानी होगी धार

  • मोदी सरकार की गलतियों पर रखे पैनी नजर
  • जनता के बीच ज्यादा से ज्यादा जाना होगा

Sanjay Sharma @WeekandTimes

अ ब सत्ता पर जब एक बार फिर मोदी सरकार काबिज हो चुकी है तो विपक्ष को और ताकत से अपने को जनता के सामने प्रस्तुत करना होगा। प्रचंड जीत से पूरे उत्साह में आई भाजपा नीत एनडीए की सरकार को भी अब पूरी जिम्मेदारी से काम करना होगा। अब जब उनकी सरकार चुनावों में जाएगी तो उन्हें अपने कामों को ही गिनाना होगा। ऐसे में पूरे विपक्ष को पूरी सतर्कता से सरकार की जरा सी चूक को अपने लिए फायदे में बदलने को तत्पर होना होगा। विपक्ष को हार की निराशा से निकलना होगा। कांग्रेस, सपा, बसपा, रालोद, राजद, टीडीपी, टीएमसी के साथ अन्य सभी विपक्षी दलों को अपनी पुरानी गलतियों से सबक लेकर नए सिरे से अपने को नया बनाना होगा। भाजपा की जीत का सबसे बड़ा जो हथियार रहा वह राष्टï्रवाद व सकारात्मक राजनीति रहा। विपक्ष को नकारात्मकता छोडक़र उनके राष्टï्रवाद के सामने विकासवाद व आमजन को प्रभावित करने वाले मुदï्दे उठाने होंगे।

