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यूपी में सियासी जमीन तलाशती कांग्रेस

  • पार्टी महासचिव प्रियंका के कंधों पर चुनौतियों का भार
  • खिसकते जनाधार को पाने में कवायद में जुटी पार्टी
  • राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद गुटबंदी तेज
  • भाजपा समेत सपा-बसपा को टक्कर देना नहीं होगा आसान
  • सोनभद्र की घटना को भुनाने में कामयाब रही कांग्रेस

Sanjay Sharma @WeekandTimes

क सभा में करारी शिकस्त पाने के बाद कांग्रेस की नजरें यूपी पर टिक गई हंै। राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद प्रियंका गांधी को उार प्रदेश की कमान पूरी तौर पर सौंप दी गई है। वे कांग्रेस की महासचिव के साथ प्रदेश की प्रभारी भी बनाई गई हैं। अब प्रियंका के सामने कांग्रेस को उार प्रदेश में दोबारा खड़ा करने की चुनौती है। प्रदेश में पार्टी के खिसक चुके जनाधार को वापस पाना प्रियंका के लिए आसान नहीं है। यहां कांग्रेस के सामने न केवल प्रदेश के दो बड़े क्षेत्रीय दल सपा-बसपा हैं बल्कि प्रदेश में अपनी जड़ें गहरे तक जमा चुकी भाजपा भी है। इन सबसे प्रियंका को दो-दो हाथ करने होंगे। राहुल के इस्तीफे के बाद पार्टी में उपजी गुटबंदी से भी प्रियंका को पार पाना होगा। साथ ही प्रदेश में बिखर चुके संगठन को भी मजबूत करना होगा। इन सभी चुनौतियों से निपटे बिना कांग्रेस उार प्रदेश में अपनी सियासी जमीन मजबूत नहीं कर सकेगी।

राहुल गांधी के इस्तीफे ने कांग्रेस को संकट में डाल दिया है। इसका सीधा असर कांग्रेस शासित राज्यों की सियासत पर भी पड़ रहा है। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार गिर चुकी है और वहां भाजपा सरकार बनाने की तैयारी कर रही है। यूपी के कांग्रेसियों में भी निराशा फैली हुई है। पार्टी में गुटबंदी चरम पर है। यही वजह है कि अभी तक कांग्रेस का नया अध्यक्ष तक नामित नहीं हो सका है। ऐसी विकट परिस्थितियों में प्रियंका गांधी को पार्टी ने उार प्रदेश की कमान सौंप दी है। लोक सभा चुनाव में करारी शिकस्त पाने के बावजूद पार्टी के कुछ दिग्गजों को अभी भी प्रियंका गांधी से काफी उम्मीदें हैं। उनका मानना है कि उार प्रदेश में प्रिंयका गांधी चमत्कार कर सकती हैं। प्रियंका भी प्रभारी बनने के बाद से बेहद सक्रिय हो चुकी है। हालांकि लोक सभा चुनाव के दौरान उनकी सक्रियता का कोई फायदा कांग्रेस को नहीं मिला। यही नहीं राहुल गांधी अपनी परंपरागत अमेठी की सीट भी गंवा बैठे। उार प्रदेश में केवल रायबरेली की सीट ही कांग्रेस बचा सकी। यहां से सोनिया गांधी सांसद बनीं। लेकिन प्रियंका की नजर उार प्रदेश में 2022 में होने वाले विधान सभा चुनाव पर लगी हुई हैं। प्रियंका के पास उार प्रदेश में कांग्रेस को दोबारा से खड़ा करने के लिए करीब ढाई साल का समय है। सियासत की दृष्टिï से इतने वर्ष बहुत कम होते हैं। सच यह है कि उार प्रदेश में कांग्रेस की सियासी जमीन पूरी तरह दरक चुकी है और वह यहां चौथे नंबर की पार्टी बनकर रह गई है। पिछले विधान सभा चुनाव में कांग्रेस दहाई का आंकड़ा भी नहीं पार कर सकी थी। इसके अलावा उसका वोट प्रतिशत भी लगातार गिरता जा रहा है। हालांकि प्रियंका के राजनीति में उतरने से कांग्रेसियों में जोश पैदा हुआ है। प्रियंका भी योगी सरकार पर लगातार हमले कर रही है। पिछले दिनों सोनभद्र नरसंहार को लेकर जमकर सियासत की। सोनभद्र के उम्भा गांव में जमीन कजाने को लेकर नरसंहार हुआ। इसमें 10 लोगों की हत्या कर दी गई और 28 लोग घायल हो गए। प्रियंका फौरन एशन में आ गईं। प्रियंका गांधी ने ट्वीट किया, भाजपा राज में अपराधियों के हौसले इतने बढ़ गए हैं कि दिन-दहाड़े हत्याएं हो रही हैं। सोनभद्र के उम्भा गांव में भू-माफियाओं ने महिलाओं और आदिवासियों की सरेआम हत्या ने दिल दहला दिया। प्रशासन-प्रदेश के मुखिया और मंत्री सब सो रहे हैं। या ऐसे बनेगा अपराध मुक्त प्रदेश? प्रियंका यहीं नहीं रुकीं और पीडि़तों के परिवारवालों से मिलने के लिए वाराणसी के ट्रामा सेंटर से सोनभद्र के लिए रवाना हुईं। मिर्जापुर में प्रवेश करते ही पुलिस प्रशासन ने उनका काफिला रोक दिया। प्रियंका समर्थकों संग धरने पर बैठ गईं। उन्हें हिरासत में ले लिया गया और एसडीएम खुद अपनी गाड़ी से उन्हें चुनार गेस्टहाउस ले गए। प्रशासन के लाख समझाने के बाद भी प्रियंका गांधी पीडि़तों से मिलने के लिए अड़ी रहीं। 26 घंटे के जद्दोजहद के बाद प्रियंका गांधी की पीडि़त परिवारों से मुलाकात कराई गई। सरकार बैकफुट पर दिखी। कांग्रेस की तरफ से प्रत्येक मृतक के परिवार को 10-10 लाख रुपए मुआवजा देने का भी प्रियंका ने ऐलान किया। वहीं सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती सोनभद्र मामले को सिर्फ प्रेस कान्फ्रेंस और सोशल मीडिया के जरिए से उठाने की कवायद करते दिखे। इस तरह से यूपी के दोनों प्रमुख पार्टियों के नेताओं से आगे प्रियंका गांधी निकल गई हैं। अपने इस कदम से प्रियंका हताश कांग्रेसियों में उत्साह भरने में कामयाब रही हैं। यूपी में करीब 30 साल से हाशिए पर चल रही कांग्रेस को संजीवनी देने की उनकी कोशिश इस मायने में कामयाब होती दिखी कि दो दिन प्रदेश के कई जिलों में कांग्रेसी सडक़ पर उतरते दिखे, लेकिन केवल एक सियासी दांव से प्रदेश में कांग्रेस की दरक चुकी सियासी जमीन को नहीं पाया जा सकता है। इसके लिए प्रियंका को सडक़ पर उतरकर काफी संघर्ष करना होगा। प्रदेश संगठन पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो चुका है। लिहाजा उसमेंं बदलाव करने होंगे। साथ ही जनाधार को मजबूत करने के लिए तमाम रणनीति अपनानी होगी। हकीकत यह है कि कांग्रेस के पास कोई कोर वोटर नहीं रह गया है। कुछ हद तक मुस्लिम समुदाय के लोग ही कांग्रेस के पाले में दिख रहे हैं।

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