2019 के लोकसभा चुनावों के नतीजे आने के साथ-साथ यह भी साफ हो गया कि जनता ने मोदी को देश की बागडोर संभालने के लिए सबसे उपर्युक्त विकल्प मानते हुए दोबारा उन्ही के हाथों में सत्ता की चाभी देना मुनासिब समझा है। सत्ता-विरोधी (एंटी इनकम्बेंसी) लहर को मोदी लहर ने इस तरह अपने अंदर समाहित कर लिया कि पार्टी को उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में तो बढ़त मिली, बल्कि पार्टी को बंगाल एवं ओडिशा जैसे राज्यों में भी भारी सफलता प्राप्त हुई। इन परिस्थितियों में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि उनको मिला जनादेश वास्तव में ऐतिहासिक है जो भारतीय लोकतंत्र की इस लंबी विकास-यात्रा में एक मील के पत्थर के रूप स्थापित हो चुका है। ज्ञात रहे कि पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद मोदी देश के तीसरे (पहले गैर-कांग्रेसी) प्रधानमंत्री हैं जो पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापस आए हैं।
ऐसे में इन चुनावों के नतीजों में एक विशेष बात निकल कर के सामने आई है जो अब तक हुए चुनावों में शायद ही कभी देखने को मिली हो। देखा जाए तो इस बार विपक्ष केवल चुनाव ही नहीं, बल्कि एक बड़े अंतर से राष्टï्रीय स्तर पर अपने बनाए हुए मुदï्दे भी हार चुका है और आने वाले समय में नरेटिव की यह हार उसको चुनाव में सीटों के संदर्भ में मिली हार से कहीं ज्यादा पीड़ा देने वाली है। नकारात्मक राजनीतिक कैंपेन और किसी व्यक्ति पर निजी हमले करने का क्या नुकसान होता है, इसका परिणाम इस चुनाव के नतीजों ने अच्छी तरह स्थापित कर दिया है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा स्थापित आशा की राजनीति कांग्रेस द्वारा दशकों से की जा रही पात्रता की राजनीति से कहीं आगे निकल गई। भारतीय जनता पार्टी के विपक्ष खड़े दलों ने जो सबसे बड़ी भूल की वो थी राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित विषयों को चुनावी रूप से साधारण/प्रभावहीन मान लेने की, जिसका उनको भारी नुकसान उठाना पड़ा है। वैचारिक कुंठा से ग्रसित लोगों को कभी भारतीय राष्टï्र की परिभाषा से परेशानी होती है, तो कभी भारत को एक सांस्कृतिक राष्ट्र कहे जाने से, इसीलिए यह लोग मान ही नहीं पाते कि भारत की जनता के लिए राष्टï्रप्रेम अन्य सभी मुदï्दों में से सबसे ऊपर हो सकता है, फिर चाहे वो स्थानीय मुदï्दे हों, धार्मिक, या जातिगत यह लोग भारतीय समाज को आज भी उसी चश्मे से देखते हैं जिसमें व्यक्ति की जाति सबसे ऊपर होती है और उसकी सोचने-समझने की प्रक्रिया उसी के इर्द-गिर्द घूमती है। ऐसे में जब भाजपा ने राष्टï्रीय सुरक्षा को चुनावी मुदï्दा बनाया तो सामाजिक वास्तविकताओं से पूर्ण रूप से कटा हुआ यह समूह और इनसे सलाह लेने वाले विपक्षी दल इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा पाए कि जब बात देश की आती है तो जनता उसी मोदी पर भरोसा करती है जिसने आतंक के विरूद्ध सर्जिकल स्ट्राइक करने के लिए सेना को न केवल खुली छूट दी, बल्कि उनको यह भरोसा भी दिलाया कि इसके लिए पूरी सरकार उनके साथ खड़ी रहेगी।
वहीं बंगाल में भाजपा की आंधी में जिस तरह ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, वाम मोर्चा और कांग्रेस बह गए उससे यह निष्कर्ष तो निकाला ही जा सकता है कि अंग्रेजी ऑपनिवेशिक काल से ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के गढ़ रहे बंगाल में उस भावना की कोई कमी नहीं थी, जरूरत बस उसको एक मजबूत संगठन के सहारे खड़ा करने की थी। ममता बनर्जी ने जिस तरह जय श्री राम के नारे को लेकर नाराजगी दिखाई उससे यह नारा वहां की जनता के लिए तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी के विरोध करने का एक माध्यम बन गया, जिसका फायदा परोक्ष रूप से भाजपा को मिला। प्रधानमंत्री मोदी की सबसे बड़ी शक्ति उनकी साफ छवि और जनता के बीच जनता में से एक दिखने की उनकी शैली है। ऐसे में उनके ऊपर लगाए हुए व्यक्तिगत आरोप जनता को न तो पसंद आए और न ही वो इससे कभी भी जुड़ पाई। जो टिप्पणीकार इस जनादेश को जनता द्वारा जातिगत राजनीति को नकारने के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं वे पूरी तरह से सही नहीं हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जनता ने जाति विशेष के नाम पर राजनीति करने वाले दलों को नकार दिया है, लेकिन भाजपा ने भी चुनाव जीतने के लिए जातिगत समीकरणों का विशेष ध्यान दिया था, यहां भाजपा और विपक्षी दलों में दो बड़े अंतर हैं जिन्होंने जीत और हार का अंतर पैदा किया। पहले यह कि हर चुनाव क्षेत्र के हिसाब से भाजपा ने जातिगत समीकरणों में ध्यान में रख कर टिकट तो बांटे, लेकिन इसके अलावा चुनाव प्रचार में सरकार की कल्याणकारी योजनाओं, विकास कार्यों, प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता को भी बराबर से महत्व दिया। लोकतंत्र को बचाने और संस्थाओं को सुरक्षित करने के नाम पर कांग्रेस और विपक्षी दल इस चुनाव को 1977 के चुनाव की तरह प्रस्तुत करना चाह रहे थे जिसमे इंदिरा गांधी को आपतकाल के बाद हार का मुंह देखना पड़ा था, लेकिन वो यह बात समझ ही नहीं पाए कि न तो उनके पास जयप्रकाश नारायण जैसा कोई कुशल नेतृत्व है जो विरोधाभासी विचारधाराओं को मानने वाले अलग-अलग दलों को भी एक साथ एक मंच पर ला कर खड़ा कर सके और न ही मोदी इंदिरा गांधी हैं जिन्होंने देश के लोकतंत्र के साथ इतने बड़ा अन्याय किया हो। मोदी को लोकतंत्र-विरोधी बताने वाला मीडिया और एकेडमिक जगत में ही बंध कर रह गया। जनता का इससे कोई सरोकार नहीं हो पाया। विपक्ष की उम्मीदों के इतर उन्हें लोकतंत्र में और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास पहले जैसा ही दिखा।
कुल मिलाकर भाजपा को मिला जनादेश जहां एक ओर प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के लिए अत्यंत आनंद का विषय है, वहीं दूसरी ओर यह कांटो का ताज भी है। नई सरकार के लिए नई और पुरानी दोनों चुनौतियां तो हैं ही, नए और पुराने वादों को पूरा करने का अतिरिक्त बोझ भी है।

All Rights Reserved to Weekand Times . Website Developed by Prabhat Media Creations.